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घर परिवार को देखे समझे

घर परिवार को देखे समझे

संजय जैन
आज का समय कुछ अलग कहानी कह रहा है। कही पर शोषण हो रहा है तो कही पर संस्कारों का अभाव दिख रहा है। समाज का उथान और पतन उसके लोगों पर ही निर्भर करता है। चारों तरफ का माहौल बहुत ही निराशाजनक बन गया है। आशा की किरण लोगों को कही पर नजर नही आ रही है। इंसान ढोल की तरह ऊपर से फुला हुआ दिख रहा है। पैसे की चमक और आधुनिकता का दिखावा ही लोगों के दिल दिमाग पर छाया है। दिखवा फैशन आराम यश सौंदर्यता... ही बचा है। अंदर से तो उस ढोल के‌ ढांचे की तरह है जिसको सरल भाषा में खोखला पोला कहते है। कहने का मतलब ऊपर से सब बढ़ीया पर अंदर की स्थित बहुत कमजोर । यह बात घर का मुखिया जानता है परंतु लाख कोशिश के बाद भी वो इस बात को घर के सदस्यों से नही कह पता की हमारी स्थिति अंदर से कमजोर होती जा रही है थोड़ा खर्च आदि पर अंकुश लगाओं क्योंकि आमदनी एक तरफ से और सीमित साधानों से हो रही है और खर्च तीन तरफ से हो रहा है। जब भी घर का मुखिया घर के लोगों को समझाने की कोशिश करता। घर वालें उसे पुराने ख्यालात और रूढ़ीवादी कंजूस.. कहने लगते है। परंतु सत्य को समझने और मानने को तैयार नही होते है। इसलिए आज के दौर में पुराने जमीदार पैसे वाले लोगों के घर मिट रहे है क्योंकि की उनके बच्चों ने काम और पैसे दोनों को तबज्जु कभी नही दिया इसलिए बर्वाद हो रहे है। बड़े बड़े परिवार जिनका नाम शहर में इज्जत से लिया जाता था की यह नगर सेठ है, यह मालगुजार है, यह साहूकार है..। समय ने इनकी स्थिति को बार बार समझने और दिखाने की कोशिश की परंतु घर वालों ने उन संकेतों को नजर अंदाज किया और परिणाम भरे-पूरे परिवार बर्वाद हो गये। शहर गाँव में नये नये लोगों जो आये उन्होनें धैर्य शांति कंजूसी से स्वयं को नये शहर में स्थापित किया और देखते ही देखते वो शहर के धन्ना सेठ बन गये। जो सेठ थी वो कंगाल हो गये और बहरी लोग बड़ी ही मजबूती से स्थापित हो गये। मेरे लेख का निष्कर्ष ये है की समय परिवर्तन को तो लोगों ने अपनाया परंतु उसके साथ अपने घर परिवार की तुलना करके आय के स्रोतों का मार्ग नही तलाशा बस आधुनिकता का चोला ओढ़ा पर काम-धाम मेहनत लगन का अभाव बना रहने के कारण धीरे धीरे सब कुछ विखर गया। हमनें इस दौर में बड़े बड़े घरानों को धरासाई होते देख रहा हूँ। संसार का चक्र क्रम घूमता है। इस चक्र क्रम में स्वयं को कैसे स्थापित या ढालना है यह बात हम आप को समझना है और और बच्चों को अवगत कराना है तभी आप इस कलयुग की दुनिया से लड़ पाएंगे और समझ पाएंगे और अपने घर परिवार को बचा पाएंगे। यदि मेरे लेख से किसी की भावनाओं को ठेस लगी हो तो क्षमा करें मेरा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का नही है परंतु एक लेखक होने के नाते लिखना मेरा काम और धर्म है जिसके कारण में समाज की कुरीतियों का अंत करने में अपनी भूमिका निभा सकू।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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