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मिसाइलों के साये में बचपन

मिसाइलों के साये में बचपन

डॉ मुकेश असीमित
कभी-कभी दुनिया का नक्शा देखते हुए लगता है कि यह भूगोल की किताब नहीं, किसी कसाई की डायरी है। सभ्यता का दावा करने वाली इस दुनिया में सम्मेलन होते हैं, शांति पुरस्कार बाँटे जाते हैं, मानवाधिकारों पर लंबी-लंबी भाषणबाज़ी होती है और कैमरों के सामने नेता मुस्कराकर कहते हैं—“हम दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं।” सुनने में सब कुछ बहुत सुसंस्कृत लगता है, मानो पृथ्वी कोई विशाल सभागार हो जहाँ शांति की वीणा बज रही हो। पर उसी सभागार की छत से कभी-कभी अचानक आसमान फट पड़ता है और पानी नहीं, मिसाइलों की बारिश होने लगती है।
मिसाइलें भी बड़ी सभ्य किस्म की होती हैं। वे अकेली नहीं आतीं, उनके साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस आती है, रणनीतिक शब्दावली आती है, विशेषज्ञों की गंभीर भौंहें आती हैं और एक बहुत उपयोगी शब्द भी आता है—“कोलेटरल डैमेज।” इस शब्द का अर्थ कुछ यूँ समझिए मित्र कि जब बम किसी “रणनीतिक लक्ष्य” को खोजते-खोजते गलती से बच्चों तक पहुँच जाए। गलती बच्चों से ही नहीं, बड़ों से भी हो सकती है, और देखिए कि वे गलती पर कितने सभ्य तरीके से दुख भी जता रहे हैं। बड़ी शालीनता से कहते हैं—“हमें अफ़सोस है।” अफ़सोस! क्या अद्भुत शब्द है। यह ऐसा शब्द है जो पूरी तबाही को दो अक्षरों में समेट देता है, जैसे किसी बड़े नरसंहार को शब्दकोश की जेब में डाल दिया गया हो।
और यह सब हो भी किसलिए रहा है? शांति स्थापित करने के लिए। मित्र, थोड़ा सब्र रखिए। आखिर शांति कोई सस्ती चीज़ नहीं होती। जब आदमी भटक सकता है तो मशीन क्यों नहीं भटकेगी? मशीन भी तो उसी इंसान की संतान है जो कभी-कभी दिशा भूल जाता है। ठीक है, मिस-टार्गेट हो गया। बीच में एक स्कूल आ गया—बहुत साधारण-सा स्कूल। दीवारों पर रंगीन चित्र बने थे, बच्चों के कच्चे सपनों की तरह। पर ये बच्चियाँ भी नासमझ निकलीं। इन्हें बच्चे रहना ही नहीं चाहिए था। इन्हें युद्ध की भाषा समझनी चाहिए थी, बंदूकों के शब्द और मिसाइलों के इरादे पढ़ लेने चाहिए थे। कम से कम बैंकर्स में दुबक जाना चाहिए था। मगर वे तो अनजान थीं इन सब से। इतना अर्थशास्त्र भी नहीं पढ़ा था कि समझ पातीं तेल क्या होता है, टैरिफ क्या होता है और वैश्विक रणनीति किसे कहते हैं।
वे बस बच्चियाँ थीं। बालों में रिबन बाँधे स्कूल आई थीं। किसी के हाथ में नई कॉपी थी, किसी के बैग में टिफ़िन—रोटी, सब्ज़ी, शायद थोड़ा अचार। उनकी समझ बस इतनी थी कि होमवर्क पूरा करना है और छुट्टी में खेलना है। कक्षा के ब्लैकबोर्ड पर शायद किसी ने लिख रखा होगा—“मेरा देश महान है।” मगर दुनिया की बड़ी ताक़तों के नक्शों में बच्चों के खेल के मैदान नहीं होते, वहाँ केवल टार्गेट होते हैं, मिशन होते हैं और उनके बीच कहीं-कहीं निर्दोष जीवन गलती से आ खड़े होते हैं।
फिर एक बटन दबाया गया। मशीनों की दुनिया में बटन दबाना बहुत आसान हो गया है। एक उंगली हल्की-सी हिलती है और हजारों किलोमीटर दूर किसी शहर में आसमान अचानक आग बन जाता है। टार्गेट हिट। दीवारें नहीं रहीं, छत नहीं रही, बस धूल , धुआँ का गुबार और बिखरे हुए बैग । एक लंच बॉक्स खुला पड़ा है , उसकी रोटी आधी जली हुई । एक कॉपी के पन्ने हवा में उड़ रहे है । उस पर किसी बच्चे ने रंगीन पेंसिल से एक घर बनाया था शायद —नीला आसमान, लाल छत, हरे पेड़। अब उसी चित्र पर खून के छींटे बिखरे हैं ।
उधर दुनिया के बड़े नेता अपने-अपने बड़े कामों में व्यस्त हैं। कोई बयान लिख रहा है, कोई रणनीतिक विश्लेषण कर रहा है, कोई गंभीर चेहरा बनाकर कह रहा है—“यह कार्रवाई शांति के लिए आवश्यक थी।” शांति! कितना सुंदर शब्द है। इतना सुंदर कि इसके नाम पर शहर जलाए जा सकते हैं, स्कूल ढहाए जा सकते हैं और बच्चों की आवाज़ें इतिहास की धूल में दबाई जा सकती हैं।
मैं भी क्या लिखने बैठ गया। कलम उठाता हूँ तो शब्द काँपने लगते हैं। शायद युद्ध में सब जायज़ होता है, या शायद शांति हासिल करने में सब जायज़ मान लिया जाता है। इतिहास की किताबों में यह घटना शायद दो पंक्तियों में दर्ज होगी—“एक सैन्य कार्रवाई में कुछ नागरिक हताहत हुए।” बस। इतना ही। लेकिन शायद मैं कुछ ज़्यादा ही सोच रहा हूँ। क्योंकि उन दो पंक्तियों के पीछे न जाने कितनी माँओं की दुनिया खत्म हो चुकी होगी, कितने ही पिताओं की आँखों का उजाला बुझ चुका होगा। धरती के एक छोटे-से कोने में तितलियों के चित्र बनाना सीखती बच्चियाँ हमेशा के लिए इतिहास की राख में बदल चुकी होंगी।
फिर भी दुनिया चलती रहेगी। संयुक्त राष्ट्र की बैठकें होती रहेंगी, कूटनीतिक बयान आते रहेंगे, बहस चलती रहेगी। और हर बार यह समझाया जाएगा कि शांति लाने के लिए यह सब ज़रूरी है। इसे साबित करना इन बड़े लोगों के लिए बाएँ हाथ का खेल है, क्योंकि जब ताक़त के पास तर्क भी होता है और शब्दकोश भी, तब मासूमियत की चीखें अक्सर दफ़न हो जाती हैं।

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