उत्तराखंड संस्कृति: भौगोलिक, दार्शनिक एव ऋषि परंपरा
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय मनीषा ने समय को एक रेखीय (Linear) बिंदु के रूप में नहीं, बल्कि एक चक्रायमान (Cyclical) और अनंत प्रवाह के रूप में देखा है। सनातन संस्कृति में काल-गणना की सबसे वृहद् और वैज्ञानिक इकाइयों में से एक 'मन्वनतर' है। एक मन्वंतर की अवधि 306,720,000 सौर वर्ष होती है, जिसमें मानव चेतना, भूगोल, ज्ञान-विज्ञान और उपासना पद्धतियों का क्रमिक विकास एवं रूपांतरण होता है। सृष्टि के प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर (वैचारिक स्थापना का काल) से लेकर वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर (व्यावहारिक कर्म और विविधता का काल) तक के विस्तृत फलक को समाहित करता है। इसके साथ ही, देवभूमि उत्तराखंड के भू-आध्यात्मिक नदी तंत्र, हिमालय की गगनचुंबी पर्वतमालाओं, पंच-उपासना (शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर, ब्रह्म) और भारद्वाज, अत्रि एवं अगस्त्य जैसे महाऋषियों के उस कालजयी अवदान का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण है, जिसने भारत को एक अखंड सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में पिरोया है।।मन्वंतरों के परिवर्तन के साथ न केवल पृथ्वी की भौगोलिक संरचना बदलती है, बल्कि मानव की आत्मिक और सामाजिक चेतना का स्वरूप भी सूक्ष्म से स्थूल की ओर बढ़ता है। स्वायंभुव से वैवस्वत मन्वंतर तक पंच-उपासना पद्धतियों का विकास इसका साक्षात प्रमाण है।।स्वायंभुव मन्वंतर में अवदान: यह सृष्टि का उषाकाल था। इस समय ब्रह्म संस्कृति अपने शुद्धतम, निराकार और ज्ञान-प्रधान रूप में विद्यमान थी। ब्रह्मा जी ने अपने संकल्प मात्र से मानस पुत्रों (सप्तऋषियों) को उत्पन्न किया। इस काल में 'यज्ञ' केवल भौतिक अग्नि में आहुति देना नहीं था, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संतुलन (ऋत) को बनाए रखने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया थी। उपनिषदों का मूल दर्शन, जहाँ जीव और ब्रह्म की एकता की बात की गई, इसी काल की वैचारिक देन है।
वैवस्वत मन्वंतर में अवदान: वर्तमान मन्वंतर में ब्रह्म संस्कृति का व्यावहारिक विस्तार हुआ। प्रजापतियों के माध्यम से वंश-परंपरा और सामाजिक नियमों का निर्माण हुआ। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथों के माध्यम से अमूर्त ब्रह्मज्ञान को सामाजिक विधि-विधान (Societal Laws) और आचार-संहिता में बदला गया। गुरुकुल परंपरा इसी संस्कृति की देन है। स्वायंभुव मन्वंतर काल के ऋषि 'मंत्र-द्रष्टा' थे। उन्होंने अपनी उच्च ध्यान-अवस्था में प्रकृति के गूढ़तम स्पंदनों को सुना और उन्हें 'वेद मंत्रों' के रूप में अभिव्यक्त किया। यह वह काल था जब शब्द और अर्थ का संधान हुआ। विज्ञान, खगोल, और छंद शास्त्र की बुनियादी अवधारणाएं इसी मन्वंतर में ऋषियों द्वारा खोजी गईं। वैवस्वत मन्वंतर युग में ऋषि केवल वनों में ध्यान लगाने वाले साधक नहीं रहे, बल्कि वे 'समाज-शिल्पी' और राष्ट्र-नियामक बने। वशिष्ठ, विश्वामित्र और वामदेव जैसे ऋषियों ने राजसत्ता को धर्मसत्ता के अधीन रखकर लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। वेदों का वर्गीकरण हुआ, इतिहास और पुराण लिखे गए ताकि जनसाधारण तक ज्ञान सुलभ हो सके।
