"क्षितिज के अनुत्तरित प्रश्न"
पंकज शर्मा
कितना सुखमय जीवन होता—
यदि इस निस्तब्ध सांझ की लालिमा में
सत्य के अर्थ घुले होते,
और मैं किनारे पर बैठा तटस्थ दृष्टा मात्र न होता,
बल्कि उस अनंत जलराशि का ही एक अंश होता।
सामने वह स्वर्ण-द्वार खड़ा है—
एक प्रकाश-पुंज, जो मोक्ष का दंभ भरता है,
किन्तु क्या वह द्वार गंतव्य है या केवल एक भ्रम?
विस्मृति के इस ऊबड़-खाबड़ पथ पर चलते हुए
पांवों के छाले सत्य हैं, पर वह द्वार... शायद स्वप्न।
वृक्ष की शाखाओं से लटकते ये पत्र,
मनुष्यों की आदिम प्रार्थनाओं के अवशेष हैं,
लिपटे हुए अपनी-अपनी आस्थाओं के धागों में।
क्या ऊपर उड़ते इन पक्षियों को ज्ञात है—
कि आकाश की शून्यता ही उनका एकमात्र विश्राम है?
खुली पुस्तक के ये कोरे पृष्ठ साक्षी हैं,
कि मैंने शब्दों में ईश्वर को खोजना चाहा था,
पर हर वर्ण एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर रह गया।
स्याही सूख गई, पर वह परम-ज्ञान नहीं उतरा—
जो इस दृश्य और अदृश्य के बीच की खाई भर सके।
यदि यह सृष्टि किसी रचनाकार की कृति है,
तो उसने सौंदर्य में इतना विषाद क्यों पिरोया?
सूर्य का डूबना जितना मनोरम है, उतना ही भयकारी भी,
कि प्रकाश के जाने के बाद जो शेष बचता है,
वह केवल मेरा अपना एकांत है—अपरिचित और अगाध।
मैं स्वयं से पूछता हूँ इस मौन प्रहर में,
क्या विश्वास करना सरल है या संशय में जीना?
श्रद्धा एक सुखद आवरण हो सकती थी,
पर मेरी चेतना ने उन जंजीरों को अस्वीकार कर दिया—
जो प्रमाण के अभाव में नतमस्तक होना सिखाती हैं।
पुष्प खिलते हैं चट्टानों के बीच भी,
बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी ईश्वरीय विधान के।
उनकी गंध में कोई दर्शन नहीं, केवल अस्तित्व है।
शायद जीवन का सुख इसी 'होने' के बोध में था,
जिसे मैंने तर्कों की कसौटी पर व्यर्थ ही कसा।
अब रात का अंधकार धीरे-धीरे उतरेगा,
पर्वतों की ओट से संशय और गहरा होगा।
मैं न आस्तिक हूँ, न नास्तिक—बस एक यात्री हूँ,
जो इस अज्ञेय ब्रह्मांड के सम्मुख मौन खड़ा है,
यह जानते हुए कि उत्तर शायद कभी नहीं मिलेंगे।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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