संभावनाओं की सुबह
अरुण दिव्यांशजीवन जीने का बहाना है ,
जीवन गीतों का तराना है ,
मर मरकर भी तो जीना है ,
संभावनाओं की सुबह ये ।
दुखों में भी यहाॅं पे जीना है ,
हर कष्टों को भी तो पीना है ,
हर पल रखना चौड़ा सीना है ,
तभी जीवन यह नगीना है ।
जी जी कर यहाॅं पे मरना है ,
मर मरकर यहाॅं पर जीना है ,
जीना अभी कितना हमें है ,
किसने आजतक ये गिना है ।
संभावनाओं की ही आस में ,
संभावनाओं की ही प्यास में ,
कभी तो लगेगी किनारे नैया ,
संभावनाओं की सुबह ये ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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