शैव संस्कृति:।स्वायंभुव मन्वंतर में भगवान शिव को आदिगुरु, दक्षिणामूर्ति और महायोगी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस मन्वंतर में शैव संस्कृति पूर्णतः अद्वैत, वैराग्य और समाधि-प्रधान थी। मानसरोवर और कैलाश इस चेतना के मूल केंद्र थे। शिव ने सर्वप्रथम सप्तऋषियों को योग का उपदेश देकर मानव शरीर के भीतर छिपी ब्रह्मांडीय चेतना के विज्ञान को प्रकट किया था। सती-प्रसूति प्रसंग और दक्ष-यज्ञ विध्वंस के उपरांत इस मन्वंतर में शैव संस्कृति का वैदिक संस्कृति के साथ पूर्ण समन्वय हुआ। शिव अब केवल कैलाश पर बैठने वाले वैरागी नहीं, बल्कि 'भक्त-वत्सल' आशुतोष बने। द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थापना हुई। केदारनाथ, काशी, सोमनाथ और पशुपतिनाथ जैसे केंद्र लोक-चेतना के मुख्य आधार बने, जहाँ तंत्र, योग और भक्ति का समन्वय है। स्वायंभुव मन्वंतर में शक्ति को 'प्रकृति' और 'मूलाधार ऊर्जा' के रूप में पूजा गया। स्वयं ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण की सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के मूल स्वरूप की आराधना की थी। इस काल में शक्ति का स्वरूप ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने वाली अव्यक्त सत्ता का था।: वैवस्वत मन्वंतर में शाक्त संस्कृति का अभूतपूर्व लोक-कल्याणकारी रूप प्रकट हुआ। यह काल जगदम्बा के विभिन्न अवतारों (दुर्गा, महिषासुरमर्दिनी, काली) का है, जिन्होंने असुरों का संहार कर धर्म की रक्षा की। सती के देह-त्याग के बाद धरती पर ५१ शक्तिपीठों का प्राकट्य हुआ। इन पीठों ने (जैसे उत्तराखंड में धारी देवी, कुंजापुरी, सुरकंडा) तंत्र साधना और सात्विक मातृ-पूजा के महान सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में समाज को वैचारिक और मानसिक सुरक्षा प्रदान की
वैष्णव संस्कृति: यज्ञ पुरुष से अवतारवाद और भक्ति योग तक - स्वायंभुव मन्वंतर में अवदान: इस काल में भगवान विष्णु 'यज्ञ पुरुष' के रूप में वंदित थे। स्वायंभुव मनु के यज् की रक्षा के लिए वे स्वयं अवतरित हुए। इसी मन्वंतर में कर्दम ऋषि और देवहूति के यहाँ विष्णु का 'कपिल मुनि' के रूप में अवतार हुआ, जिन्होंने संसार को सांख्य दर्शन दिया, जो आज भी भारतीय दर्शन का तार्किक आधार है । वैवस्वतमन्वंतर पूर्णतः वैष्णव अवतारों का स्वर्णकाल है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन से लेकर परशुराम, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और योगेश्वर श्री कृष्ण के अवतार इसी मन्वंतर की विभूतियां हैं। ईश्वर का साकार रूप में आना, दुष्टों का दमन करना और श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से 'कर्मयोग' एवं 'भक्तियोग' को स्थापित करना इस मन्वंतर में वैष्णव संस्कृति का सबसे बड़ा अवदान है।
