“वतनफ़रोशी”
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
वतन पर जब भी दुश्मन का निशाना पड़ता है,
हर एक शख़्स को घर छोड़ जाना पड़ता है।
बचाने जान को फिर और कोई राह नहीं,
पड़ोसी देश का दर ही खटखटाना पड़ता है।
ज़रा सोचो तो बताओ हम कहाँ जाएंगे,
हर एक मोड़ पे खुद को आज़माना पड़ता है।
पड़ोसी सब ही अगर दुश्मन नज़र आने लगें,
तो अपने ख़्वाब को सागर में डुबाना पड़ता है।
वक़्त ऐसा हो तो कमज़ोर मत पड़ो हरगिज़,
अंदरूनी ही दरारों को छुपाना पड़ता है।
न बहको झूठी सियासत में, न बातों में आओ,
वतन के वास्ते सब कुछ लुटाना पड़ता है।
"राकेश" सच यही है, खुल के कह रहा हूँ मैं-
खुद को बचाना है तो राष्ट्र बचाना पड़ता है।
समापन संदेश
रूस-यूक्रेन हो या इज़राइल-फ़िलिस्तीन जैसे संघर्षों ने यह सच्चाई स्पष्ट कर दी है कि
युद्ध की स्थिति में मनुष्य को अपना घर, अपनी पहचान, सब कुछ छोड़ना पड़ सकता है।
आज लाखों लोग शरणार्थी बनकर भटक रहे हैं—
यह केवल समाचार नहीं, बल्कि एक चेतावनी है।
लाखों यूक्रेनी और फिलिस्तीनी अपना सब कुछ छोड़कर पड़ोस के दूसरे देशों में शरण लेने के लिए मजबूर हो गए हैं।
भारतवासियों ! कान खोल कर सुन लो आप कहां जाएंगे ?
पश्चिम में पाकिस्तान, पूर्व में बांग्लादेश, उत्तर में चीन ! सभी तुम्हारा शत्रु देश हैं और दक्षिण में तो हिंद महासागर ।
धन संपत्ति या आपका स्टेटस कहां बच पाएगा?
भारतवासियों, एक क्षण ठहरकर सोचिए-
यदि ऐसी परिस्थिति हमारे सामने आए, तो हमारा ठिकाना कहाँ होगा?
चारों दिशाओं में चुनौतियाँ हैं—
और भीतर भी एकता सबसे बड़ी शक्ति है।
धन, वैभव, प्रतिष्ठा - सब कुछ तभी तक सुरक्षित है,
जब तक राष्ट्र सुरक्षित और सशक्त है।
इसलिए समय की माँग है-
हम सस्ती राजनीति से ऊपर उठें,
और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।मेरा राष्ट्र ही मेरी सुरक्षा है।
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