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धर्म के नाम पर धंधा

धर्म के नाम पर धंधा

अरुण दिव्यांश
क्यूॅं हो रहे तू मद में अंधा ,
क्यूॅं चलते मिलाकर कंधा ।
असत्य नाम सत्य बनाया ,
धर्म के नाम अधर्म धंधा ।।
पाखंड से नाता तू तोड़ ले ,
अधर्म से मन को मोड़ ले ।
नर का धड़ लिए धरा पर ,
नारायणी रिश्ता जोड़ ले ।।
मनु वंशज तुम मनुज हुए ,
मनु मानव मन मान रख ।
मावन रूप न बन दानव ,
मानवता ये अरमान रख ।।
पल पल में यह दिवा घटे ,
पल पल में ही घटते पख ।
पल पल बीता पलपल में ,
हे नर नारायण ध्यान रख ।।
पल पल बीतते पलपल में ,
पलपल भूमि दलदल में ।
जलवे में ही जीवन जला ,
जलज का अरमान रख ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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