मुस्कुराना सीखना है
अरुण दिव्यांशबहुत रुलाया इन जालिमों ने ,
अब मुझको नहीं चीखना है ।
रोते रोते हमने सबक है लिया ,
अब मुस्कुराना सीखना है ।।
बिन सीखे रुलाया लोगों ने ,
पर नहीं किसी ने हॅंसाया है ।
जब मार्ग पर मैं आना चाहा ,
अपनों ने ही भटकाया है ।।
मायूसी बोला न मायूस हो ,
जीवन हेतु मुस्कुराना सीखो ।
दम ले लेंगे जालिम तुम्हारे ,
मायूसी तोड़ मुस्कुराना सीखो ।।
मैंने नहीं चाहा कहीं भी जाना ,
किंतु हो जाता मैं मजबूर हूॅं ।
किंतु शिक्षा देता मैं सभी को ,
चाहता रहना मैं भी तो दूर हूॅं ।।
शिक्षा देता सबको यही मैं ,
संघर्ष संग बढ़ना सीखना है ।
जीना तुम्हें है इंसान बनकर ,
अत्यधिक सुंदर न दीखना है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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