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मैं लिखने बैठी हूं

मैं लिखने बैठी हूं

तुम्हारे प्यार की कहानी
जब पहली बार तुम्हें देखी थी
मेरी आंखों में प्यार उमड़ आया था तुम्हारे लिए
उन्नत ललाट, तीखे नैन-नक्श और होंठों पर निश्चल मुस्कान
तुम्हारी छवि मेरे दिल में बस गयी थी
तुम सिर्फ तन से ही सुंदर नहीं
मन से भी सुंदर थे
हमेशा मेरी भावनाओं का सम्मान किया तुमने
दर्द में हाथ थामे रखा
कभी हंसाया,
कभी चिढ़ा कर रुलाया तुमने
फिर मेरे आंसू पोंछ दुलारा भी तुमने
शाम में जब तुम चाय बनाकर लाते हो
चाय की मिठास की तरह रोज तुम मुझमें घुल जाते हो
जिंदगी के उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर
हम मुख्य सड़क तक चलते रहते हैं साथ
कभी घबड़ाते, कभी हिम्मत दिखाते
हर परिस्थिति में थामे रहते एक दूसरे का हाथ
तुम मेरे साथ बैठकर लिखते हो
संघर्ष में भी जीत की कहानी
समय के झूले पर झूलते
युवावस्था से बुढ़ापे तक की रवानगी
-सविता शुक्ला
मुंबई





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