“मैं कर सकता हूँ”
पंकज शर्मा
मनुष्य के जीवन में शब्द केवल ध्वनियाँ नहीं होते, वे दृष्टिकोण और नियति को आकार देने वाली शक्तियाँ भी होते हैं। “क्या मैं कर सकता हूँ?” और “मैं कर सकता हूँ” — इन दो वाक्यों के बीच ही संदेह और आत्मविश्वास का समूचा अंतर निहित है। पहला वाक्य मन में आशंका और सीमाओं की दीवार खड़ी करता है, जबकि दूसरा आत्मबल का द्वार खोल देता है। जब मनुष्य अपने भीतर यह विश्वास जगाता है कि वह सक्षम है, तभी उसकी सुप्त शक्तियाँ जागृत होती हैं और असंभव प्रतीत होने वाले लक्ष्य भी सुलभ बनने लगते हैं।
जीवन का मार्ग सदैव सरल नहीं होता; उसमें बाधाएँ, असफलताएँ और अनिश्चितताएँ स्वाभाविक हैं। किंतु जो व्यक्ति अपने अंतर्मन में “मैं कर सकता हूँ” का दीप प्रज्वलित रखता है, वही विपरीत परिस्थितियों को भी अवसर में रूपांतरित कर देता है। आत्मविश्वास केवल सफलता का साधन नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है—जो मनुष्य को साहस, धैर्य और निरंतर प्रयास की प्रेरणा देता है। अतः दृष्टिकोण बदलें, क्योंकि जब विचार बदलते हैं, तभी जीवन की दिशा भी बदल जाती है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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