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कार्यक्रमों की भीड़ में खोती सार्थकता

कार्यक्रमों की भीड़ में खोती सार्थकता

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
आज का समय कार्यक्रमों का समय है। सुबह से शाम तक, किसी न किसी मंच पर, किसी न किसी विषय पर, कोई न कोई आयोजन अवश्य होता है। सेमिनार, सम्मेलन, कार्यशाला, अधिवेशन—नाम भले बदल जाएं, पर एक बात समान रहती है—उनकी बढ़ती संख्या।
लेकिन एक प्रश्न जो अक्सर अनुत्तरित रह जाता है, वह यह है कि इन कार्यक्रमों की वास्तविक सार्थकता क्या है?
क्या ये आयोजन केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं?
क्या इनका उद्देश्य केवल मंच, माला और माइक तक सीमित रह गया है?
क्या हम परिणाम से अधिक प्रदर्शन पर ध्यान देने लगे हैं?
किसी भी कार्यक्रम की सफलता उसकी भव्यता से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव से मापी जानी चाहिए। यदि किसी संगोष्ठी के बाद भी वही समस्याएँ जस की तस बनी रहती हैं, यदि किसी बैठक के बाद भी कोई ठोस निर्णय धरातल पर नहीं उतरता, तो ऐसे आयोजनों की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
सार्थक कार्यक्रम वही है—
जो सोच को झकझोर दे,
जो दिशा दिखाए,
जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बने।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम कार्यक्रमों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता पर ध्यान दें। हर आयोजन के पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका उद्देश्य क्या है, और उसके बाद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसका परिणाम समाज तक पहुँचे।
अन्यथा, यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा—
मंच सजते रहेंगे, भाषण होते रहेंगे, तालियाँ बजती रहेंगी…
परंतु समाज वहीं का वहीं खड़ा रहेगा।
समय आ गया है—प्रदर्शन से आगे बढ़कर, परिणाम की ओर सोचने का।


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