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जलवायु के अनुसार बकरी पालन और प्रबंधन पर कार्यशाला

जलवायु के अनुसार बकरी पालन और प्रबंधन पर कार्यशाला

  • किसानों की आय बढ़ाने, महिलाओं को स्वतंत्र बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर जोर
पटना, 09 मार्च।

सुरेंद्र मेहता माननीय मंत्री, डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग, बिहार सरकार ने अपने करकमलों द्वारा कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ किया। कार्यक्रम के उद्घाटन के साथ ही उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका स्वागत किया।

इस अवसर पर अपने संबोधन में मंत्री श्री मेहता ने कहा कि बिहार सरकार पशुपालन, डेयरी और मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए लगातार प्रयासरत है। इन क्षेत्रों के सशक्त होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है तथा किसानों और पशुपालकों की आय में वृद्धि होती है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ा जा रहा है, जिससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार के नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं।

कार्यक्रम में उपस्थित जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और गणमान्य व्यक्तियों ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए इस पहल को ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

कार्यक्रम के अंत में आयोजकों द्वारा मंत्री श्री सुरेंद्र मेहता को अंगवस्त्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया तथा सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

बदलते मौसम और कृषि पर उसके बढ़ते प्रभाव को देखते हुए, जलवायु के अनुसार बकरी पालन और प्रबंधन पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में विशेषज्ञों, किसानों और पशुपालन से जुड़े लोगों को संबोधित करते हुए कहा गया कि आज मौसम में बदलाव कृषि और पशुपालन दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती है। बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, बाढ़ और सूखा किसानों की पारंपरिक खेती को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में बकरी पालन ग्रामीण आजीविका का एक अच्छा और भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आया है।

कार्यक्रम में बताया गया कि बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है और यहां की अधिकांश आबादी आज भी खेती और पशुपालन पर निर्भर है। ऐसे में बकरी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का एक महत्वपूर्ण तरीका बन सकता है। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसान, भूमिहीन परिवार और ग्रामीण महिलाएं बकरी पालन के माध्यम से अपनी आय बढ़ाने में सफल हो रहे हैं। बिहार में बकरी पालन को अक्सर “गरीब परिवारों का एटीएम” कहा जाता है, क्योंकि जरूरत पड़ने पर किसान आसानी से बकरी बेचकर तत्काल आर्थिक सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में बकरियों की कुल संख्या लगभग 12 करोड़ है, जो दुनिया की कुल बकरी आबादी का लगभग 20 प्रतिशत है। वहीं बिहार में बकरियों की संख्या लगभग 1.28 करोड़ है, जिसके आधार पर यह राज्य देश में चौथे स्थान पर आता है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि राज्य में बकरी पालन की बहुत संभावनाएं हैं।

राज्य सरकार भी बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है। समेकित बकरी और भेड़ विकास कार्यक्रम के तहत विभिन्न क्षमता के बकरी फार्म स्थापित करने के लिए 50 से 60 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। सामान्य वर्ग के लिए 50 प्रतिशत और अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 60 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है। इस योजना के माध्यम से राज्य के ग्रामीण युवाओं, किसानों और महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं।

कार्यक्रम में बताया गया कि वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2025-26 तक राज्य के 3639 परिवारों में विभिन्न क्षमता के बकरी फार्म स्थापित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए उन्नत नस्ल की बकरियों के वितरण की योजना भी चलाई जा रही है। इस योजना के तहत दो उन्नत प्रजनन योग्य बकरियों के बीच 80 से 90 प्रतिशत तक अनुदान देकर तीन प्रजनन योग्य बकरियों का वितरण किया जाता है। इस योजना के तहत अब तक 34,218 परिवारों को कुल 1,02,654 बकरियां वितरित की जा चुकी हैं, जिससे हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।

बकरी पालन के विस्तार से राज्य में मांस उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहां वित्तीय वर्ष 2004-05 में बिहार में 176 हजार टन मांस का उत्पादन होता था, वहीं 2023-24 में यह बढ़कर 404.30 हजार टन हो गया है। वर्तमान में राज्य में प्रति व्यक्ति मांस की उपलब्धता 3.19 किलोग्राम तक पहुंच गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बकरी पालन न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर रहा है, बल्कि राज्य की पोषण सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

कार्यशाला में यह भी जानकारी दी गई कि राज्य में बकरियों की नस्ल सुधार और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए गोट सीमन बैंक स्थापित करने की योजना को मंजूरी दी गई है। इसके माध्यम से बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान को बढ़ावा मिलेगा, जिससे नस्ल में गुणात्मक सुधार होगा, मेमनों की मृत्यु दर कम होगी और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी।

विशेषज्ञों ने बताया कि बिहार की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियां बकरी पालन के लिए बहुत अनुकूल हैं। बकरियों को कम संसाधनों और सीमित स्थान में भी आसानी से पाला जा सकता है। यही कारण है कि यह व्यवसाय गरीब और छोटे किसानों के लिए बहुत लाभकारी माना जाता है।

कार्यशाला में बकरी पालन के प्रमुख लाभों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। बताया गया कि बकरियों में उच्च प्रजनन क्षमता होती है, जिससे उनकी संख्या तेजी से बढ़ती है। कम निवेश में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। बकरी से मांस, दूध, खाल और जैविक खाद जैसे कई उत्पाद प्राप्त होते हैं, जिनकी बाजार में लगातार मांग बनी रहती है। इसके साथ ही यह व्यवसाय महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए भी बहुत उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि महिलाएं घर पर रहकर भी इस कार्य को सफलतापूर्वक संचालित कर सकती हैं।

कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा गया कि बकरी पालन को केवल पारंपरिक तरीके से नहीं बल्कि वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीकों के साथ अपनाना आवश्यक है। यदि सही प्रबंधन, बेहतर नस्ल, संतुलित आहार और नियमित स्वास्थ्य देखभाल का ध्यान रखा जाए तो बकरी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बन सकता है।

कार्यशाला में भविष्य की योजनाओं पर भी चर्चा की गई। इसके तहत अधिक से अधिक किसानों को प्रशिक्षण देने, आधुनिक बकरी फार्म स्थापित करने, पशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, कृत्रिम गर्भाधान को बढ़ावा देने और बकरी उत्पादों के लिए बेहतर बाजार और उचित मूल्य सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया जाएगा।

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने यह संकल्प लिया कि जलवायु के अनुसार बकरी पालन को बढ़ावा देकर बिहार के किसानों की आय में वृद्धि, महिलाओं का सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जाएगा।

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