सौर संस्कृति: स्वायंभुव मन्वंतर मे सूर्य को जगत की आत्मा (सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च) मानकर गायत्री मंत्र के माध्यम से उनके आंतरिक तेज की उपासना की गई। काल-गणना के वैज्ञानिक आधार, ऋतु चक्र का ज्ञान और आरोग्यता के लिए सूर्य-किरण चिकित्सा का विकास इसी काल में हुआ। वैवस्वत मन्वंतर के अधिपति ही सूर्य-पुत्र वैवस्वत मनु हैं, अतः इस काल में साक्षात 'सूर्यवंश' (इक्ष्वाकु वंश) की स्थापना हुई, जिसमें आगे चलकर राजा हरिश्चंद्र, भगीरथ और श्री राम जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया। यमुनोत्री का सूर्यकुंड, कोणार्क का सूर्य मंदिर और मार्तंड इसके जीवंत प्रतीक बने।।युगप्रवर्तक महाऋषियों का कालजयी मन्वंतरों के इस विशाल प्रवाह में ऋषियों ने केवल मंत्रों की रचना नहीं की, बल्कि कृषि, आयुर्वेद, रक्षा विज्ञान, विमान शास्त्र और भू-राजनीति में ऐसे अनुसंधान किए जो आज के आधुनिक विज्ञान को भी चकित करते हैं। ऋषि संस्कृति - ऋषि अत्रि: खगोल विज्ञान एवं पारिवारिक मर्यादा के प्रणेता मूलतः स्वायंभुव मन्वंतर के ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं, परंतु अपनी योग शक्ति और दीर्घायुष्य के कारण वे वैवस्वत मन्वंतर के त्रेतायुग (रामायण काल) में भी मानव जाति का मार्गदर्शन करते दिखाई देते हैं। इनका मुख्य साधना केंद्र मध्य भारत का चित्रकूट वन क्षेत्र रहा, किंतु इनका प्रभाव क्षेत्र उत्तराखंड के मंदाकिनी-अलकनंदा बेसिन (गोपेश्वर के समीप सती अनसूया आश्रम, चमोली) तक विस्तृत था ऋग्वेद के पांचवें मण्डल के मुख्य द्रष्टा ऋषि अत्रि हैं। वैदिक वास्तुकला और खगोल विज्ञान में उनका योगदान अद्वितीय है। उन्होंने संसार का प्रथम सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) देखा और उसकी गणना की। ऋग्वेद में वर्णन आता है कि जब स्वर्भानु (राहु) ने सूर्य को ढक लिया और चारों ओर अंधकार छा गया, तब ऋषि अत्रि ने अपनी विशिष्ट मंत्र-शक्तियों (तुरीय यंत्र और ध्यान) से सूर्य को पुनः प्रकाशमान किया। यह सूर्य के कोरोना (Corona) और ग्रहण की अवधि का पहला वैज्ञानिक प्रलेखन था।
ऋषि : अत्रि और उनकी पत्नी माता अनसूया ने समाज को पारिवारिक शुचिता और 'पतिव्रत धर्म' का पहला व्यावहारिक पाठ पढ़ाया। उनकी तपस्या के बल पर ही त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के एकीकृत अंश के रूप में भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ, जिन्हें योग और अवधूत परंपरा का आदि गुरु माना जाता है।
ऋषि भारद्वाज: वैमानिक शास्त्र और आयुर्वेद के महावैज्ञानिक वैवस्वत मन्वंतर के त्रेतायुग के महानतम मनीषी। वे देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे। इनका मुख्य केंद्र प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में गंगा-यमुना के पावन संगम पर स्थित विशाल गुरुकुल था, जो उस काल का सबसे बड़ा 'अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय' था, जहाँ १०,००० से अधिक विद्यार्थी निःशुल्क शिक्षा, आवास और शोध की सुविधा पाते थे। