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ज्येष्ठ मास महात्मय {द्वितीय अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {द्वितीय अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्द जी ऋषियों से बोले कि हे ऋषि लोग ! ज्येष्ठ मास में देवताओं के संतुष्टि के निमित्त प्रतिदिन ब्राह्मणों को विशेष रूप से दही चावल का दान देना चाहिये ॥१॥ 

दही चावल दान के महात्म्य को कहने में अहिभूधर (शिवजी) भी असमर्थ हैं फिर भी लोक के निश्चयार्थ में कुछ कहता हूँ ॥ २ ॥ 

हे विप्रलोग ! अलका पुरी में गौतम नाम का एक ब्राह्मण रहता था वह वेद धर्मशास्त्र और पुराणों का ज्ञाता तथा द्रव्य हीन और अत्यन्त दुखी था ।॥३॥ 

उसने कुटुम्ब के पालन पोषण के निमित्त घबड़ाकर समस्त कर्मों को किया और शुभ अशुभ फल जानकर भी समस्त दानों को लिया ॥ ४ ॥ 

तदनन्तर चोरों का साथ कर चोरी की जीविका भी किया परन्तु फिर भी जब उसे कुछ धन न मिला तब वह दूसरे देश को चला गया ।॥५॥ 

और समस्त कुटुम्ब का त्याग कर वह पापबुद्धि ब्राह्मण क्षुधा से आतुर होकर बलि में दिये गये और प्रेत पिण्ड के अन्न से जीविका करने लगा ॥६॥ 

इस तरह शमशान मे बलि खाने वालों के साथ रहकर बलि भोजन करता हुआ समस्त कर्मों से रहित हो गया ॥ ७ ॥ 

और शक्ति हीन, जरा (वृद्धावस्था) से जीर्ण तथा क्षीणायु हो गया। ज्येष्ठ मास के आने पर दही भात खाने वाले ब्राह्मणों के ॥८॥ 

भोजन करने पर उच्छिष्ट पात्रों को तथा समस्त बलिदानों को लेकर उसके अन्न को वायस (पक्षियों) और काकों को कौतुकवश ॥६॥ 

जल सहित देकर उस ब्राह्मण ने स्वेच्छा से स्वयं भी भोजन किया। हे ब्राह्मण लोग इस तरह उसने ज्येष्ठ मास में वलिदान किया किन्तु जानकर नहीं किया ॥ १० ॥ 

जब इस पुण्यकर्म के बाद उसकी मृत्यु हुई तब यमदूतों ने आकर उसी क्षण मे उसको पाश से बाँध दिया ॥ ११ ॥ 

और जब उसे यमलोक को ले जाने लगे तब वह क्रन्दन करने लगा। उसके क्रन्दन करने पर यमदूतों ने मुद्गरों से बहुत मारा। हे राजन् ! इसी बीच मे विष्णु भगवान् के दूत वहाँ आ गये ।।१२।। 

विमान पर सवार उन विष्णुदूतों ने आकर यमदूतों को अलग हटा दिया और दिव्यदेह धारी उस ब्राह्मण को विमान पर बैठाकर स्वर्ग को ले गये ॥ १३ ॥ 

यमदूत लोग उस ब्राह्मण के समाचार को कहने के लिये यमराज के पास गये और यम से कहा कि हे प्रभो! जब हम लोग उस ब्राह्मण को लेने के लिये समीप गये ॥ १४ ॥ 

तब वहाँ विष्णुगणों ने आकर हमलोगों को बहुत पीटा। क्योंकि वे लोग स्वामी से युक्त है और हमलोग नाथहीन हैं इसलिये अब हमलोग क्या करें ।। १५ ।। 

आज से आपकी सेवा न करेंगे, दूसरे व्यापक स्वामी के पास हमलोग जाते हैं। दूत्तों के इस वचन को सुनकर धर्मराज हृदय से क्षुव्ध हो गये ॥ १६ ॥ 

और शीघ्र भैंसा पर सवार होकर क्षणमात्र मे वहाँ पहुँच कर दण्डधारी यमराज ने विष्णु के समान भी उन दूतों को दण्ड से ताड़ित किया ॥ १७ ॥ 

वे सब विष्णुदत विमान को छोड़कर चले गये और उन्होने रमापति विष्णु के पास जाकर सब समाचार निवेदन किया। समाचार सुनकर विष्णु भगवान् क्रोध से रक्तवर्ण हो गये ॥१८॥ 

और पक्षिराज (गरुड़) पर सवार होकर यमलोक को गये । इन्द्रादि समस्त देवताओं को साथ में लेकर विष्णु भगवान् ने यमराज से युद्ध किया ॥ १६ ॥ 

देवता लोग यमदण्ड से अत्यन्त पीटे जाने पर दश दिशाओं में चले गये, उस समय क्रुद्ध होकर विष्णु ने चक्र से यमराज का वध कर दिया ।। २० ।। 

जब देवताओं ने ब्रह्मा को आगे कर विष्णु भगवान् की स्तुति के निमित्त जाकर स्तुति किया, तब स्तुति से प्रसन्न होकर विष्णु ने यमराज को जीवित कर दिया ॥ २१ ॥ 

धर्मराज ने भी उस समय देवेश विष्णु को प्रणाम कर कहा कि हे विष्णो ! अपराध को क्षमा कर । तदनन्तर ब्रह्मा इन्द्र आदि समस्त देवता अपने अपने स्थान को चले गये ॥ २२ ॥ 

हे अनघ ! अज्ञानवश ब्राह्मण ने जो दही चावल का दान किया, उसका प्रभाव वर्णन किया। यदि जानकर दान करता है तो कहना ही क्या है ॥ २३ ॥ 

इसलिये सब उपाय से प्रतिदिन दान देना चाहिये । और मार्ग में थके हुए द्विजातियों को दही चावल भोजन के निमित्त देना ॥ २४ ॥ 

तथा ज्येष्ठ मास मे प्रतिदिन पैर धोना चाहिये ।। २५ ।। 

और ब्राह्मणश्रेष्ठों का सुगन्ध चन्दन से पूजन करे। तथा सुगन्ध पुष्पमाला विविध प्रकार के पानक (आम का पन्ना, मठा, सर्वत) आदि से सत्कार करे ॥ २६ ।। 

और स्वयं सुगन्ध युक्त व्यजन (पह्वा) सेहवा करे । हे ब्राह्मण लोग ! इस प्रकार जो ज्येष्ठ मास में स्नान दान पूजन आदि करते है वे लोग परम गति के भागी होते है ॥ २७ ॥ 

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

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