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अयोध्या की महिमा: जब तीर्थों ने किया अयोध्या का तर्पण

अयोध्या की महिमा: जब तीर्थों ने किया अयोध्या का तर्पण

सत्येन्द्र कुमार पाठक
वह त्रेता युग का एक शांत कालखंड था। अयोध्या की गलियाँ प्रभु राम के राज्य में सुख-शांति से सराबोर थीं। लक्ष्मण जी, जो साक्षात शेषनाग के अवतार थे, उनके मन में एक दिन संसार के समस्त पवित्र तीर्थों के दर्शन की इच्छा बलवती हुई। वे प्रभु राम के पास पहुँचे और अत्यंत विनम्र भाव से बोले, "हे राघव! इस दास की इच्छा है कि मैं भारतवर्ष के समस्त पुण्य तीर्थों का दर्शन करूँ और विभिन्न नदियों के जल में स्नान कर आत्मिक शांति प्राप्त करूँ।"
प्रभु राम ने अपने अनुज की आँखों में देखा और मंद-मंद मुस्कराने लगे। उन्होंने बड़े प्रेम से आज्ञा दे दी, "अवश्य जाओ लक्ष्मण, तीर्थाटन से ज्ञान और अनुभव का विस्तार होता है।" किंतु वह मुस्कान लक्ष्मण जी के मन में कौतूहल पैदा कर गई। उन्होंने पूछा भी, "भगवन, मेरी प्रार्थना पर आप मुस्कराए क्यों? क्या मुझसे कोई त्रुटि हुई?" राम जी ने रहस्य बनाए रखा और कहा, "लक्ष्मण, समय आने पर तुम्हें इसका उत्तर स्वतः मिल जाएगा।"
कुलगुरु वशिष्ठ ने श्रावण शुक्ल पंचमी का शुभ मुहूर्त निकाला। लक्ष्मण जी के भीतर उत्साह था, पर राम जी से दूर जाने का एक अनजाना संकोच भी। प्रस्थान के पूर्व की रात्रि वे सो नहीं सके। दो बज चुके थे। उन्होंने सोचा, "यदि अब विश्राम किया तो सूर्योदय के मुहूर्त में विलंब हो जाएगा। क्यों न ब्रह्म मुहूर्त में पहले माँ सरयू के दर्शन कर स्नान कर लिया जाए, फिर यहाँ से विदा लूँ।" जब लक्ष्मण जी सरयू के राजघाट पर पहुँचे, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वहाँ जो दृश्य था, वह अकल्पनीय था। सामान्यतः उस समय अयोध्या शांत होती थी, परंतु आज वहाँ हज़ारों की संख्या में तेजस्वी पुरुष और अलौकिक स्त्रियाँ उपस्थित थीं। चारों ओर एक दिव्य प्रकाश पुंज फैला हुआ था। वे लोग साधारण मनुष्य नहीं लग रहे थे; उनके शरीर से निकलने वाली आभा पूरे तट को प्रकाशित कर रही थी। वे स्नान करते और मौन रहकर आकाश मार्ग से प्रस्थान कर जाता है।
लक्ष्मण जी ठिठक गए। उनके मन में तर्क उठने लगे—"न आज रामनवमी है, न कोई विशेष पर्व, फिर इतनी भीड़? और ये लोग कौन हैं जो भूमि पर पैर रखे बिना ही आकाश की ओर गमन कर रहे हैं?" लक्ष्मण जी उस दिन संकोचवश कुछ पूछ नहीं पाए और वापस लौट आए।अगले दिन जब वे राम जी के सम्मुख गए, तो प्रभु ने प्रश्न किया, "लक्ष्मण! आज तो तुम्हारे प्रस्थान का दिन था, फिर अभी तक स्नान और तैयारी पूर्ण क्यों नहीं हुई?" लक्ष्मण जी ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। राम जी ने प्रेरित करते हुए कहा, "अनुज, यदि मन में जिज्ञासा थी, तो तुम्हें उनसे पूछना चाहिए था। जाओ, आज पुनः प्रयास करो।"
अगले दिन लक्ष्मण जी फिर सरयू तट पर गए। वही दृश्य, वही दिव्यता। इस बार उन्होंने साहस जुटाया और हाथ जोड़कर उन दिव्य पुरुषों के मार्ग में खड़े हो गए। उन्होंने विनम्रता से पूछा, "हे महापुरुषों! आप कौन हैं और इस निर्जन बेला में यहाँ किस प्रयोजन से आए हैं?" उन दिव्य पुरुषों ने रुककर उत्तर दिया, "हे सुमित्रा नंदन! हम काशी, गया, जगन्नाथ पुरी, बद्रीनाथ, केदारनाथ और द्वारिका जैसे भारत के अडसठ (68) करोड़ तीर्थ हैं। हम देवताओं का रूप धरकर नित्य प्रति अयोध्या की इस पावन रज को माथे पर लगाने और सरयू जी के जल में स्नान कर स्वयं को पवित्र करने आते हैं।"
