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होलिका दहन : वैदिक यज्ञ से वैश्विक तक

होलिका दहन : वैदिक यज्ञ से वैश्विक तक

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय संस्कृति के विस्तृत फलक पर होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह एक ऐसी जीवंत परंपरा है जो सतयुग से कलियुग तक के मानवीय मूल्यों, कृषि पद्धतियों और आध्यात्मिक विजयों को स्वयं में समेटे हुए है। ज्योतिष शास्त्र और विभिन्न पंचांगों के अनुसार, प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को 'होलिका दहन' और अगले दिन 'रंगोत्सव' मनाया जाता है। आइए, इस प्राचीनतम पर्व की गहराइयों में उतरकर इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक पहलुओं को समझते हैं। . भाषाई और कृषि मूल: 'होलाका' और नवात्रैष्टि यज्ञ की प्राचीनकाल में होली को 'होलाका' के नाम से जाना जाता था। शब्द 'होलका' का शाब्दिक अर्थ है—खेत में पड़ा हुआ वह अन्न जो आधा कच्चा और आधा पका हुआ होता है। वैदिक काल में इस दिन 'नवात्रैष्टि यज्ञ' करने की परंपरा थी। प्राचीन काल से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, जहाँ नई फसल आने पर उसका पहला भाग देवताओं को अर्पित करना अनिवार्य माना जाता था। खेत से लाए गए अधपके अन्न (होलका) से हवन करने के बाद उसका प्रसाद लेने की इसी परंपरा के कारण इसका नाम 'होलिकोत्सव' पड़ा। यह तथ्य प्रमाणित करता है कि यह त्योहार वैदिक काल से ही मनाया जाता रहा है। इतिहास के पन्नों में होली के साक्ष्य में होली की प्राचीनता केवल कथाओं तक सीमित नहीं है: सिंधु घाटी सभ्यता: अवशेषों में होली और दिवाली मनाए जाने के प्रमाण मिलते हैं। अभिलेख: विंध्य पर्वतों के निकट रामगढ़ में 300 ईसा पूर्व के शिलालेख मिले हैं। साहित्य: ईसा पूर्व छठी शताब्दी में जैमिनि के 'पूर्वमीमांसा सूत्र' और 'कथक गृह्य सूत्र' में इसका वर्णन है। चित्रकला: 16वीं सदी के हंपी के मंदिरों और मेवाड़ के चित्रों में होली के दृश्य अंकित हैं।
सतयुग (होलिका और प्रहलाद): असुर राजा हिरण्याकश्यप की बहन होलिका का दहन और भक्त प्रहलाद की रक्षा। यह 'अधर्म पर धर्म' की जीत का सबसे बड़ा प्रतीक है। कामदेव का पुनरुद्धार: इसी दिन महादेव ने कामदेव को भस्म कर पुनर्जीवित किया था, इसलिए इसे 'काम महोत्सव' भी कहते हैं। त्रेतायुग (धूलिवंदन): भगवान विष्णु द्वारा धूलि वंदन की स्मृति में 'धुलेंडी' मनाई जाती है। द्वापर युग (कृष्ण और राधा): होली में रंगों का समावेश भगवान श्रीकृष्ण ने किया। तभी से इसका नाम 'फगवाह' पड़ा क्योंकि यह फागुन में आता है। राजा पृथु के काल में 'ढुंढी' नामक राक्षसी बच्चों को पीड़ा देती थी। ऋषियों की सलाह पर बच्चों ने सामूहिक शोर मचाकर और अग्नि जलाकर उसे परास्त किया। आज भी होलिका दहन के समय बच्चों का शोर मचाना और लकड़ी के डंडे गाड़ना 'बाल रक्षा' के उसी साहस का प्रतीक है। भारत के हर राज्य में होली का स्वरूप बदल जाता है, जो इसकी समृद्धि को दर्शाता है । ब्रज की लठमार होली (उत्तर प्रदेश) में बरसाना और नंदगांव की होली विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ महिलाएं लाठियों से पुरुषों को मारती हैं और पुरुष ढाल से अपना बचाव करते हैं। यह गोपियों और कृष्ण के बीच के प्रेमपूर्ण ठिठोली का जीवंत रूप है। होला मोहल्ला (पंजाब) में सिखों के लिए होली 'होला मोहल्ला' के रूप में मनाई जाती है। गुरु गोविंद सिंह जी ने इसे वीरता के पर्व के रूप में स्थापित किया। यहाँ रंगों के साथ-साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी और सैन्य कौशल का प्रदर्शन होता है। कुमाऊंनी होली (उत्तराखंड) में होली गायन की परंपरा है। यहाँ 'बैठकी होली' और 'खड़ी होली' होती है, जहाँ लोग शास्त्रीय रागों में होली के गीत गाते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में 'डोल पूर्णिमा' कहते हैं। भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों को पालकी में रखकर जुलूस निकाला जाता है और भक्त भजन गाते हुए गुलाल उड़ाते हैं। शिमगो , गोवा में इसे 'शिमगो' कहा जाता है। यहाँ लोक नृत्यों और झांकियों के साथ समुद्र के किनारे भव्य उत्सव मनाया जाता है। प्राचीन काल में रंग पलाश (टेसू) के फूलों से बनते थे। ये प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए औषधि समान थे। होली का नारा "बुरा न मानो होली है" समाज से ऊंच-नीच और भेदभाव मिटाने का माध्यम है। आज यह गयाना, फिजी और मॉरीशस जैसे देशों में भी एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव बन चुका है।होली का सफर 'होलाका' यज्ञ की पवित्र अग्नि से शुरू होकर, प्रहलाद की अटूट भक्ति और श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम के रंगों तक फैला हुआ है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जीवन में खुशियां तभी स्थायी हैं जब हम सामूहिक रूप से बुराई का अंत करें। फागुन की यह पूर्णिमा हमें नवीनता, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है।
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