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महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की प्रतिमा स्थल पर जुटे शहर के साहित्यकार, कवि और रसिक श्रोता

महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की प्रतिमा स्थल पर जुटे शहर के साहित्यकार, कवि और रसिक श्रोता

मुजफ्फरपुर, 5 जुलाई 2026।
हिंदी साहित्य के अप्रतिम साधक, महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की स्मृति को समर्पित मासिक "महावाणी स्मरण सह काव्य गोष्ठी" का आयोजन रविवार को निराला निकेतन, मुजफ्फरपुर स्थित उनकी प्रतिमा स्थल पर अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। प्रत्येक माह आयोजित होने वाली इस प्रतिष्ठित साहित्यिक परंपरा में शहर के वरिष्ठ कवियों, साहित्यकारों, गीतकारों तथा साहित्यप्रेमियों ने सहभागिता कर काव्यधारा को समृद्ध किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह ने की, जबकि मंच संचालन प्रख्यात साहित्यप्रेमी दीनबंधु आजाद ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ कवि अंजनी कुमार पाठक द्वारा महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के गीतों के स्मरण तथा शिवभक्ति से ओतप्रोत रचना "जय भोलेनाथ, जय शिवशंकर / दीनों के नाथ, दीनानाथ शंकर" के सस्वर पाठ से हुआ। उनकी प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया और श्रोताओं को आध्यात्मिक भावभूमि से जोड़ दिया।

काव्य गोष्ठी में विविध रसों और भावों की प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ देखने को मिलीं। वरिष्ठ कवि जगदीश शर्मा ने अपनी हास्य-व्यंग्य रचना "किसी विधि से अपनी व्यथा, कथा आज कहें" प्रस्तुत कर समाज की विसंगतियों पर तीखा लेकिन मनोरंजक प्रहार किया। अध्यक्षीय उद्बोधन से पूर्व डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह ने अपनी मार्मिक रचना "बेटी है घर का सम्मान" सुनाकर समाज में बेटियों के महत्व और सम्मान का संदेश दिया।

व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर उमेश राज ने अपनी चर्चित पंक्तियाँ "गली के सारे कुत्ते दरबारी हो गये / खाकर के छिछड़ा सब शिकारी हो गये" सुनाकर समकालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखा कटाक्ष किया, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।

मंच संचालक दीनबंधु आजाद ने अपनी प्रेरणादायी रचना "ईश्वर का दिया कभी अल्प नहीं होता / जो टूट जाए वो संकल्प नहीं होता" के माध्यम से जीवन में आस्था, धैर्य और संघर्ष की महत्ता को रेखांकित किया। उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित जनों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया।

वरिष्ठ पत्रकार एवं गीतकार प्रमोद नारायण मिश्र ने विरह रस से ओतप्रोत अपनी भावपूर्ण रचना "आज कहने दो, वरना कह न पाएंगे" का पाठ किया। उनकी संवेदनशील प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावुक कर दिया और वातावरण में गहन आत्मीयता का संचार हुआ।

कवि अशोक भारती ने अपनी प्रेरणादायी पंक्तियाँ "क्या चला कोई कमी है दूसरों के पांव में / धूप में चलना भी सीखो, करोगे छाँव में" सुनाकर आत्मनिर्भरता और संघर्षशीलता का संदेश दिया। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार रामवृक्ष राम 'चकपुरी' ने चिकित्सकों की सेवा भावना को समर्पित रचना "सफेद कोट पहने धरती का, वे फरिश्ते लगते हैं" प्रस्तुत कर मानवता की सेवा में जुटे चिकित्सकों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।

युवा कवि अरुण कुमार तुलसी ने अपनी प्रेरक पंक्तियाँ "दरियों को है क्या समंदर से वास्ता / मिलने की जुनून में खोज ही लेता रास्ता" सुनाकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास का संदेश दिया। वरिष्ठ कवयित्री उषा किरण श्रीवास्तव ने अपनी तीखी सामाजिक व्यंग्य रचना "केंचुए में सांप रहते थे कभी / अब केंचुए में आदमी रहने लगा है" प्रस्तुत कर बदलते सामाजिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।

कवि कबीर श्री ने अपनी दार्शनिक और आध्यात्मिक रचना "मैं भीतर हूँ पुजारी भी, और बाहर हूँ भिखारी भी" सुनाकर आत्मचिंतन और जीवन के द्वंद्व को अभिव्यक्त किया। उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने विशेष सराहना दी।

कार्यक्रम के अंत में समाजसेवी मोहन प्रसाद सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी कवियों, साहित्यकारों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की साहित्यिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में इस प्रकार की मासिक काव्य गोष्ठियों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

गोष्ठी में शहर के साहित्यप्रेमी सोनू कुमार, विशेष पाण्डेय, खुशी राज, तन्वी कुमारी, सुनील कुमार तथा राजीव कुमार श्रोता के रूप में उपस्थित रहे। उनकी सक्रिय सहभागिता ने कार्यक्रम को और अधिक सफल एवं सार्थक बनाया।संपूर्ण कार्यक्रम साहित्य, संस्कृति, सामाजिक चेतना, अध्यात्म और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम बनकर उभरा। उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने इसे आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की स्मृति को समर्पित एक सफल एवं प्रेरणादायी आयोजन बताते हुए भविष्य में भी ऐसी गोष्ठियों के निरंतर आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया।


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