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अवध में राम आए हैं

अवध में राम आए हैं

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सरयू की लहरों में गूँजी, एक मधुर सी तान है,
अयोध्या की गलियों में आज, खुशियों का उफान है।
त्रेता युग का समय सुहावन, चैत्र शुक्ल की नवमी आई,
राजा दशरथ के आँगन में, देवों ने शहनाई बजाई।
श्रृंगी ऋषि के यज्ञ का फल, कौशल्या की गोद भरी,
अमृत लेकर स्वयं पधारे, प्रभु विष्णु की दिव्य धरी।
दीन दयाल, कौशल्या हितकारी, अद्भुत रूप निहारा,
मिटा धरा का सारा संकट, चमका भाग्य सितारा।
जनकपुर की राजकुमारी सीता, बनीं राम की शक्ति,
जिनके चरणों में समाहित, पावन प्रेम और भक्ति।
गया की भूमि पर जिसने, पितृ धर्म को मान दिया,
वन-वन भटकते राघव ने, जग का दुख पहचान लिया।
भक्त शिरोमणि हनुमान ने, सेवा का पाठ पढ़ाया,
सागर लाँघ के श्रीलंका में, भगवा ध्वज लहराया।
हिंद महासागर की लहरों पर, पत्थर भी अब तरते हैं,
रामेश्वर की स्थापना कर, शिव का सुमिरन करते हैं।
मर्यादा की मूरत हैं वो, सत्य का ही वो सार हैं,
राम नाम की महिमा से ही, होता बेड़ा पार है।
आज पुन: इस नवमी पर, मन में दीप जलाएँ हम,
राम राज्य के संकल्पों से, जीवन सफल बनाएँ हम।




संकटमोचन हनुमान और शक्तिस्वरूपा सीता
सत्येंद्र कुमार पाठक
चरणों में जिनके सारा जग, वह राम के रखवाले हैं,
गदा हाथ में, हृदय में राघव, अंजनी के लाड़ले निराले हैं।
हनुमान ने लाँघ लिया सागर, पावन संदेश सुनाने को,
एक भक्त बढ़ा है आगे, अपनी 'मैया' का दुख मिटाने को।
जनकपुर की वह राजदुलारी, धीरज की प्रतिमूर्ति बनी,
श्रीलंका की अशोक वाटिका में, जो मर्यादा की ज्योति बनी।
न झुकीं कभी, न विचलित हुईं, वह सीता शक्ति का रूप हैं,
जिनके सतीत्व के आगे फीका, लंका का हर स्वरूप है।
हिंद महासागर साक्षी है, उस अतुलित साहस और भक्ति का,
जहाँ वानर सेना ने परिचय दिया, राम नाम की शक्ति का।
एक ओर समर्पण बजरंग का, दूजी ओर सिया का पावन मन,
इन्हीं के संगम से पूर्ण हुआ, प्रभु राम का दिव्य सिंहासन।


मर्यादा का महापर्व: चैत्र शुक्ल नवमी
सत्येन्द्र कुमार पाठक
त्रेता युग की वह पावन बेला, जब धर्म हुआ साकार,
अयोध्या के नृप दशरथ के घर, जन्म लिया करुणागार।
कौशल्या की गोद खिली, श्रृंगी ऋषि का यज्ञ फला,
सरयू के पावन तट पर, मानवता का भाग्य जला।
चैत्र शुक्ल की नवमी तिथि, नक्षत्रों ने शीश नवाया,
प्रभु ने नर-तन धारण कर, मर्यादा का पाठ पढ़ाया।
जनकपुर की सीता शक्ति, धीरज की प्रतिमान बनीं,
तो हनुमान की निश्छल भक्ति, राम नाम की शान बनी।
गया की रेणु, रामेश्वर का जल, भक्ति का विस्तार है,
हिंद महासागर की लहरों पर, सत्य का ही अधिकार है।
श्रीलंका के अंधकार पर, विजय पताका फहराई,
अधर्म के उस लंका-गढ़ में, राम ज्योति थी चमकाई।
आज पुनः उस राम राज्य की, हम सबको है प्यास बड़ी,
जहाँ न द्वेष हो, न हो विषमता, आए वह उल्लास घड़ी।
पत्रिका के इस पावन अंक से, जन-जन को संदेश मिले,
सत्य, प्रेम और सेवा के ही, जीवन में नित फूल खिलें।
शुभ राम नवमी!
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