होलिका दहन में,सारे दुर्गुण स्वाह हो
कुमार महेंद्रदूर जाति धर्म भेदभाव,
संकीर्ण सोच समूल अस्त ।
सत्य सदा शिखर विराजे,
झूठ पाखंड हौसले पस्त ।
अन्याय विरुद्ध बुलंद स्वर,
सर्वत्र सुख समृद्धि प्रवाह हो ।
होलिका दहन में,सारे दुर्गुण स्वाह हो ।।
पुनीत पावन जन हृदय बिंदु,
स्नेह प्रेम भाईचारा प्रसून खिले ।
संबंध अंतर अपनत्व निर्झर,
ओझल संपूर्ण गिले शिकवे ।
सतर्क भौतिक प्रगति चकाचौंध,
हर कदम प्रयास प्रकृति राह हो ।
होलिका दहन में,सारे दुर्गुण स्वाह हो ।।
पटाक्षेप अनैतिक व्यवहार,
शुद्ध सात्विक पथ गमन ।
हिय हिलोर मर्यादा संस्कार,
रग रग उत्साह उमंग रमन ।
सतत श्रम अठखेलियां संग,
संकल्प सफलता गवाह हो ।
होलिका दहन में,सारे दुर्गुण स्वाह हो ।।
अंकुश मोबाईल अधिक प्रयुक्ति,
लक्ष्य हित समय सदुपयोग ।
आत्मसात नैसर्गिक दिनचर्या,
सदैव दूरी व्यसन नशा प्रयोग ।
तज वासनामय आचार विचार,
अंतःकरण नारी आदर अथाह हो ।
होलिका दहन में,सारे दुर्गुण स्वाह हो ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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