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वटसावित्री-व्रत

वटसावित्री-व्रत

श्री मार्कण्डेय शारदेय
(ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र विशेषज्ञ)
कल (शनिवार, 16.05.026) वटसावित्री का व्रत है।हमारे यहाँ सुहागिनें अपने सुहाग के लिए यह व्रत करती हैं।यहाँ वट और सावित्री दो शब्द हैं।वट बरगद के पेड़ का वाचक है।इसे यमप्रिय तथा रुद्रस्वरूप भी कहा गया है।दोनों नामों में ही संहारकता है।
यों तो इस व्रत में चतुर्दशी को उपवास विहित है।परन्तु; अशक्यता या जिस कारण प्रचलन में है कि स्त्रियाँ जेठ की अमावस्या को वटवृक्ष में सावित्री-सत्यवान की पूजा करती हैं।
भारतीय संस्कृति में राजकन्या सावित्री की बड़ी महिमा है।उन्होंने अपने पातिव्रत से अपने मृत पति को यमराज से छुड़ाकर नवजीवन दिया।इसी कारण विवाह में हम नवदम्पती को आशीर्वाद में कहते हैं: “वरश्चिरंजीवी भूयात्, कन्या च सावित्री भूयात्” (वर चिरंजीवी हो तथा कन्या सावित्री की तरह सदाचारिणी हो।)।वर की चिरंजीविता ही कन्या की अवैधव्यता है, जो भारतीयता की निधि है।हमारे यहाँ कन्या के पुनर्विवाह की शास्त्रीयता नहीं है।कारण कि कन्यादान एक बार ही होता है, दुबारा नहीं। इसलिए वह परपुरुष के साथ कभी संगम नहीं कर सकती है।वहीं पुरुष के लिए भी यही शास्त्रीयता है कि पाणिग्रहण की गई पत्नी चाहे जैसी हो, क्यों न वह कुलक्षणी, पुंश्चली ही हो, तो भी त्याज्य नहीं है।उदाहरणार्थ देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को चन्द्रमा ने हर लिया। उनसे तारा के गर्भ में बुध रहा तो भी देवगुरु ने अपनी पत्नी को अपनाया।
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