महाशिवरात्रि: एक ब्रह्मांडीय चेतना का महापर्व
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय मनीषा में 'शिव' शब्द का अर्थ है 'कल्याण'। जब हम महाशिवरात्रि की बात करते हैं, तो यह केवल एक पंचांग की तिथि नहीं रह जाती, बल्कि यह उस महान अंधकार की रात है जिसमें प्रकाश के पुंज का जन्म होता है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की वह कालरात्रि, जब संपूर्ण सृष्टि की ऊर्जा एक विशिष्ट बिंदु पर केंद्रित होती है, उसे ही हम 'महाशिवरात्रि' कहते हैं। यह महापर्व आत्मा के परमात्मा में विलीन होने और अज्ञान के कुहासे को चीरकर ज्ञान के सूर्योदय का उत्सव है।
महाशिवरात्रि का इतिहास कथाओं के उन मोतियों से बना है, जो मानव जीवन के मूल्यों को परिभाषित करते हैं।भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की है। यह मिलन 'पुरुष' और 'प्रकृति' के एकाकार होने का प्रतीक है। वैरागी शिव का गृहस्थ बनना यह संदेश देता है कि संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहकर भी निर्लिप्त रहना ही सच्ची साधना है। नीलकंठ की रक्षा का संकल्प: समुद्र मंथन के दौरान जब 'हलाहल' विष निकला, तो देवताओं और असुरों के पास कोई विकल्प नहीं था। शिव ने उस विष को पीकर उसे अपने कंठ में रोक लिया। यह कथा हमें सिखाती है कि समाज और परिवार के नकारात्मक 'विष' को सोख लेना ही नेतृत्व और बड़प्पन है।ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य: लिंगपुराण के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव एक अंतहीन प्रकाश स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए थे। ब्रह्मा (सृजन) और विष्णु (पालन) ने जब इस स्तंभ का छोर ढूंढने का प्रयास किया, तो वे विफल रहे। यह शिव की उस सत्ता को दर्शाता है जिसका न प्रारंभ है और न अंत—वे कालातीत हैं।
युगों की यात्रा: सतयुग से कलियुग तक शिव भक्ति का विकास में समय के पहिए ने शिव भक्ति के स्वरूप को भी बदला है। महाशिवरात्रि हर युग में एक नए अर्थ के साथ प्रकट हुई है: सतयुग (सत्य का काल): इस युग में मनुष्य की चेतना अत्यंत निर्मल थी। लोग मूर्ति पूजा के बजाय 'मानस पूजा' करते थे। महाशिवरात्रि उस काल में केवल मौन और अखंड समाधि का पर्व था। ऋषि-मुनि हज़ारों वर्षों तक एक ही मुद्रा में बैठकर शिव के निराकार स्वरूप का ध्यान करते थे।
त्रेतायुग (मर्यादा का काल): भगवान राम के इस युग में भक्ति ने एक आकार लिया। रामेश्वरम में राम द्वारा शिवलिंग की स्थापना इसका जीवंत उदाहरण है। इस काल में महाशिवरात्रि पर यज्ञों और अनुष्ठानों की प्रधानता बढ़ी। यह शक्ति संचय का पर्व बन गया। द्वापरयुग (कर्म का काल): श्रीकृष्ण के समय में 'हरि' (विष्णु) और 'हर' (शिव) के समन्वय पर बल दिया गया। महाभारत में अर्जुन द्वारा किरात रूपी शिव से पाशुपत अस्त्र प्राप्त करना यह दर्शाता है कि यह रात कर्म की सिद्धि के लिए कितनी महत्वपूर्ण थी। कलियुग (विश्वास का काल): वर्तमान युग 'कलि' का है, जहाँ जीवन की जटिलताएँ बढ़ गई हैं। यहाँ शिव 'भोलेनाथ' हैं। महाशिवरात्रि इस युग में 'सुगम भक्ति' का मार्ग है। केवल नाम-स्मरण और उपवास से ही शिव प्रसन्न हो जाते हैं। यह युग सामूहिक उत्सवों, जागरण और कीर्तनों का है।
आधुनिक काल: विज्ञान और अध्यात्म का महासंगम आज की 21वीं सदी में महाशिवरात्रि को 'ग्लोबल फेस्टिवल' का दर्जा मिल चुका है। आधुनिक विज्ञान अब उन रहस्यों की पुष्टि कर रहा है जो हज़ारों साल पहले ऋषियों ने कहे थे।
