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न‌ई सुबह का सूरज

न‌ई सुबह का सूरज

न‌ई सुबह का सूरज ,
नव ले आया प्रकाश ।
सोकर जगीं चिडियाॅं ,
ताजगी ले एहसास ।।
चंदा भागा तारे भागे ,
निशा ग‌ईं हो उदास ।
आ गईं चंद किरणें ,
चकाचौंध आकाश ।।
नभ हर्षित भू हर्षित ,
न‌ई उषा नव उजास ।
सबका प्यारा सूरज ,
सबके अपने खास ।।
न‌ई उषा नव ताजगी ,
तम का हुआ नाश ।
टूट पड़े सूरज आते ,
तम के सारे फाश ।।
बैठा पड़ा अस्त हेतु ,
निशा का वह दास ।
कब डूबेंगे सूरज दा ,
कब मिटेगी प्यास ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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