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के दून घाटी (देहरादून) और पर्वतीय क्षेत्रों में इन्होंने जड़ी-बूटियों के संकलन हेतु लंबी यात्राएं कीं। ऋषि भारद्वाज प्राचीन भारत के सर्वश्रेष्ठ विमान इंजीनियर थे। उनके द्वारा रचित महाग्रंथ 'यंत्र सर्वस्व' का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 'वैमानिक शास्त्र' है। इसमें विमान बनाने की कला, धातुओं का सम्मिश्रण (Metallurgy), बादलों के प्रकार, सौर ऊर्जा से विमान चलाने की तकनीक और तीन मुख्य श्रेणियों के विमानों— शकुन विमान, सुंदर विमान, और रुक्म विमान का विशद विवरण है, जो जल, थल और नभ तीनों में गति कर सकते थे । चरक संहिता के अनुसार, जब पृथ्वी पर मानव जाति विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो गई, तब समस्त ऋषियों की सभा ने भारद्वाज को देवराज इंद्र के पास 'आयुर्वेद' का पूर्ण ज्ञान लाने के लिए नियुक्त किया। भारद्वाज ने त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के विज्ञान को समझा और उसे धरती पर लाकर पुनर्वसु आत्रेय जैसे शिष्यों को सिखाया। वे आयुर्वेद को एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित करने वाले प्रथम पुरुष हैं।: वनवास काल में जब श्री राम प्रयाग पहुंचे, तब भारद्वाज मुनि ने ही उन्हें सामरिक और सुरक्षा की दृष्टि से सबसे उपयुक्त स्थान 'चित्रकूट पर्वत' पर निवास करने का सुझाव दिया था।
ऋषि अगस्त्य: उत्तर-दक्षिण के सांस्कृतिक सेतु और रक्षा विज्ञानी वैवस्वत मन्वंतर के एक अत्यंत तेजस्वी और युगप्रवर्तक ऋषि, जिन्हें 'घटज' (कुंभज) भी कहा जाता है। इनका प्रारंभिक तपोवन उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित 'अगस्त्यमुनि' नामक स्थान था। उत्तर भारत में अपनी साधना पूर्ण करने के उपरांत वे दक्षिण भारत के पोथियाई हिल्स (तमिलनाडु) में स्थायी रूप से निवास करने चले गए प्राचीन काल में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विंध्याचल पर्वत एक अभेद्य बाधा बनकर खड़ा था, जिससे दोनों क्षेत्रों का सांस्कृतिक विनिमय रुका हुआ था। ऋषि अगस्त्य ने अपने तपोबल और कूटनीति से विंध्याचल को झुकने पर विवश किया और उसे पार कर दक्षिण भारत गए। उन्होंने संपूर्ण भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया, इसीलिए उन्हें 'प्रथम सांस्कृतिक राजदूत' कहा जाता है। दक्षिण भारत जाकर ऋषि अगस्त्य ने तमिल भाषा को परिष्कृत किया और 'अगस्तियम' नामक प्रथम व्याकरण ग्रंथ की रचना की। उन्हें तमिल सिद्ध चिकित्सा पद्धति और कलरीपायट्टु (प्राचीन युद्ध कला) का भी जनक माना जाता है। लंका युद्ध के दौरान जब भगवान श्री राम मानसिक रूप से थक चुके थे, तब ऋषि अगस्त्य ने ही उन्हें 'आदित्य हृदय स्तोत्र' की दीक्षा दी थी। उन्होंने समुद्र के जल-प्रबंधन और नौकायन विज्ञान पर भी 'अगस्त्य संहिता' में महत्वपूर्ण सूत्र दिए, जिसमें विद्युत उत्पादन की प्रारंभिक विधियों का भी संकेत मिलता है।
उत्तराखंड केवल एक प्रशासनिक राज्य नहीं, बल्कि एक विशाल भौगोलिक जगन्नाथपुरी है, जहाँ उच्च हिमालय की चोटियां ऋषियों की तपस्या के शिखरों जैसी हैं और नदियां साक्षात चेतना का प्रवाह हैं।
