भारतीय मनीषा के आधुनिक ऋत्विक: डॉ. विद्यानिवास मिश्र
सत्येन्द्र कुमार पाठक
हिंदी साहित्य के आकाश में डॉ. विद्यानिवास मिश्र (1926–2005) एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र रहे हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल शब्दों को संस्कारित किया, बल्कि भारतीय संस्कृति की सोई हुई चेतना को भी झकझोर कर जगाया। वे केवल एक निबंधकार या भाषाविद् नहीं थे; वे एक 'सांस्कृतिक सेतु' थे, जिन्होंने प्राचीन वेदों की ऋचाओं और गाँव की पगडंडियों के बीच एक जीवंत संवाद स्थापित किया। 28 जनवरी 1926 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के पकड़ीडीहा गाँव में जन्में डॉ. मिश्र ने भारतीय वांग्मय को वह 'ललितात्मक' दृष्टि दी, जो विद्वानों के लिए शास्त्र है और आम जनमानस के लिए लोक-कथा।
डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व उनके पारिवारिक संस्कारों की उपज था। एक ऐसे परिवार में जन्म जहाँ संस्कृत की ध्वनियाँ हवा में तैरती थीं, उन्होंने बचपन से ही 'शब्द' की शुचिता को आत्मसात किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी—इन तीनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। वे केवल किताबी विद्वान नहीं थे, बल्कि उन्होंने कैलिफोर्निया और वाशिंगटन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय भाषा-विज्ञान का परचम लहराया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से लेकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पद तक, उनकी यात्रा शिक्षा को 'संस्कार' बनाने की रही। उनके लिए शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की प्रक्रिया थी।
: लोक-सुगंध का अक्षय भंडार विद्यानिवास जी को 'ललित निबंध' विधा का पर्याय माना जाता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद, उन्होंने इस विधा को वह विस्तार दिया जहाँ निबंध केवल जानकारी न रहकर एक 'अनुभव' बन गया।
प्रमुख कृतियाँ: 'छितवन की छाँह' (1953) से शुरू हुई उनकी यात्रा 'तुम चंदन हम पानी', 'आँगन का पंछी और बंजारा मन', और 'कदम की फूली डाल' जैसी सत्तर से अधिक कृतियों तक पहुँची। उनके निबंधों में 'स्व' का विस्तार 'सर्व' तक है। जब वे 'मैंने सिल पहुँचाई' लिखते हैं, तो वे केवल एक पत्थर की बात नहीं कर रहे होते, बल्कि उस श्रम, उस त्याग और उस भारतीय स्त्री की बात कर रहे होते हैं जो परिवार की नींव है।
बाल साहित्य: एक अघोषित क्रांति एक रोचक तथ्य है कि मिश्र जी ने व्यावसायिक अर्थों में 'बाल साहित्य' नहीं लिखा, लेकिन उनका साहित्य बाल-पाठकों के लिए सबसे अधिक 'प्राकृतिक' है। प्रकृति के साथ बचपन: उनके निबंध बच्चों को मोबाइल की स्क्रीन से निकालकर नीम की छाँव और गौरैया के घोंसले तक ले जाते हैं। संस्कार और मनोरंजन: 'आँगन का पंछी' निबंध में वे गौरैया के साथ जो आत्मीयता दिखाते हैं, वह किसी भी बच्चे के भीतर जीव-दया और पर्यावरण प्रेम का बीज बोने के लिए पर्याप्त है। वे लोक-कथाओं के माध्यम से बच्चों को भारतीय जड़ों से जोड़ते हैं, जिससे उनमें 'सांस्कृतिक आत्मविश्वास' जागता है। उनकी शैली इतनी आत्मीय है कि ऐसा लगता है जैसे कोई दादा या नाना बच्चों को पास बिठाकर किस्से सुना रहा हो। यह सरलता ही उन्हें बच्चों का प्रिय लेखक बनाती है।मूल्यों की पत्रकारिता में डॉ. मिश्र एक कुशल प्रशासक और प्रखर संपादक भी थे। 'नवभारत टाइम्स' के प्रधान संपादक के रूप में उन्होंन पत्रकारिता को 'बाजार' बनने से बचाकर 'विचार' का मंच बनाया। उन्होंने इस पत्रिका के माध्यम से नए लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की। वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे ऐसी 'अंधी आधुनिकता' के कट्टर विरोधी थे जो अपनी जड़ों को काटकर ऊँचे महल बनाना चाहती है। उन्होंने हमेशा कहा कि "गाँव का मन" ही भारत का असली मन है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो डॉ. मिश्र का साहित्य 'अतीतमुखी' (Past-oriented) नहीं, बल्कि 'अतीत-प्रेरित' है। उन्होंने सिद्ध किया कि जो गरिमा कालिदास के 'मेघदूत' में है, वही वेदना गाँव के विरहा गीतों में भी है। उन्होंने 'कदम की फूली डाल' के माध्यम से दिखाया कि प्रकृति का हर रंग ईश्वरीय लीला का हिस्सा है। उनकी भाषा में संस्कृत की तत्समता है तो ग्रामीण बोलियों की तरलता भी। यह संगम पाठक को एक मानसिक शांति प्रदान करता है। सम्मान और उपलब्धियां में राष्ट्र का गौरव भारतीय साहित्य और शिक्षा में उनके योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया: 1987: पद्मश्री , 1999: पद्म भूषण , मूर्तिदेवी पुरस्कार: साहित्य के माध्यम से मानवीय मूल्यों के प्रसार के लिए है । वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के दो बार अध्यक्ष रहे और राज्यसभा के सदस्य के रूप में भी उन्होंने देश की सांस्कृतिक नीतियों को प्रभावित किया।
एक अमर विरासत डॉ. विद्यानिवास मिश्र का अवसान 14 फरवरी 2005 को हुआ, लेकिन उनके शब्द आज भी जीवंत हैं। आज जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और मानसिक तनाव से जूझ रही है, मिश्र जी के निबंध हमें 'प्रकृति' और 'स्वयं' के करीब लौटने का रास्ता दिखाते हैं। उनका साहित्य एक 'सांस्कृतिक औषधि' है जो आधुनिक पीढ़ी को अपनी पहचान (Identity) से रूबरू कराती है। उनका 'बंजारा मन' आज भी हमें पगडंडियों पर चलने और अपनी मिट्टी की सुगंध को महसूस करने की प्रेरणा देता है। डॉ. मिश्र का जीवन-दर्शन: मिट्टी से प्रेम: जड़ों को कभी मत भूलो। , प्रकृति से संवाद: पक्षी, पेड़ और ऋतुएँ हमारे सहचर हैं। शब्द की गरिमा: भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, संस्कृति का वाहक है। आने वाली शताब्दियों तक जब भी भारतीय लोक-जीवन और ललित निबंधों की चर्चा होगी, डॉ. विद्यानिवास मिश्र का नाम सबसे पहले और सबसे सम्मान के साथ लिया जाएगा। वे भारतीय मनीषा के वे 'ऋत्विक' थे जिन्होंने अपनी लेखनी की आहुति से हिंदी साहित्य के यज्ञ को पूरा किया है।
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