मूर्खता दिवस
अरुण दिव्यांशमूर्खता जीवन का कोढ़ है ,
मानव को करता भ्रष्ट है ।
मूर्खता भरे इस जीवन में ,
हो जाता बहुत कष्ट है ।।
एक अप्रैल है मूर्ख दिवस ,
बनो मूर्ख बनाओ मूर्ख ।
मूर्खता दिवस है आया ,
कोई मूर्ख तो कोई धूर्त ।।
नौ को तुम छ: पढ़ाओ ,
छ: को पढ़ाओ तुम नौ ।
जौ को तुम गेहूॅ बताओ ,
गेहूॅं को बताओ तुम जौ ।।
भारत का मूर्खता धूर्तता ,
बहुत पुराना होता खेल ।
समझनेवाले समझ रहे ,
शेष बेंचते रहें निज तेल ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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