भू-आकृति विज्ञान के अनुसार उत्तराखंड को तीन स्पष्ट पर्वत श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:बाह्य हिमालय या शिवालिक श्रेणी को पौराणिक काल में 'मैनाक पर्वत' कहा जाता था। इसकी ऊंचाई ७०० से १,२०० मीटर के बीच है। लघु या मध्य हिमालय श्रेणी: के अंतर्गत मसूरी रेंज, रानीखेत की पहाड़ियां और दूधातोली की सुरम्य पर्वत श्रृंखलाएं आती हैं। उच्च या वृहद् हिमालय श्रेणी:सदा हिमाच्छादित रहने वाली चोटियों की श्रृंखला है। उत्तराखंड की सर्वोच्च चोटी नंदा देवी (7,817 मीटर) इसी में स्थित है। इसके अतिरिक्त कामेट, चौखंबा, नीलकंठ, केदारनाथ और त्रिशूल चोटियां इसी श्रेणी का गौरव हैं। (ज्ञातव्य है कि 'धौलागिरी' पर्वत श्रृंखला उत्तराखंड में नहीं, बल्कि नेपाल हिमालय का हिस्सा है)।
. शिवालिक पर्वतमाला: शिवालिक श्रेणी, जो हिमालय का पाद-प्रदेश (Foothills) है, जल स्रोतों और घने जंगलों से समृद्ध है।: इस श्रेणी से मुख्यतः गौला नदी, कोसी नदी (कुमाऊं मंडल), रतमऊ, सोलानी, और आसन नदी का उद्गम एवं जलग्रहण क्षेत्र जुड़ा हुआ है। ये नदियां मैदानी भागों में प्रवेश करने से पहले शिवालिक की पहाड़ियों से तीव्र वेग से उतरती हैं।: शिवालिक की तलहटी और दून घाटियों में ही उत्तराखंड के सबसे समृद्ध और ऐतिहासिक नगर बसे हैं: हरिद्वार: मोक्ष नगरी, जहाँ गंगा पहाड़ों को छोड़कर पहली बार मैदान में आती है।
देहरादून: शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच बसी देश की प्रसिद्ध दून घाटी। ऋषिकेश: योग की वैश्विक राजधानी।।हल्द्वानी, रामनगर और टनकपुर: कुमाऊं क्षेत्र के मुख्य व्यापारिक द्वार जो शिवालिक की गोद में स्थित हैं।।चमोली जिला: बद्री विशाल का साम्राज्य और : नंदा देवी, कामेट, त्रिशूल पर्वत (जो दूर से भगवान शिव के त्रिशूल जैसा प्रतीत होता है), नर और नारायण पर्वत (जो बद्रीनाथ धाम के पार्श्व में रक्षक बनकर खड़े हैं), द्रोणागिरी (जहाँ से हनुमान जी संजीवनी बूटी लाए थे) और नीलकंठ (जिसे हिमालय का आभूषण कहा जाता है)।।प्रमुख नदियां: में अलकनंदा (मुख्य जीवन रेखा), सरस्वती (माणा गांव में बहती अदृश्य नदी), पश्चिमी धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडर (पंडारक), ऋषिगंगा और लक्ष्मणगंगा है।
रुद्रप्रयाग जिला में केदारनाथ की शैव भूमि पर : केदारनाथ चोटी, चौखंबा पर्वत (चार शिखरों वाला महाशैल), मणिकर्णिका पर्वत और मदमहेश्वर चोटी। : मंदाकिनी (चोराबाड़ी से निकलने वाली वेगवती नदी), सोनगंगा (वासुकी गंगा जो वासुकी ताल से आती है), अलकनंदा (श्रीनगर और पौड़ी की सीमा बनाते हुए) और लस्तर नदी। है। देहरादून जिला में : दून घाटी का वैभव और मसूरी हिल रेंज, भद्रराज पर्वत, चक्राता की पहाड़ियां और ऐतिहासिक जौनसार-बावर की पहाड़ियां एवं यमुना नदी (कालसी क्षेत्र), टोंस नदी (तमसा), आसन नदी, सुसवा, रिस्पना और बिंदाल नदी है। हरिद्वार जिला में : गंगा का महाद्वार है। प्रमुख पर्वत की चोटियां (शिवालिक): यहाँ दो अत्यंत महत्वपूर्ण पौराणिक चोटियां हैं: बिल्व पर्वत: जिस पर माता मनसा देवी का भव्य मंदिर स्थित है। नील पर्वत: जिसके शिखर पर माता चंडी देवी का सिद्धपीठ विराजमान है। मुख्य गंगा नदी, नीलधारा (गंगा की प्राकृतिक उपधारा), सोलानी नदी और रतमऊ नदी।
