शक्ति, शील और समर्पण की पराकाष्ठा: माता जानकी
सत्येंद्र कुमार पाठक
भारतीय संस्कृति में 'सीता' केवल एक नाम नहीं, बल्कि धैर्य, पवित्रता और अटूत नारीत्व का दर्शन है। त्रेतायुग में जब अधर्म का अंधकार बढ़ रहा था, तब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पूरक के रूप में माता लक्ष्मी ने 'जानकी' के रूप में अवतार लिया। त्रेतायुग का वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि, जिसे हम जानकी नवमी या सीता नवमी के रूप में मनाते हैं, वह पावन दिवस है जब धरती की कोख से साक्षात् ममता और शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह पर्व राम नवमी के ठीक एक माह बाद आता है, जो प्रकृति और पुरुष के अटूट संबंध को दर्शाता है।
प्राकट्य की अलौकिक कथा: अकाल से अमृत तक - माता सीता का जन्म किसी गर्भ से नहीं, बल्कि दिव्य रूप में भूमि से हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उस समय मिथिलांचल के राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा था। प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही थी और वर्षा के कोई संकेत नहीं थे। ऋषियों और विद्वानों ने राजा जनक को परामर्श दिया कि यदि वे स्वयं खेत में हल चलाएं, तो इंद्र देव प्रसन्न होंगे और वर्षा होगी। अपने प्रजा-प्रेम के कारण राजर्षि जनक ने एक साधारण किसान की भांति सोने का हल उठाया और भूमि जोतना प्रारंभ किया। हल जोतते समय भूमि के भीतर से एक धातु का कलश (मटका) टकराया। जब उस कलश को बाहर निकाला गया, तो उसमें एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और अलौकिक कांति वाली कन्या विद्यमान थी। उनके प्रकट होते ही आकाश से पुष्प वर्षा हुई और सूखे की मार झेल रही मिथिला की धरती मूसलाधार वर्षा से तृप्त हो गई।
नामकरण का आधार और दार्शनिक अर्थ - माता सीता के अनेक नाम हैं, जिनमें से प्रत्येक उनकी विशिष्ट उत्पत्ति और गुणों को रेखांकित करता है: सीता: हल के अग्र भाग को 'सीत' कहा जाता है। चूंकि वे हल की नोक से टकराकर प्रकट हुई थीं, इसलिए महाराज जनक ने उनका नाम 'सीता' रखा। यह नाम श्रम और भूमि के गहरे जुड़ाव का प्रतीक है।
जानकी व जनकनंदिनी: राजा जनक की पुत्री होने के कारण उन्हें जानकी कहा गया। यद्यपि वे उनकी जैविक पुत्री नहीं थीं, फिर भी जनक का उनके प्रति स्नेह पिता-पुत्री के प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है।
वैदेही: राजा जनक को 'विदेह' (देह के मोह से मुक्त) कहा जाता था, उनकी पुत्री होने के नाते सीता जी 'वैदेही' कहलाईं।
भूमिजा: धरती (भूमि) से जन्म लेने के कारण उन्हें भूमिजा कहा जाता है। वे प्रकृति की साक्षात् पुत्री हैं।
मैथिली: मिथिला की राजकुमारी और वहां की संस्कृति की ध्वजवाहक होने के कारण वे मैथिली के नाम से पूजी जाती हैं। सीता जी का जीवन: धैर्य और अदम्य साहस की यात्रा में जानकी जी का जीवन महलों के ऐश्वर्य से अधिक संघर्षों और सिद्धांतों की बलि वेदी पर चढ़ा रहा। उनका चरित्र हमें सिखाता है कि शक्ति केवल संहार में नहीं, बल्कि सहने और त्याग करने में भी निहित है। विवाह के पश्चात जब श्री राम को वनवास मिला, तो सीता जी ने महलों के सुख को तिलांजलि देकर कांटों भरे पथ को चुना। उनका तर्क स्पष्ट था—"जहाँ राम, वहीं अयोध्या।"माता सीता की बिहार का सीतामढ़ी जिले के पुनौरा में अवतरण एवं जनकपुर नेपाल में बाल्य कल , भगवान राम के साथ पाणिग्रहण संस्कार , अयोध्या में कर्मक्षेत्र और नारी शक्ति का आराध्या बनी थी ।
राक्षस संस्कृति एवं श्री लंका का राजा रावण द्वारा हरण किए जाने के बाद भी सीता जी ने अपना आत्मबल नहीं खोया। सोने की लंका के वैभव और रावण के भय के बीच उन्होंने घास के तिनके को ढाल बनाकर अपनी मर्यादा की रक्षा की। यह उनके मानसिक साहस की पराकाष्ठा है। उन्होंने अग्नि परीक्षा देकर अपनी शुचिता सिद्ध की, जो यह दर्शाता है कि सत्य को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, किंतु लोक-कल्याण के लिए त्याग करना पड़ता है।
जानकी नवमी का पर्व विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत उत्साह से मनाया जाता है।।भक्ति मार्ग: इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं और श्री राम-जानकी की युगल उपासना करते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से परिवार में सुख, शांति और सौभाग्य का आगमन होता है। आज के संदर्भ में सीता जी का व्यक्तित्व महिलाओं के लिए प्रेरणापुंज है। वे केवल एक मूक पात्र नहीं थीं, बल्कि उन्होंने स्वयं के निर्णयों से सिद्ध किया कि एक स्त्री ही राष्ट्र और कुल की आधारशिला होती है। माता सीता भूमि से प्रकट हुई थीं, यह पर्व हमें पर्यावरण और धरती माता के संरक्षण का भी संदेश देता है।
आदर्शों की जीवंत प्रेरणादायक माता जानकी भारतीय मानस की वह चेतना हैं, जो सदियों से हमें धैर्य और मर्यादा का मार्ग दिखा रही हैं। जानकी नवमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस दिव्यता का उत्सव है जिसने हमें सिखाया कि जीवन के कठिनतम समय में भी अपने चरित्र की पवित्रता को कैसे बचाए रखा जाता है। उनका प्राकट्य इस विश्वास का प्रतीक है कि जब-जब धरती पर संकट आएगा, तब-तब शक्ति और करुणा का अवतरण होगा।
"जनकनंदिनी जगज्जननी, तुम ही हो आधार,
तुम्हारे ही त्याग से महके, यह सारा संसार।"संदर्भ: वाल्मीकि रामायण - बाल कांड , श्री रामचरितमानस (तुलसीदास) - बाल कांड एवं अयोध्या कांड , पौराणिक आख्यान एवं मिथिला की लोक परंपराएं
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews