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दारू

दारू

दारू पूछे मेहरारू से ,
काहे नफरत दारू से ।
हमरे कारण पति‌ के ,
आरती उतारे झाड़ू से ।।
हम बानी सभे खातिर ,
एक बेर तू पी के देखs ।
हमरा ला रहबू बेचैन ,
हमरा ला जी के देखs ।।
हमर तोहर जात एके ,
तू त कैद रहेलू घर में ।
बोतल में हम कैद रहीं ,
तबहूॅं दरद काहे सर में ।।
तू दिल बसs चाहे ना ,
हम बसीं उनके दिल में ।
बड़ बनहीं के चाहत में ,
तू चलेलू ऊॅंच हिल में ।।
घर से निकलेलू जब तू ,
बाहर तूहूॅं खूब घूमेलू ।
मिलल घूमे का मोका ,
खुशी में तू खूब झूमेलू ।।
हम रहिले हमेशा कैद ,
हम कहाॅं बानीं आजाद ।
बोतल से गिलासे आईं ,
तब करिं उनके आबाद ।।
तू जेकर उड़ावेलू नीन ,
बेनीन के नीन सुताईले ।
हम त तोहर सहयोगी ,
तब काहे दुत्कार पाईले ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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