"मौन के अक्षरों में अंकित जीवन"
पंकज शर्माजीवन—
किसी अनपढ़ी पुस्तक की तरह
मेरी हथेलियों में खुला पड़ा है,
जिसके पृष्ठ हवा से नहीं,
अनुभवों से उलटते हैं धीरे-धीरे।
उसकी भाषा शब्दों में नहीं,
क्षणों की सूक्ष्म रेखाओं में लिखी है;
जहाँ एक विराम
पूरे अध्याय का अर्थ बन जाता है,
और एक न बोला गया वाक्य
सबसे गहरा कथ्य।
मैं पढ़ता हूँ उसे
घटनाओं की स्याही से नहीं,
आत्मा की दृष्टि से—
जहाँ शोर अनुपस्थित है,
पर अर्थ का स्पंदन प्रखर।
कुछ पृष्ठ धुंधले हैं,
जैसे स्मृतियों पर जमी धूल;
कुछ इतने उजले
कि आँखें ठहर नहीं पातीं—
फिर भी, दोनों ही
कथा का अनिवार्य विस्तार हैं।
मौन यहाँ रिक्तता नहीं,
एक सजग संवाद है—
जैसे भीतर बैठा पाठक
स्वयं लेखक भी हो,
और हर अनुभूति
अपना अर्थ स्वयं उद्घाटित करती हो।
अंततः समझ में आता है—
जीवन बोलता कम है,
पर उद्घाटित अधिक;
वह लिखता नहीं ऊँचे स्वरों में,
बल्कि शांत अक्षरों से
हमारे भीतर ही अपना पाठ पूरा कर जाता है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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