उत्तराखंड के नदी संगम केवल दो जलधाराओं के मिलन स्थल नहीं हैं, बल्कि वे भारत की आध्यात्मिक और राजनैतिक चेतना के चौराहा हैं। यहाँ पंच-प्रयागों और अन्य प्रमुख संगमों पर ऋषियों की साधना, उपासना स्थल है केशवप्रयाग (माणा, चमोली) अलकनंदा और सरस्वती नदी का संगम। जुड़े हुए ऋषि एवं साधना: यह वेद व्यास ऋषि और शुकदेव जी की परम तपस्थली है। संगम के ठीक ऊपर 'व्यास गुफा' और 'गणेश गुफा' स्थित है, जहाँ बैठकर व्यास जी ने वेदों का चार भागों में वर्गीकरण किया और महाभारत महाकाव्य तथा १८ पुराणों को लिपिबद्ध करवाया था। यहाँ शुद्ध ब्रह्म संस्कृति और वैष्णव चेतना की उपासना की जाती है। सरस्वती का लुप्त होना ज्ञान के अंतर्मुखी होने का प्रतीक माना जाता है। यह क्षेत्र प्राचीन कत्युरी राजवंश के प्रभाव में रहा, जिन्होंने इस सीमांत क्षेत्र की सुरक्षा और तिब्बत (हुणदेश) से होने वाले व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की। विष्णुप्रयाग (चमोली)में नदियों का संगम: अलकनंदा और पश्चिमी धौलीगंगा का पावन मिलन।देवर्षि नारद मुनि ने यहाँ भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु यहाँ साक्षात प्रकट हुए थे। यहाँ वैष्णव और सौर संस्कृति का समन्वय है। भगवान के 'विष्णुहरि' रूप की पूजा होती है, जो मनुष्य के भीतर के अंधकार (तमस) को दूर कर सात्विक बुद्धि प्रदान करते हैं। कत्युरी राजाओं ने इस दुर्गम पहाड़ी दर्रे पर यात्रियों की सुरक्षा के लिए घाटों और घाटियों का निर्माण कराया, जिससे मध्यकाल में बद्रीनाथ यात्रा सुगम हो सकी।
नंदप्रयाग (चमोली) में : अलकनंदा और नंदाकिनी नदी का संगम पर यदुवंश के पूर्वज राजा नन्द ने यहाँ पुत्र-प्राप्ति और लोक-कल्याण के लिए महायज्ञ किया था। साथ ही, यह क्षेत्र कण्व ऋषि के प्रभाव क्षेत्र (कण्व आश्रम) से भी जुड़ा हुआ है। यहाँ वैष्णव और शाक्त संस्कृति का अनूठा मिश्रण है। नंदाकिनी नदी को नंदा देवी (आद्याशक्ति) का स्वरूप माना जाता है, अतः यहाँ वैष्णव सात्विकता के साथ मातृ-शक्ति की वंदना की जाती है।
कत्युरी राजवंश के पतन के बाद गढ़वाल के पंवार (परमार) राजवंश ने इस नगर को एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया और यहाँ के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया।।कर्णप्रयाग (चमोली)में अलकनंदा और पिंडर (पंडारक) नदी का संगम। पर महाभारत काल के महानायक दानवीर कर्ण की यह सर्वोच्च तपस्थली है। कर्ण ने इसी संगम पर खड़े होकर भगवान सूर्य की कठिन आराधना की थी और उनसे अभेद्य कवच और कुंडल प्राप्त किए थे। स्वामी विवेकानंद ने भी यहाँ कुछ दिन रुककर गहन ध्यान लगाया था। यह स्थल मुख्य रूप से सौर संस्कृति (सूर्य उपासना) और शाक्त परंपरा का केंद्र है। यहाँ माँ उमा (पार्वती) का प्राचीन मंदिर है। सूर्य देव की कृपा से आरोग्यता और तेज की प्राप्ति के लिए यहाँ विशेष अनुष्ठान होते हैं।