स्त्रियों की दुनिया
डॉ सुमेधा पाठक
स्त्रियों की दुनिया भी अजीब है
जाने क्यों रोटी ही अजीज है
चकले पर आटे की लोई
आड़े तिरछे नन्हें हाथों की
अद्भुत कलाकृति
मम्मी को बड़ी प्यारी लगती है
पापा को वो चमत्कारी लगती है
देखो देखो पापा,छुटकी ने बनाया
चकले पर भारत का नक्शा
भैया चहका
किन्तु
धीरे धीरे यौवन की दहलीज पर
कदम धरती बिटिया
रोटी आटे से दूर भागती है
पुस्तकों में भविष्य तलाशती है
पढ़ने लिखने को पगलाई स्त्री
अपनी दुनिया गोल नहीं करती
'अरी,रोटी तो बनाना सीख'
जैसी नानी दादी की उक्तियां
उसे बेमानी लगती हैं
अम्मा का लाड़ प्यार के बीच कहना-
'पढ़ लिख ले पर
रोटी तो बनाना सीख ले लाड़ो '
उसे बेजार बनाता है
ऊफ! खिजती स्त्री कोशिश में जुट जाती है
और फिर
विवाह पूर्व ही
नए रिश्तों के आकार लेने के ठीक पहले
स्त्री स्त्री को स्मरण कराती है-
'बिटिया रोटी तो गोल बना लेती है?'
'हाँ..हाँ क्यों नहीं!'
नए दौर की अम्मा बेझिझक पूछती है-
' बिटवा, रोटियाँ तो सेक लेता है न!
मेरी बिटिया सब्ज़ी बना लेती है!! सुमेधा पाठक
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