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हिरण्यबाहु के तट से करपी के 'ब्रह्म संस्कृति' तक की महायात्रा

हिरण्यबाहु के तट से करपी के 'ब्रह्म संस्कृति' तक की महायात्रा

: सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार की धरती का कण-कण इतिहास की परतों से ढका है, लेकिन मगध का वह कोना जहाँ सोन नद , विलुप्त वैदिक नदी हिरण्यबाहु और पुनपुन नदियाँ अपनी अविरल धाराओं से भूमि को सींचती हैं, अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। अरवल जनपद का करपी क्षेत्र और इसके आसपास का भूभाग केवल भूगोल का हिस्सा नहीं, बल्कि वैदिक ऋषियों की तपोस्थली, पराक्रमी राजाओं की कर्मभूमि और शाक्त-शैव-वैष्णव परंपराओं का अद्भुत संगम है। वैदिक नदियों का पुण्य प्रताप: हिरण्यबाहु , सोन नद और पुनपुन - प्राचीन संहिताओं और पुराणों में जिस हिरण्यबाहु का वर्णन मिलता है, वह आज का 'सोन नद' है। इसकी स्वर्णिम रेत के कारण इसे 'हिरण्य प्रदेश' कहा गया। इस नदी के तट पर आर्य संस्कृति का विस्तार हुआ। वहीं दूसरी ओर पुनपुन (पुनः-पुनः) का आध्यात्मिक महात्म्य इसे मोक्षदायिनी बनाता है। इन दो नदियों के बीच का यह क्षेत्र 'अंतर्वेदी' के समान पवित्र माना गया है, जहाँ जल संस्कृति ने जीवन के हर आयाम को प्रभावित किया है।
ऋषि च्यवन और राजकुमारी सुकन्या: कायाकल्प की भूमि - वैदिक नदी हिरण्यबाहू तट का यह क्षेत्र भृगुवंशी ऋषि च्यवन की कठोर तपस्या का साक्षी है। पौराणिक आख्यान बताते हैं कि यहीं राजा शर्याती की पुत्री सुकन्या ने अनजाने में मिट्टी के ढेर में चमकती ऋषि की आँखों को छेद दिया था, जिसके प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने वृद्ध ऋषि से विवाह किया। यहीं अश्विनी कुमारों ने ऋषि को आरोग्य प्रदान किया और च्यवनप्राश जैसी दिव्य औषधि का प्रादुर्भाव हुआ। आज भी च्यवनेश्वर शिवलिंग और बासाताड़ (वत्स स्थल) उस कालखंड की गवाही देते हैं। ऋषि वत्स और मधुश्रवा जैसे मनीषियों ने इस क्षेत्र को अपनी मेधा से आलोकित किया, जिससे यह क्षेत्र 'ब्रह्म संस्कृति' का शीर्ष केंद्र बना।
करपी की ऐतिहासिक अस्मिता: राजा करुष से बेलखारा तक - इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि वैवस्वत मनु के पुत्र राजा करुष ने इस क्षेत्र की स्थापना की थी, जिसे 'करुष देश' कहा गया। यह क्षेत्र अपनी वीरता और सामरिक महत्व के लिए विख्यात था। बेलखारा का शिलालेख: मध्यकालीन भारत के इतिहास को प्रमाणित करने वाला बेलखारा महाल का स्तंभ और शिलालेख गहड़वाल शासकों (राजा जयचंद्र के काल) की प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता है। शहर तेलपा और गढ़ संस्कृति: ऊंचे टीलों पर बसा 'शहर तेलपा' और नादी कश्यप गढ़, रामपुर चाय गढ़, बंभई गढ़ तथा कयाल गढ़ जैसे स्थान यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ एक सुव्यवस्थित सुरक्षा तंत्र और समृद्ध शहरी सभ्यता विद्यमान थी।
