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शहर और गाँव...

शहर और गाँव...

संजय जैन

प्रदूषित हवाओं ने बदल दिया
शहर का हवा पानी आदि।
पर गाँव की हवा पानी
पहले से ही स्वच्छ है।
शुध्द जलवायु के लिए
तरस् रहे है देखो शहर।
पर गाँव वाले मस्त और
स्वास्थ्य रहकर जी रहे।।


चार पैसे कमाने के लिए
शहर में भाग दौड़ करते है।
गाँव वाले भी पैसे कमाते
पर अपने अनुसार चलते है।
खुद पैदा करके खाते
और सबको खिलाते है।
पर शहर वालों को देखो
खुदका खुद ही खाते है।।


अगर शहर में आ जाये
एक-दो मेहमान आदिजन।
तो घर का माहौल फिर
अस्त-व्यस्त हो जाता है।
पर गाँवो में उल्टा होता
स्वागत सत्यकार का दौर चलता।
और फरक गाँव और शहर का
सभी को दिखने लगता।।


वही गाँव के बच्चें आदि
जब तक गाँव में रहते थे।
संस्कारों और आदर के भाव
उन सभी के दिलमें रहते थे।
पर शहर की हवा लगते ही
सारे रिश्तें धूमिल होने लगते।
इसलिए बड़े-बूढ़े कहने लगते
जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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