विकास का ढोल और हकीकत की पोल
- क्या देश विकास कर रहा है या आंकड़ों के जादू से जनता को भ्रमित किया जा रहा है?
लेखक: डॉ. राकेश दत्त मिश्र
आज भारत में एक नई राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है—काम कम, प्रचार अधिक; उपलब्धियां कम, आंकड़े अधिक; जवाबदेही कम, आत्मप्रशंसा अधिक।
देश के सामने हर दिन नई-नई उपलब्धियों की ऐसी सूची परोसी जाती है मानो 2014 से पहले भारत में न सड़क थी, न हवाई अड्डे थे, न डिजिटल भुगतान था, न रक्षा उद्योग था और न ही विज्ञान एवं तकनीक का कोई अस्तित्व था। ऐसा चित्र खींचा जाता है जैसे भारत का इतिहास 15 अगस्त 1947 से नहीं, बल्कि 26 मई 2014 से शुरू हुआ हो।
लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का प्रमाण सरकारी विज्ञापन हैं या जनता का जीवन?
एयरपोर्ट या केवल नामपट्ट?
सरकार कहती है कि एयरपोर्टों की संख्या दोगुनी हो गई। लेकिन जनता पूछ रही है कि कितने एयरपोर्टों पर नियमित उड़ानें चल रही हैं?
यदि किसी बंद हवाई पट्टी पर नया बोर्ड लगा दिया जाए, किसी हेलीपैड को एयरपोर्ट घोषित कर दिया जाए, किसी जलाशय को वाटर एयरोड्रम बता दिया जाए, तो क्या उससे देश की हवाई कनेक्टिविटी बढ़ जाती है?
विकास का अर्थ कागज पर संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि जमीन पर सुविधा उपलब्ध कराना होता है।
एक्सप्रेसवे या शब्दों की बाजीगरी?
हजारों किलोमीटर एक्सप्रेसवे का दावा किया जा रहा है। लेकिन क्या जनता को यह भी बताया जाता है कि आंकड़े गिनने का तरीका बदल गया है?
आज एक सड़क की चार लेनों को अलग-अलग गिनकर लंबाई बढ़ा देना और सामान्य राष्ट्रीय राजमार्गों को भी एक्सप्रेसवे का तमगा दे देना नया राजनीतिक गणित बन गया है।
देश को याद है कि स्वर्णिम चतुर्भुज का निर्माण बिना चौबीस घंटे प्रचार किए हुआ था। सड़कें विकास के लिए बनाई गई थीं, चुनावी पोस्टरों के लिए नहीं।
मेट्रो: यात्री कम, उद्घाटन अधिक
आज हर चुनाव से पहले किसी न किसी शहर में मेट्रो का फीता काटा जाता है।
बिहार की राजधानी पटना में मेट्रो रेल परियोजना को आधुनिक विकास और शहरी परिवहन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया गया था। चुनावी माहौल के बीच इसका उद्घाटन बड़े उत्साह और प्रचार-प्रसार के साथ किया गया। मंचों से दावे किए गए कि पटना अब देश के विकसित महानगरों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा और आम नागरिकों को जाम से मुक्ति मिलेगी। लेकिन आज स्थिति यह है कि आम जनता के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है-"मेट्रो कहाँ है? और उसके यात्री कहाँ हैं?"