लक्ष्मण जी अवाक रह गए। जिसे वे 'जल' समझ रहे थे, वह समस्त ब्रह्मांड की शुद्धि का स्रोत था। इसके बाद वे महिला घाट की ओर गए, जहाँ दिव्य देवियाँ स्नान कर रही थीं। पूछने पर ज्ञात हुआ कि वे गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा और शिप्रा जैसी नदियाँ हैं। गंगा जी ने कहा, "लक्ष्मण, संसार के पापी हमारे जल में अपने पाप धोते हैं। उन पापों के भार से जब हम बोझिल हो जाते हैं, तो प्रभु की जन्मभूमि अयोध्या की शरण में आकर स्वयं को निर्मल करते हैं।"
उसी समय लक्ष्मण जी ने एक और अद्भुत घटना देखी। आकाश से एक अत्यंत काला, डरावना और विकराल पुरुष उतरा। वह देखने में ऐसा लग रहा था जैसे संसार भर की कालिमा उसी में समा गई हो। वह पुरुष सरयू की मुख्य धारा में कूदा। कुछ क्षणों बाद जब वह जल से बाहर निकला, तो उसका रूप पूरी तरह बदल चुका था। अब वह गौर वर्ण का था, उसके चार हाथ थे जिनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। लक्ष्मण जी ने ऋषियों से पूछा, "यह भयानक पुरुष कौन था और क्षण भर में यह भगवान विष्णु के समान तेजस्वी कैसे हो गया?" ऋषियों ने उत्तर दिया, "लक्ष्मण, ये तीर्थराज प्रयाग हैं। प्रयाग को सभी तीर्थों का राजा कहा जाता है, जहाँ करोड़ों लोग अपने पाप धोते हैं। उन पापों के कारण इनका रंग काला पड़ जाता है। उस कालिमा से मुक्ति पाने के लिए तीर्थराज स्वयं प्रतिदिन अयोध्या आकर माँ सरयू की गोद में बैठते हैं।"
लक्ष्मण जी का सारा अहंकार और तीर्थाटन का उत्साह विलीन हो गया। वे तुरंत दौड़ते हुए प्रभु राम के चरणों में गिर पड़े। उनकी आँखों से अश्रु बह रहे थे। उन्होंने कहा, "भगवन! मैं कितना अज्ञानी था। मैं कस्तूरी मृग की भाँति उस सुगंध को बाहर ढूँढ रहा था, जो स्वयं मेरे घर (अयोध्या) में बसी है। अब मुझे आपकी उस मुस्कान का अर्थ समझ आया।"
भागवान श्री राम ने उन्हें उठाकर गले लगाया और अत्यंत गंभीर स्वर में कहा:"भैया लक्ष्मण! यह अयोध्या पुरी साक्षात वैकुंठ का ही विस्तार है। जिस नगरी की धूलि को तीर्थराज प्रयाग और गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ तरसती हैं, उसे छोड़कर तुम कहाँ शांति ढूँढने जा रहे थे? जहाँ साक्षात ब्रह्म का वास होता है, वहाँ समस्त तीर्थ स्वयं सेवा में उपस्थित रहते हैं।" यह घटना हमें यह सिखाती है कि हम अक्सर शांति और पवित्रता की खोज में दूर-दराज के स्थानों पर भटकतेहै । जबकि सत्य हमारे भीतर या हमारे अत्यंत निकट होता है। लक्ष्मण जी की यह यात्रा शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गई, क्योंकि उन्हें समझ आ गया कि भक्ति का सबसे बड़ा तीर्थ प्रभु के चरणों में और उनके सान्निध्य में है।
अयोध्या का महत्व केवल भूगोल तक सीमित नहीं है, यह उस श्रद्धा का केंद्र है जहाँ स्वयं 'शुद्धि' भी 'शुद्ध' होने आती है। लक्ष्मण जी का वह संस्मरण आज भी हर भक्त के हृदय में यह विश्वास जगाता है कि यदि हृदय में 'राम' हैं, तो आप जहाँ हैं, वहीं अयोध्या है और वहीं समस्त तीर्थों का वास है।


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