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||| गायत्री मंत्र: वेद, वेदान्त, उपनिषद, पुराण और ऋषि-परंपरा की दृष्टि में दिव्य चेतना का महामंत्र |||

||| गायत्री मंत्र: वेद, वेदान्त, उपनिषद, पुराण और ऋषि-परंपरा की दृष्टि में दिव्य चेतना का महामंत्र |||

(Gayatri Mantra: The Supreme Hymn of Divine Consciousness in Vedas, Vedanta, Upanishads & Rishi Tradition)


आलेख : मानसपुत्र पंडित संजय कुमार झा @ 9679472555 , 9431003698
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||| ॐ श्री गुरुवे नमः ॐ |||


( I ) प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गायत्री मंत्र को “वेदमाता”, “ऋषि-चेतना का प्रकाश” और “ब्रह्मविद्या का प्रवेश-द्वार” माना गया है। यह केवल उपासना का साधन नहीं, बल्कि बुद्धि-शुद्धि, आत्मोन्नति और सार्वभौमिक कल्याण का वैज्ञानिक एवं दार्शनिक सूत्र है। देवताओं, ऋषियों, वेदों, उपनिषदों और वेदान्त दर्शन ने इसे मानव जीवन के सर्वोच्च मार्गदर्शक के रूप में स्थापित किया है।


( II );गायत्री मंत्र का स्वरूप एवं अर्थ


मंत्र:
ॐ भूर् भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
( हम उस परम दिव्य चेतना (सविता) का ध्यान करते हैं, जो समस्त लोकों का प्रकाश है; वह हमारी बुद्धि को प्रेरित कर सत्य मार्ग पर अग्रसर करे.)


( III ) वेदों की दृष्टि में गायत्री मंत्र
1. ऋग्वेद (3.62.10)
गायत्री मंत्र का मूल स्रोत यही है, जिसके द्रष्टा विश्वामित्र हैं।


“सविता” देव (सूर्य का आध्यात्मिक रूप) को समर्पित यह मंत्र सृष्टि के प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक है।


2. यजुर्वेद
गायत्री को “प्राणों की शुद्धि” और “यज्ञीय चेतना का केंद्र” कहा गया है।


यह कर्म और ध्यान का सेतु है।


3. सामवेद
सामवेद में गायत्री की लयात्मकता को “दैवी संगीत” माना गया है। यह मंत्र संगीत और ध्यान का सर्वोच्च समन्वय है। वेदों के अनुसार गायत्री मंत्र ज्ञान (विद्या), शक्ति (प्राण) और चेतना (ब्रह्म) का त्रिवेणी संगम है।


( IV ) वेदान्त दर्शन की दृष्टि
वेदांत में गायत्री मंत्र को “ब्रह्मज्ञान का सार” माना गया है।
# मुख्य विचार:
* “तत् सवितुः” = वही ब्रह्म (Ultimate Reality)
* “भर्गो देवस्य” = अज्ञान का नाश करने वाला प्रकाश
* “धीमहि” = ध्यान (Meditative Realization)


( V ) ब्रह्मसूत्र एवं अद्वैत परंपरा
गायत्री को आत्मा और ब्रह्म की एकता का अनुभव कराने वाला मंत्र माना गया है।
* आदि शंकराचार्य की परंपरा:
* आदि शंकराचार्य के अनुसार ,
गायत्री मंत्र “अविद्या के अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान की प्राप्ति कराता है।”


( VI ) उपनिषदों की दृष्टि
1. छांदोग्य उपनिषद
* गायत्री को “प्राण, मन और वाणी का आधार” कहा गया है।
* इसे “संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक” माना गया।


( VII ) बृहदारण्यक उपनिषद
* गायत्री को “आत्मा की रक्षा करने वाली शक्ति” बताया गया है।
* यह “ज्ञान और सत्य की ओर ले जाने वाली चेतना” है।


# दार्शनिक अर्थ:
उपनिषदों में गायत्री मंत्र को “आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा” का माध्यम कहा गया है।


( VIII ) पुराणों की दृष्टि
* विष्णु पुराण
गायत्री मंत्र को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का मूल आधार बताया गया है।


* शिव पुराण
गायत्री जप को “मोक्ष प्राप्ति का सरलतम मार्ग” कहा गया है।


* देवी भागवत पुराण
गायत्री को “आदि शक्ति” और “समस्त देवताओं की जननी” कहा गया है। पुराणों में गायत्री मंत्र को सृष्टि, पालन और संहार—तीनों शक्तियों का समन्वय माना गया है।


( IX ) ऋषि-मुनियों की दृष्टि
* विश्वामित्र
गायत्री मंत्र के द्रष्टा; इसे “मानव चेतना को दिव्यता में रूपांतरित करने वाला मंत्र” बताया।


* याज्ञवल्क्य
गायत्री को “आत्मज्ञान का प्रकाश” कहा।


* वशिष्ठ
इसे “धर्म और तप का मूल आधार” माना।


* सार:
ऋषियों के अनुसार गायत्री मंत्र मनुष्य को साधारण से असाधारण, और जीव से शिव बनाने की क्षमता रखता है।


( X ) देवताओं की दृष्टि (संक्षेप में पुनः)
* राम → मर्यादा और संतुलित बुद्धि
* कृष्ण → “छन्दों में मैं गायत्री हूँ”
* शिव → मोक्ष का मार्ग
* विष्णु → सार्वभौमिक चेतना
* ब्रह्मा → सृष्टि की जननी शक्ति


( XI ) वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण
(A) चेतना विज्ञान
24 अक्षरों का यह मंत्र मानव मस्तिष्क के न्यूरल पैटर्न को संतुलित करता है


(B) ध्वनि एवं कंपन सिद्धांत
उच्चारण से उत्पन्न कंपन शरीर के ऊर्जा केंद्रों को सक्रिय करते हैं


(C) मनोवैज्ञानिक प्रभाव
निर्णय क्षमता, एकाग्रता और सकारात्मकता में वृद्धि


( XII ) सार्वभौमिक दर्शन
गायत्री मंत्र किसी संप्रदाय तक सीमित नहीं ,
यह मानवता के लिए सार्वभौमिक प्रार्थना है:
“हमारी बुद्धि को सत्य और प्रकाश की ओर प्रेरित करो।”


( XIII ) निष्कर्ष (Conclusion)
गायत्री मंत्र वेदों का हृदय, उपनिषदों का दर्शन, वेदान्त का सार, पुराणों की शक्ति और ऋषियों का अनुभव है।
यह मंत्र मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक है।


( XIV ) संदर्भ (References)
1. ऋग्वेद (3.62.10)
2. यजुर्वेद
3. सामवेद
4. छांदोग्य उपनिषद
5. बृहदारण्यक उपनिषद
6. विष्णु पुराण
7. शिव पुराण
8. देवी भागवत पुराण
9. ब्रह्मसूत्र10. आदि शंकराचार्य के भाष्य
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