उद्घाटन की राजनीति
भारत में बड़े-बड़े विकास कार्यों का उद्घाटन अक्सर चुनावों के आसपास देखने को मिलता है। पटना मेट्रो का उद्घाटन भी ऐसे ही समय में हुआ जब चुनावी वातावरण अपने चरम पर था। उद्घाटन समारोह में नेताओं के भाषण, मीडिया की सुर्खियाँ और विकास के बड़े-बड़े दावे दिखाई दिए। ऐसा लगा मानो अगले ही दिन पटना की सड़कों पर मेट्रो दौड़ने लगेगी।
लेकिन उद्घाटन के बाद वास्तविकता कुछ और ही नजर आई। परियोजना का बड़ा हिस्सा अभी भी निर्माणाधीन है। कई स्थानों पर काम की गति धीमी दिखाई देती है और आम जनता को मेट्रो सेवा का प्रत्यक्ष लाभ अभी तक नहीं मिल पाया है।
जनता की अपेक्षाएँ और हकीकत
पटना जैसे शहर में बढ़ती आबादी, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण को देखते हुए मेट्रो की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। लोगों ने उम्मीद की थी कि मेट्रो शुरू होने से कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों, छात्रों, व्यापारियों और आम यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।
लेकिन वर्तमान में अधिकांश नागरिकों के लिए मेट्रो केवल समाचारों, विज्ञापनों और सरकारी दावों तक ही सीमित दिखाई देती है। शहर के कई लोग मजाक में कहते हैं कि "मेट्रो का उद्घाटन तो देख लिया, अब मेट्रो को भी देखने का इंतजार है।"
विकास बनाम प्रदर्शन
किसी भी परियोजना का उद्देश्य केवल उसका उद्घाटन नहीं, बल्कि उसका सफल संचालन होना चाहिए। यदि किसी योजना का उद्घाटन हो जाए लेकिन उसका लाभ जनता तक न पहुँचे, तो वह विकास से अधिक प्रदर्शन प्रतीत होने लगता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और परियोजना से जुड़े अधिकारी उद्घाटन की राजनीति से आगे बढ़कर समयबद्ध तरीके से परियोजना को पूरा करें। जनता को यह जानने का अधिकार है कि मेट्रो कब पूरी तरह चालू होगी, कितने स्टेशन कार्यरत होंगे और कब वह वास्तव में यात्रा कर सकेगी।
आर्थिक बोझ का प्रश्न
मेट्रो परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यह धन अंततः जनता के करों से आता है। ऐसे में यदि परियोजना वर्षों तक अधूरी रहती है या उसका उपयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं होता, तो आर्थिक बोझ बढ़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मेट्रो परियोजना की सफलता केवल निर्माण से नहीं, बल्कि यात्रियों की संख्या और उसकी उपयोगिता से तय होती है। यदि यात्री कम होंगे तो परिचालन लागत निकालना भी चुनौती बन सकता है।
क्या पटना तैयार है?
यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पटना शहर की वर्तमान संरचना मेट्रो के व्यापक उपयोग के लिए पूरी तरह तैयार है? शहर में फीडर बस सेवा, पार्किंग व्यवस्था, सड़क संपर्क और यात्री सुविधाओं का समुचित विकास भी आवश्यक है। केवल मेट्रो लाइन बना देने से परिवहन व्यवस्था सफल नहीं हो जाती।
जनता क्या चाहती है?
जनता किसी परियोजना का विरोध नहीं करती। वह केवल यह चाहती है कि जो वादे किए जाएँ, वे समय पर पूरे हों। लोगों को भाषणों से अधिक परिणाम चाहिए। उन्हें उद्घाटन समारोहों की तस्वीरों से अधिक चलती हुई मेट्रो और सुविधाजनक यात्रा चाहिए।
निष्कर्ष
पटना मेट्रो बिहार के भविष्य की एक महत्वपूर्ण परियोजना है और इसकी सफलता पूरे राज्य के लिए गौरव का विषय होगी। लेकिन यह सफलता तभी सार्थक होगी जब मेट्रो वास्तव में जनता के जीवन का हिस्सा बनेगी। केवल उद्घाटन, शिलान्यास और राजनीतिक प्रचार से विकास का सपना पूरा नहीं होता।
आज पटना की जनता पूछ रही है—
"मेट्रो का उद्घाटन तो हो गया, लेकिन मेट्रो कब चलेगी?"
जब इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर मिलेगा, तभी पटना मेट्रो को वास्तविक अर्थों में विकास की रेल कहा जा सकेगा, अन्यथा यह परियोजना "यात्री कम, उद्घाटन अधिक" की कहावत का उदाहरण बनकर रह जाएगी।
सवाल यह नहीं है कि मेट्रो बनी या नहीं।
सवाल यह है कि क्या वह आर्थिक रूप से व्यवहार्य है? क्या उसमें पर्याप्त यात्री हैं? क्या वह शहर की परिवहन समस्या का समाधान कर रही है?