: मध्यकाल में कत्युरी साम्राज्य के राजाओं ने कर्णप्रयाग को कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाला एक प्रमुख सामरिक व्यापारिक जंक्शन (Trading Hub) बनाया। चंद राजाओं और पंवार राजाओं के बीच संधि और संघर्षों का यह गवाह रहा है। रुद्रप्रयाग में : अलकनंदा और मंदाकिनी नदी का महासंगम।पर देवर्षि नारद मुनि ने यहाँ भगवान शिव से संगीत शास्त्र का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए 'रुद्र रूप' की आराधना की थी। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें 'महती' नामक वीणा प्रदान की थी।।यह पूर्णतः शैव संस्कृति का शीर्ष स्तंभ है। यहाँ साक्षात रुद्र की उपासना की जाती है, जो संहार और कल्याण के अधिपति हैं। संगम पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर शैव चेतना को ऊर्जा प्रदान करता है। गढ़वाल के पंवार वंश के राजाओं ने केदारनाथ और बद्रीनाथ दोनों यात्रा मार्गों के विभाजन बिंदु (Junction) के रूप में रुद्रप्रयाग को अत्यधिक महत्व दिया। उन्होंने यहाँ यात्रियों के ठहरने के लिए बड़ी-बड़ी चेटियों (सराय) और अन्नक्षेत्रों की स्थापना की। सोनप्रयाग (रुद्रप्रयाग) में मंदाकिनी और सोनगंगा (वासुकी गंगा) का संगम क्षेत्र ऋषि अत्रि और सती अनसूया की दिव्य ऊर्जा से ओतप्रोत है। पौराणिक मान्यता है कि इसी पावन संगम में स्नान करने के उपरांत भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह मार्ग में आगे स्थित 'त्रियुगीनारायण मंदिर' में संपन्न हुआ था, जहाँ की अग्नि आज भी प्रज्वलित है। यहाँ शैव-शाक्त समन्वय की पराकाष्ठा है। यहाँ भगवान शिव और शक्ति के 'अर्धनारीश्वर' और वर-वधू रूप की सामूहिक उपासना की जाती है, जो प्रकृति और पुरुष के मिलन का प्रतीक है।
स्थानीय गढ़वाली सरदारों और पंवार राजाओं ने इस दुर्गम तीर्थ स्थल की पवित्रता अक्षुण्ण रखने के लिए इसे टैक्स-फ्री (कर-मुक्त) धार्मिक क्षेत्र घोषित किया था।
देवप्रयाग (टिहरी गढ़वाल)में अलकनंदा (बहू - शांत धारा) और भागीरथी (सास - तीव्र वेगवती धारा) का महासंगम। यहीं से यह संयुक्त धारा साक्षात 'गंगा' कहलाती है। देवशर्मा ऋषि ने यहाँ हजारों वर्षों तक निराहार रहकर तपस्या की थी, जिनके नाम पर इस स्थान का नाम 'देवप्रयाग' पड़ा। त्रेतायुग में लंका विजय के उपरांत मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने ब्रह्महत्या (रावण वध) के दोष निवारण के लिए इसी संगम पर घोर तपस्या की थी।यह गढ़वाल में वैष्णव संस्कृति (रामानुज/द्रविड़ परंपरा) का महाद्वार है। यहाँ स्थित रघुनाथ जी का मंदिर वास्तुकला की द्रविड़ शैली में निर्मित है, जहाँ श्री राम की स्वयंभू मूर्ति की पूजा होती है। यह शैव (गंगा) और वैष्णव (रघुनाथ) संस्कृतियों का परम मिलन बिंदु है। पंवार (परमार) राजवंश के राजाओं ने देवप्रयाग को अपने साम्राज्य का सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र माना। राजा मानशाह और श्यामशाह के काल के ताम्रपत्र यहाँ सुरक्षित हैं। कत्युरी और पंवार राजाओं ने इस मंदिर के रखरखाव के लिए कई गांवों की भूमि दान (गूठ भूमि) की थी।
