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पर्वत पर चली प्रेम भरी नाव

बिहार के माउंटेन मैन दशरथ मांझी की स्तुति में कुछ पंक्तियां सादर निवेदित हैं)

पर्वत पर चली प्रेम भरी नाव

कुमार महेंद्र
देख भार्या विछोह कारण,
अवतरित दृढ़ संकल्पनाएं ।
थाम कर छेनी हथौड़ा,
साकार की उर कल्पनाएं ।
बाइस वर्ष अथक श्रम निष्ठा,
अनदेखी कर धूप छांव ।
पर्वत पर चली प्रेम भरी नाव ।।


हिय हिलोर नेह अठखेलियां,
हर कदम अदम्य साहस भरा ।
भूला राह कष्ट कंटक बाधा,
रग रग असीम उल्लास पसरा ।
प्राण प्रिय हेतु अनुपम काज,
स्मृति पर नयन अश्रु स्राव ।
पर्वत पर चली प्रेम भरी नाव ।।


संघर्ष पथ पर अविचलित,
साहस शौर्य संग सामना ।
विस्मृत कर आलोचनाएं,
हर पल उत्साह उमंगी भावना ।
आत्मसात सकारात्मक सोच,
आत्मविश्वास भरे हाव भाव ।
पर्वत पर चली प्रेम भरी नाव ।।


असंभव शब्द विलोपन,
निज जीवन कोश पटल ।
अग्र कदम नव जोश भर,
बुलंद हौसलों की उड़ान अटल ।
लक्ष्य पाकर अति भाव विभोर,
भरने लगे विरह वेदना के घाव ।
पर्वत पर चली प्रेम भरी नाव ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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