शाक्त और शैव सरोवर कूप परंपरा: माता जगदंबा और चतुर्भुज भगवान रूप करपी की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र यहाँ का जगदंबा स्थान है। यहाँ जगदंबा की चतुर्भुज भगवान विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा शाक्त और वैष्णव समन्वय का अनूठा उदाहरण है। लोक मान्यताओं में यह स्थान 'जाग्रत शक्तिपीठ' के समान है। इसके साथ ही, क्षेत्र में बिखरे शिव-पार्वती विहार, प्राचीन शिवलिंग और सती स्थान यह बताते हैं कि यहाँ की जनता ने शक्ति और शिव को अपने जीवन के केंद्र में रखा। कोयली काली घाट और कोचहसा जैसे स्थान आज भी तंत्र और अघोर साधना की प्राचीन स्मृतियों को संजोए हुए हैं। चतुर्थ दिशाओं में सरोवर प्राचीन अवशेष है। मौर्यकालीन चतुर्थ कूप विलुप्त हो गए है ।
. सती आडा और ब्रह्म स्थान: लोक-आस्था के स्तंभ में अरवल जिले की संस्कृति में 'पूर्वज पूजा' और 'त्याग के सम्मान' का विशेष स्थान है। सती आडा: करपी - वंशी रोड के किनारे स्थित 'सती आडा' उन महान पांच नारियों की स्मृति है जिन्होंने अपने सतीत्व और कुल की मर्यादा के लिए अग्नि को गले लगा लिया। यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि नारी शक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा का प्रतीक है। ब्रह्म स्थान: करपी - कुरथा रोड के किनारे ब्रह्म स्थान स्थित 'ब्रह्म संस्कृति' का सबसे जीवंत रूप 'ब्रह्म स्थान' (ब्रह्म बाबा) में मिलता है। विद्वान ब्राह्मणों और ऋषियों की तपस्या के सम्मान में स्थापित ये स्थान आज भी गाँवों के रक्षक और न्याय के केंद्र माने जाते हैं। पंचतीर्थ, सरोवर और मठिया संस्कृति प्राचीन काल में जल प्रबंधन की श्रेष्ठता यहाँ के परियारी का चकला सरोवर और पंचतीर्थ में देखी जा सकती है। मादसरवा में ऋषि मधुश्रवा की भूमि च्यवनेश्वर शिवलिंग और पाँच पवित्र जलाशयों का समूह आध्यात्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र रहा है। गाँवों की सुरक्षा और आध्यात्मिक घेराबंदी के लिए चारों दिशाओं में स्थापित पुरवारी, पश्चियारी, दक्षिणवरी और उत्तरवारी मठिया इस क्षेत्र की अनूठी सामाजिक-धार्मिक संरचना का हिस्सा हैं। कागजी मोहल्ला और गौड धावा जैसे नाम यहाँ के प्राचीन व्यापारिक और शिल्पकला के गौरव को दर्शाते हैं।
आज जब हम 21वीं सदी में खड़े हैं, तो प्रश्न यह उठता है कि क्या हम अपनी इन अमूल्य विरासतों को सहेज पा रहे हैं? जम्मभोरा, बेराउवा, पुरवारी और हैहै अल्वावी जैसे नाम केवल पते नहीं हैं, बल्कि ये हमारी जड़ें हैं। पुनपुन और सोन के तट पर विकसित हुई यह सभ्यता आज आधुनिकता के दौर में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। इन अनछुए ऐतिहासिक स्थलों को मुख्यधारा में लाया जाए। चाहे वह बेलखारा के शिलालेखों का संरक्षण हो या ऋषि च्यवन की तपोभूमि का विकास, यह कार्य केवल सरकार का नहीं, बल्कि हम सबका सामूहिक दायित्व है।
करपी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत वैदिक ऋषियों के मंत्रों, राजाओं के शौर्य और लोक-देवताओं की करुणा से निर्मित है। सोन (हिरण्यबाहु) की लहरें और पुनपुन की पावन धाराएं आज भी हमसे अपनी गौरवगाथा कहने को आतुर हैं। यदि हम अपनी इन जड़ों को पहचान लें, तो मगध का यह कोना विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र पर पुनः चमक उठेगा ।


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