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सांझ के आंचल में जले, प्रणय मकरंद दीप

जब भावनाएँ शब्दों से आगे बढ़ जाती हैं,
तब उर में स्वयं जल उठते हैं
प्रेम के मकरंद दीप ✨

सांझ के आंचल में जले, प्रणय मकरंद दीप

कुमार महेन्द्र
अलौकिकता का मंद स्पंदन,
उर में पुनीत कामनाएँ।
आशा, उमंग, उल्लास अथाह,
चितवन मधुर भावनाएँ।
कल्पना-पट पर सजे बिंब,
हर आहट बन जाए दीप।
सांझ के आंचल में जले, प्रणय मकरंद दीप।।


हर पल अनंत अभिलाष जगे,
दर्शन को मन हो तत्पर।
मुस्कान सजी उस भव्य छवि में,
आस्था-विश्वास परस्पर।
चाहत की तृष्णा असीम अनूप,
तृप्ति झरे जैसे मंद दीप।
सांझ के आंचल में जले, प्रणय मकरंद दीप।।


परिवेश में बहती मधुर बयार,
नैसर्गिक दृश्य मनमोहक।
संसर्ग-विचारों की सरिता,
सृजन-सृष्टि सदा मोहक।
अंतर-बिंदु का कोमल स्पर्श,
अंग-अंग यौवन संदीप।
सांझ के आंचल में जले, प्रणय मकरंद दीप।।


जन्म-जन्मांतर का यह बंधन,
रग-रग दैविक आभा व्याप्त।
जीवन-पथ की मधुर भाषा में,
हर ओर खुशियाँ, मिटे संताप।
शुभ-मंगल अंतर की तरंगें,
प्रतीक्षा बने मन का प्रदीप।
सांझ के आंचल में जले, प्रणय मकरंद दीप।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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