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अब तो बेटे भी हो जाते हैं घर से विदा, केवल बेटी को ही अतिथि न समझा जाए|

अब तो बेटे भी हो जाते हैं घर से विदा, केवल बेटी को ही अतिथि न समझा जाए|

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारतीय समाज की परंपराओं और मान्यताओं में लंबे समय से कुछ ऐसी धारणाएँ विद्यमान रही हैं, जो बदलते समय के साथ भी पूर्णतः समाप्त नहीं हो पाई हैं। इन्हीं में एक प्रमुख धारणा यह है कि पुत्री “पराया धन” होती है और विवाह के पश्चात उसका अपने मायके से संबंध सीमित हो जाता है। उसे प्रायः घर में एक “मेहमान” के रूप में देखा जाता है, मानो उसका वहाँ ठहराव केवल अस्थायी हो। परंतु वर्तमान सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य में यह विचार न केवल अप्रासंगिक प्रतीत होता है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी है।
आधुनिक युग में शिक्षा, रोजगार तथा वैश्विक अवसरों के विस्तार ने पारिवारिक संरचना को परिवर्तित कर दिया है। पूर्वकाल में जहाँ पुत्र से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह माता-पिता के साथ रहकर उनका सहारा बनेगा, वहीं आज वही पुत्र उच्च शिक्षा, नौकरी अथवा व्यवसाय के कारण घर से दूर नगरों अथवा विदेशों में निवास करने लगा है। इस प्रकार वह भी अपने परिवार से भौगोलिक रूप से दूर हो जाता है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब पुत्र भी घर से रुख़सत हो रहे हैं, तो केवल पुत्री को ही “मेहमान” क्यों माना जाए?
आज की पुत्रियाँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। वे शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति, कला तथा व्यवसाय जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। इतना ही नहीं, वे पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन भी पूर्ण निष्ठा, संवेदनशीलता एवं समर्पण के साथ कर रही हैं। अनेक उदाहरण ऐसे हैं, जहाँ पुत्रियों ने ही अपने माता-पिता की वृद्धावस्था में उनका सहारा बनकर यह सिद्ध किया है कि स्नेह, कर्तव्य और समर्पण का संबंध लिंग से नहीं, बल्कि संस्कारों से होता है। ऐसे में केवल विवाह के कारण उन्हें “मेहमान” कहना उनके महत्व को कम आँकना है।
यह समझना आवश्यक है कि “घर” केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि भावनाओं, संबंधों और अपनत्व का केंद्र होता है। यदि पुत्रियों को उस घर में समान अधिकार एवं सम्मान प्राप्त नहीं होगा, तो यह उनके आत्मसम्मान को आहत करने के साथ-साथ समाज में असमानता को भी बढ़ावा देगा। पुत्रियाँ भी उसी घर में जन्म लेती हैं, वहीं उनका लालन-पालन होता है और वे उसी परिवार के संस्कारों को आत्मसात करती हैं। अतः उनका उस घर पर उतना ही अधिकार है जितना पुत्रों का।
समाज में वास्तविक परिवर्तन के लिए आवश्यक है कि हम अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाएँ। पुत्र और पुत्री के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव न करते हुए दोनों को समान अवसर, अधिकार एवं सम्मान प्रदान किया जाए। पारिवारिक निर्णयों, संपत्ति में हिस्सेदारी तथा भावनात्मक संबंधों—सभी स्तरों पर पुत्रियों को समान स्थान मिलना चाहिए।
यह पंक्ति—“अब तो बेटे भी हो जाते हैं घर से रुख़सत, केवल बेटी को ही मेहमान न समझा जाए”—केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, अपितु सामाजिक चेतना का सशक्त संदेश है। यह हमें यह स्मरण कराती है कि समय के साथ हमें अपनी सोच और मान्यताओं में भी परिवर्तन करना आवश्यक है।अंततः, यह सत्य है कि संबंधों की गहराई भौतिक दूरी से नहीं, बल्कि भावनाओं की प्रगाढ़ता से निर्धारित होती है। जब अपनत्व और सम्मान दोनों के लिए समान हो, तब कोई भी “मेहमान” नहीं होता—न पुत्र, न पुत्री।हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| 

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