"स्वयं की ओर लौटता हुआ मनुष्य"
पंकज शर्मावर्षों तक
मैंने स्वयं को
भीड़ के अंतिम छोर पर रखा—
जैसे दीपक
अपने ही तले का अंधकार
कभी नहीं देखता।
दूसरों के दुःख
मेरे कंधों पर उगते रहे,
और मैं
अपनी थकान को
कर्तव्य का दूसरा नाम
समझता रहा।
एक दिन
मौन ने पूछा—
“तुम अपने भीतर
कब लौटोगे?”
उस प्रश्न ने
अचानक
मेरी आत्मा की दीवार पर
दस्तक दी।
मैं चुप था,
क्योंकि उत्तर
मेरे पास नहीं,
मेरी उपेक्षाओं के पास था।
मैंने देखा—
भीतर एक मनुष्य
धीरे-धीरे सूख रहा था।
वह मुस्कुराता अवश्य था,
पर उसकी आँखों में
एक अनाम परित्याग
राख की तरह जम गया था।
मैंने पहली बार
उसके कंधे पर
अपना हाथ रखा।
यह स्वार्थ नहीं था—
केवल
अपने अस्तित्व की धड़कन
सुन लेने की इच्छा थी।
जो वृक्ष
सदैव छाया देता है,
उसे भी
कभी-कभी
अपने लिए धूप चाहिए।
अब
मैं हर पुकार पर
तुरंत नहीं टूटता।
कुछ मौन
मैंने अपने लिए बचाए हैं,
कुछ साँसें
अपने भीतर लौटने के लिए।
यह परिवर्तन
कोलाहल नहीं,
एक धीमा आत्म-स्मरण है।
मैंने जाना—
स्वयं को खोकर
किसी और को
पूर्ण नहीं किया जा सकता।
अपूर्ण मनुष्य
केवल
अपूर्ण सहारों का निर्माण करता है।
इसलिए अब
मैं अपने भीतर
एक दीप बचाकर रखता हूँ।
कभी-कभी
अब भी अपराध-बोध
दरवाज़े पर दस्तक देता है।
पर मैं
उससे कहता हूँ—
“अपने लिए जीना
त्याग का विरोध नहीं,
उसकी आधारशिला है।”
और तब
भीतर का अंधेरा
थोड़ा कम हो जाता है।
अब मैं
भीड़ में भी
अपने पदचिह्न पहचान लेता हूँ।
मैंने स्वयं को
सबसे आगे नहीं,
पर सबसे पीछे भी
रखना छोड़ दिया है।
यह लौटना
किसी विजय का शोर नहीं—
केवल
एक मनुष्य का
धीरे-धीरे
अपने ही पक्ष में खड़ा हो जाना है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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