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मानद उपाधियों की बाढ़ : सम्मान या व्यापार?

मानद उपाधियों की बाढ़ : सम्मान या व्यापार?

लेखक – डॉ. राकेश दत्त मिश्र*

आजकल समाज में एक अजीब सी बात हो रही है। मानद उपाधियों की संख्या बहुत बढ़ गई है। पहले ये उपाधियाँ किसी के असाधारण काम, शोध, समाजसेवा या ज्ञान के लिए दी जाती थीं। लेकिन अब ये कई जगहों पर सिर्फ एक औपचारिकता या दिखावा बनकर रह गई हैं। कई बार ये व्यापार का साधन भी बन जाती हैं।

पहले “डॉक्टरेट” पाना बहुत मुश्किल था। इसके लिए वर्षों की मेहनत, शोध और समर्पण की आवश्यकता होती थी। लेकिन अब बिना किसी शैक्षणिक योग्यता या उल्लेखनीय उपलब्धि के भी लोग “डॉ.” बन जाते हैं। कई प्रकार की मानद उपाधियाँ आसानी से दी जा रही हैं। यह परंपरा न केवल शिक्षा की गरिमा को कम कर रही है, बल्कि सच्ची प्रतिभा का सम्मान भी कम कर रही है।

कुछ संस्थान पैसे लेकर उपाधियाँ दे रहे हैं। यह बहुत बड़ी चिंता की बात है। जब उपाधियाँ खरीदी जाने लगती हैं, तो यह शिक्षा और समाज दोनों के लिए खतरनाक है। इससे लोगों को यह गलत संदेश मिलता है कि मेहनत और योग्यता की बजाय पैसों से प्रतिष्ठा मिल सकती है।

इसका बुरा असर दूरगामी है। सबसे पहले, इससे शिक्षा पर लोगों का भरोसा कम होता है। दूसरे, जो लोग वास्तव में शोध और अध्ययन में मेहनत करते हैं, उनके काम का मूल्य कम होता है। तीसरे, समाज में भ्रम फैलता है कि कौन वास्तव में योग्य है और कौन सिर्फ दिखावे के लिए उपाधि ले रहा है।

सरकार को ऐसी संस्थाओं की जांच करनी चाहिए जो बिना मान्यता के उपाधियाँ दे रही हैं। एक सख्त नीति बननी चाहिए कि मानद उपाधियाँ सिर्फ मान्यता प्राप्त संस्थानों द्वारा दी जाएं। दोषी संस्थाओं पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

हमें यह समझना होगा कि उपाधि से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्ति का ज्ञान, काम और चरित्र है। सिर्फ नाम के आगे “डॉ.” लगने से कोई महान नहीं बन जाता, उसके काम ही उसकी पहचान बनाते हैं।

यह समय है कि हम इस “उपाधि व्यापार” को रोकें। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब 진짜 और नकली उपलब्धियों में फर्क करना मुश्किल हो जाएगा।

मानद उपाधियाँ सम्मान का प्रतीक हैं, उन्हें बाजार का सामान बनने से बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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