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विशेष एमपी/MLA कोर्ट ने प्रो. चंद्रशेखर मामले में मांगा अभियोजन स्वीकृति आदेश, 25 फरवरी को होगी अगली सुनवाई

विशेष एमपी/MLA कोर्ट ने प्रो. चंद्रशेखर मामले में मांगा अभियोजन स्वीकृति आदेश, 25 फरवरी को होगी अगली सुनवाई

इस मामले में अधिवक्ता लक्ष्मण पाण्डेय ने बताया कि 

माननीय विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट में एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई चल रही है, जिसमें अभियुक्त प्रो. चंद्रशेखर के खिलाफ मुकदमा संख्या 583/2023 लंबित है। इस मामले में अदालत ने बहुत सख्ती से प्रक्रियात्मक नियमों का पालन करने का निर्देश दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए, न्यायालय ने परिवादी श्री आर डी मिश्र को निर्देश दिया है कि वे अभियुक्त के विरुद्ध सक्षम प्राधिकारी से प्राप्त अभियोजन स्वीकृति आदेश को अदालत में प्रस्तुत करें। यह आदेश मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया को और मजबूती प्रदान करेगा।

धिवक्ता लक्ष्मण पाण्डेय ने कानूनी पेच और अभियोजन स्वीकृति पर बतायाकि :-

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी या नेता के खिलाफ मामला चलाने से पहले सरकार की अनुमति लेना जरूरी है। अदालत ने यह आदेश दिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस कानूनी प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया जाए।


मामले से जुड़ी विशिष्ट कानूनी धाराएं और उनका प्रभाव


इस केस की सुनवाई के केंद्र में निम्नलिखित कानूनी प्रावधान सबसे महत्वपूर्ण हैं:


1. भारतीय दंड संहिता (IPC) की संभावित धाराएं:


चूंकि यह मामला प्रो. चंद्रशेखर (बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री) से संबंधित है, जिनके विरुद्ध विवादित बयानों को लेकर परिवाद दायर किया गया था, इसमें आमतौर पर निम्नलिखित धाराएं प्रभावी होती हैं:


• धारा 153ए: अलग-अलग समुदायों के बीच धर्म, जाति, भाषा या जन्मस्थान के आधार पर नफरत फैलाने और शांति भंग करने की कोशिश।


• धारा 295ए: यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी धार्मिक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास करता है, तो यह धारा लागू होती है। यह कानूनी प्रावधान किसी भी ऐसे कृत्य को दंडनीय बनाता है जो किसी विशेष धर्म या उसके अनुयायियों के प्रति अपमानजनक हो।


• धारा 505: सार्वजनिक शांति भंग करने के इरादे से अफवाह फैलाना या भ्रामक बयान देना।


2. अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) और CrPC की धारा 197:


माननीय न्यायालय ने जो 'अभियोजन स्वीकृति' मांगी है, वह कानूनी रूप से अनिवार्य है क्योंकि:


• धारा १९७ सीआरपीसी: इस धारा के अनुसार, किसी भी सरकारी अधिकारी, जैसे मंत्री या विधायक, के खिलाफ उनके कार्यकाल में किए गए किसी काम के लिए कानूनी कार्रवाई शुरू करने से पहले सरकार या उचित अधिकारी की लिखित मंजूरी आवश्यक है।


• न्यायालय का रुख: बिना इस स्वीकृति के, अदालत किसी लोक सेवक के विरुद्ध 'संज्ञान' (Cognizance) नहीं ले सकती। इसी कानूनी अड़चन को दूर करने के लिए न्यायालय ने परिवादी श्री आर डी मिश्र को यह आदेश दिया है।


3. संज्ञान का बिंदु (Point of Cognizance): यह वह बिंदु है जहां कोई व्यक्ति या संस्था किसी विशेष जानकारी या घटना के बारे में जागरूक होती है। यह जागरूकता का पहला चरण है जो हमें किसी समस्या या अवसर की पहचान करने में मदद करता है। संज्ञान का बिंदु हमारे विचारों और निर्णयों को प्रभावित करता है, और यह हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


* धारा 190 CrPC: अगली सुनवाई 25 फरवरी 2026 को होगी। इस दिन कोर्ट तय करेगा कि पेश किए गए सबूत और सरकारी मंजूरी इस मामले को मुकदमे के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।


अगली सुनवाई के दौरान और संज्ञान लेने के बिंदु पर विचार किया जाएगा।


मामले में अब अगली सुनवाई 25 फरवरी 2026 को तय की गई है। इस दिन माननीय न्यायालय इस बिंदु पर विचार करेगा कि क्या प्राप्त साक्ष्यों और अभियोजन स्वीकृति के आधार पर अभियुक्त के विरुद्ध कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए। यदि परिवादी उस तिथि तक स्वीकृति आदेश प्रस्तुत कर देते हैं, तो न्यायालय मामले की कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए अपना फैसला सुना सकता है।

फिलहाल, सभी की निगाहें 25 फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जो इस हाई-प्रोफाइल मामले की दिशा तय करेगी।
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