(असहायता की पराकाष्ठा)
हरीश राणा के सामने, असहाय हुई दुनिया सारी
*कुमार महेंद्र*
नतमस्तक हुआ चिकित्सा विज्ञान,
भौतिक प्रगति पड़ी भारी।
फीकी इक्कीसवीं सदी चमक,
मौन न्याय, व्यवस्था लाचारी।
जीवन हार गया मृत्यु आगे,
साँसें थकीं, जीत गई बीमारी।
हरीश राणा के सामने, असहाय हुई दुनिया सारी।।
प्रतिभा पुंज अभियांत्रिकी छात्र,
परिवार-राष्ट्र का उज्ज्वल तारा।
अनहोनी के क्रूर प्रहार झेल,
ओझल हुआ ध्रुव-सा सितारा।
हारे मात-पिता अथक प्रयास,
अंतिम सत्य हुआ रौद्र रूपधारी।
हरीश राणा के सामने, असहाय हुई दुनिया सारी।।
ब्रेन हैमरेज से गहन कोमा,
जीवन-तंत्र बना सहारा।
आशा, उमंग, प्रार्थनाएँ सब,
बहने लगीं अब विपरीत धारा।
अंततः इच्छा-मृत्यु याचना,
न्यायालय पहुँची जीवन लाचारी।
हरीश राणा के सामने, असहाय हुई दुनिया सारी।।
राष्ट्र-इतिहास का प्रथम क्षण,
स्वीकृत हुई अंतिम पुकार।
हटे प्राण-रक्षक उपकरण जब,
मृत्यु बनी जैसे उपकार।
पच्चीस मार्च महाप्रयाण,
मुरझा गई जीवन-फुलवारी।
हरीश राणा के सामने, असहाय हुई दुनिया सारी।।
*कुमार महेंद्र*
(स्वरचित मौलिक रचना)
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