कालसी / डाकपत्थर (देहरादून)में यमुना और टोंस (तमसा) नदी का संगम क्षेत्र में यह क्षेत्र असित ऋषि और भृगु वंश के ऋषियों की साधना भूमि रहा है। असित ऋषि ने यमुना के तट पर रहकर सौर और शाक्त साधना की थी। यहाँ सौर संस्कृति, शाक्त परंपरा और बौद्ध दर्शन का अनूठा समागम देखने को मिलता है। यमुना को सूर्य-पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इस संगम क्षेत्र का ऐतिहासिक अवदान अतुलनीय है। ईसा पूर्व २५७ में मगध साम्राज्य के महान सम्राट अशोक ने यहाँ अपना प्रसिद्ध शिलालेख (Kalsi Rock Edict) स्थापित करवाया था। प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण इस शिलालेख के माध्यम से मौर्य साम्राज्य ने इस सुदूर पर्वतीय सीमांत क्षेत्र को मगध के लोक-कल्याणकारी और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद से जोड़ा था। यह शिलालेख युद्ध-त्याग, जीव-दया और धार्मिक सहिष्णुता का कालजयी संदेश देता है।: सरयू और गोमती नदी का पवित्र संगम।पर सरयू नदी को हिमालय से नीचे लाने का श्रेय ऋषि वशिष्ठ को है। इस संगम पर स्वयं भगवान शिव ने मार्कण्डेय ऋषि की रक्षा के लिए 'व्याघ्र' (बाघ) का रूप धारण किया था। कुमाऊं में शैव और सौर संस्कृति का महाकेंद्र है। यहाँ स्थित 'बाघनाथ मंदिर' में सात्विक शैव साधना की जाती है। सरयू का संबंध सूर्यवंश से होने के कारण यहाँ मकर संक्रांति (उत्तरायणी) पर सूर्योपासना का महापर्व होता है। कत्युरी राजा भूदेव के शिलालेख यहाँ से प्राप्त हुए हैं। बाद में कुमाऊं के प्रतापी चंद राजवंश के राजा लक्ष्मी चंद ने १६०२ ई. में बाघनाथ मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया। ऐतिहासिक रूप से यह नगर 'उत्तरायणी कौतिक' (मेले) के माध्यम से तिब्बत, भोटिया व्यापारियों और भारत के बीच महान आर्थिक एवं सांस्कृतिक विनिमय का केंद्र रहा। इसी स्थान पर १९२१ में कुली-बेगार जैसी दमनकारी प्रथा का अंत कर स्वतंत्रता सेनानियों ने एक नए सामाजिक युग का सूत्रपात किया था।
स्वायंभुव मन्वंतर की वैचारिक पृष्ठभूमि से शुरू होकर वैवस्वत मन्वंतर की व्यावहारिक भूमि तक फैली भारतीय संस्कृति का यह स्वरूप अद्भुत है। उत्तराखंड के पर्वत केवल पत्थर और बर्फ के ढेर नहीं हैं, बल्कि वे ऋषियों के उन्नत विचारों के प्रतीक हैं। यहाँ की नदियां और उनके संगम केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि ज्ञान की विभिन्न सरिताओं (शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर, ब्रह्म) का महासमागम हैं। भारद्वाज का विमान व आयुर्वेद विज्ञान, अत्रि का खगोल विज्ञान और अगस्त्य का उत्तर-दक्षिण को जोड़ने वाला भू-राजनीतिक सांस्कृतिक सेतु यह सिद्ध करता है कि भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा अत्यंत वैज्ञानिक और प्रगतिशील थी। मौर्य, कत्युरी, चंद और पंवार जैसे साम्राज्यों ने इन धार्मिक केंद्रों को प्रशासनिक और आर्थिक संबल देकर राष्ट्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं को सुरक्षित रखा। मन्वंतर बदलते रहेंगे, नदियां अपना मार्ग बदल सकती हैं, परंतु ऋषियों द्वारा स्थापित यह वैचारिक और आध्यात्मिक चेतना भारत को सदैव एक अखंड राष्ट्र के रूप में जीवंत रखेगी।
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