यदि करोड़ों रुपये खर्च करके ऐसी परियोजनाएं बनाई जाएं जो केवल राजनीतिक विज्ञापन का बैकग्राउंड बनकर रह जाएं, तो उसे विकास नहीं कहा जा सकता।
डिजिटल इंडिया: इतिहास मिटाने की कोशिश
सबसे बड़ा राजनीतिक मिथक यह फैलाया गया कि डिजिटल भुगतान की शुरुआत 2014 के बाद हुई।
क्या देश भूल गया है कि RTGS, NEFT, IMPS, नेट बैंकिंग और कार्ड भुगतान वर्षों से चल रहे थे?
यूपीआई भारत की उपलब्धि है, लेकिन यह किसी एक नेता या सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। यह भारतीय वैज्ञानिकों, बैंकरों और तकनीकी विशेषज्ञों की सामूहिक मेहनत का परिणाम है।
दुर्भाग्य यह है कि आज हर संस्थागत उपलब्धि को एक व्यक्ति की उपलब्धि में बदलने की कोशिश की जा रही है।
रक्षा निर्यात का शोर, आयात की खामोशी
रक्षा निर्यात बढ़ने की बात की जाती है।
लेकिन क्या देश को यह भी बताया जाता है कि भारत अब भी दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में शामिल है?
क्या आत्मनिर्भरता केवल भाषणों से आती है?
यदि आत्मनिर्भरता सचमुच लक्ष्य है तो HAL, DRDO और ISRO जैसी संस्थाओं को मजबूत करना होगा, क्योंकि राष्ट्र भाषणों से नहीं, संस्थाओं से मजबूत होता है।
सेमीकंडक्टर: सपना अच्छा है, लेकिन सच भी जरूरी है
सरकार ऐसा माहौल बना रही है जैसे भारत कल से ही दुनिया का चिप निर्माण केंद्र बनने वाला है।
हकीकत यह है कि अधिकांश परियोजनाएं अभी प्रारंभिक अवस्था में हैं।
घोषणाएं करना आसान है, उत्पादन शुरू करना कठिन।
शिलान्यास और उद्घाटन में अंतर होता है। पहला फोटो देता है, दूसरा परिणाम देता है।
सौर ऊर्जा और आत्मनिर्भरता का भ्रम
सौर ऊर्जा की वृद्धि निस्संदेह स्वागतयोग्य है।
लेकिन यदि सोलर पैनल, सेल और महत्वपूर्ण उपकरण विदेशों से आयात किए जा रहे हों तो आत्मनिर्भरता का दावा अधूरा रह जाता है।
आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल उत्पाद लगाना नहीं, बल्कि उन्हें स्वयं बनाना भी है।
महंगाई: विकास के दावों की सबसे बड़ी परीक्षा
सरकार चाहे जितने विज्ञापन चला ले, लेकिन आम आदमी अपनी रसोई में सच देखता है।
उसके लिए विकास का मतलब यह है कि गैस सिलेंडर कितना महंगा हुआ, पेट्रोल की कीमत क्या है, बच्चों की पढ़ाई का खर्च कितना बढ़ा और दवाइयों पर कितने पैसे लग रहे हैं।
यदि विकास के सारे दावों के बावजूद आम नागरिक की जेब लगातार खाली हो रही है, तो सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए।
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं
आज देश में एक विचित्र माहौल बनाया जा रहा है कि सरकार से सवाल पूछना राष्ट्रविरोध है।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है।
सरकारें जनता की मालिक नहीं होतीं। वे जनता की सेवक होती हैं।
और सेवक का पहला धर्म जवाबदेही होता है, आत्मप्रशंसा नहीं।
निष्कर्ष
भारत को विकास चाहिए, प्रचार नहीं।
भारत को रोजगार चाहिए, जुमले नहीं।
भारत को जवाबदेही चाहिए, आत्ममुग्धता नहीं।
और भारत को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो इतिहास मिटाकर अपना महिमामंडन करने के बजाय राष्ट्र की संस्थाओं, वैज्ञानिकों, किसानों, मजदूरों और करदाताओं के योगदान को सम्मान दे।
क्योंकि किसी भी राष्ट्र का निर्माण एक व्यक्ति नहीं करता, करोड़ों नागरिकों का सामूहिक परिश्रम करता है।आज आवश्यकता विकास के नारों की नहीं, विकास के प्रमाणों की है।
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