प्राकृतिक ऊर्जा का उभार (Natural Upsurge): खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार, इस रात पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध इस स्थिति में होता है कि मानव शरीर में ऊर्जा का प्रवाह स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर (Upward) बढ़ता है।
रीढ़ की हड्डी का विज्ञान: आधुनिक शोध बताते हैं कि महाशिवरात्रि की रात यदि व्यक्ति अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठता है, तो उसका स्नायु तंत्र (Nervous System) ब्रह्मांडीय आवृत्तियों के साथ मेल बिठा लेता है। यह ध्यान मानसिक शांति और बुद्धि के विकास के लिए एक 'बायोलॉजिकल टॉनिक' की तरह काम करता है।
डिजिटल भक्ति और वैश्विक पहुंच: आज न्यूयॉर्क से लेकर नई दिल्ली तक, महाशिवरात्रि का लाइव प्रसारण करोड़ों युवाओं को योग और ध्यान की ओर आकर्षित कर रहा है। 'ईशा योग केंद्र' जैसे स्थानों पर होने वाले संगीत और ध्यान के उत्सवों ने शिव को आधुनिक पीढ़ी का 'आइकन' बना दिया है। महामृत्युंजय मंत्र: कोशिकाओं का पुनर्जन्म
महाशिवरात्रि पर इस मंत्र का जाप समाचार पत्रों के पाठकों के लिए हमेशा जिज्ञासा का विषय रहा है। मार्कण्डेय ऋषि द्वारा रचित यह मंत्र—ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...—केवल एक धार्मिक श्लोक नहीं है। ध्वनि चिकित्सा (Sound Therapy) के विशेषज्ञों का मानना है कि इसके अक्षरों से निकलने वाली ध्वनि कोशिका के भीतर के कंपन को व्यवस्थित करती है। यह मंत्र 'मृत्यु' के भय से मुक्त कर 'अमृत' यानी मोक्ष की ओर ले जाता है।
12 ज्योतिर्लिंग: भारत की सांस्कृतिक एकता के सूत्र भारत के मानचित्र पर उत्तर में केदारनाथ से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक फैले 12 ज्योतिर्लिंग केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि ये देश को एक सूत्र में पिरोने वाली भौगोलिक कड़ियाँ हैं। उज्जैन के महाकाल (दक्षिणमुखी लिंग) समय के अधिष्ठाता हैं। काशी के विश्वनाथ ज्ञान की राजधानी हैं।
सोमनाथ पुनरुत्थान के प्रतीक हैं। महाशिवरात्रि पर इन 12 केंद्रों की सामूहिक ऊर्जा पूरे देश के वातावरण को सकारात्मक बनाती है।
शिकारी और हिरणी की कथा: करुणा ही सच्ची पूजा - एक रोचक प्रसंग जो इस पर्व की आत्मा है, वह है शिकारी और हिरणी की कथा। शिकारी का अनजाने में किया गया बेलपत्र अर्पण और हिरणी के प्रति उसकी अचानक जागी करुणा यह सिद्ध करती है कि महादेव को भव्य मंदिर या सोने के आभूषण नहीं चाहिए। वे तो 'भाव' के भूखे हैं। यदि आपके मन में जीव मात्र के प्रति दया है, तो वही आपकी सबसे बड़ी शिव पूजा है। यह हिस्सा हक मार्गदर्शन प्रदान करता है: सुबह जल्दी स्नान कर संकल्प लें, जलाभिषेक करें, मौन रहें और रात्रि में जागरण करें। इस दिन किसी की निंदा न करें, तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस) से बचें और ध्यान रहे कि शिवलिंग पर कभी 'केतकी' का फूल या 'तुलसी' न चढ़ाए। महाशिवरात्रि केवल मंदिर जाने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर झांकने का दिन है। शिव का अर्थ है 'वह जो नहीं है' (That which is not)। जैसे शून्य से सब कुछ शुरू होता है और शून्य में ही खत्म होता है, वैसे ही शिव ही इस सृष्टि का स्रोत और गंतव्य हैं। आज के आपाधापी भरे जीवन में, महाशिवरात्रि हमें रुकने, सांस लेने और अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका देती है। यह रात हमें विश्वास दिलाती है कि हमारे भीतर का अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, ज्ञान की एक छोटी सी लौ (ज्योतिर्लिंग) उसे मिटाने के लिए पर्याप्त है। महाशिवरात्रि एक वार्षिक अनुस्मारक है कि हम केवल मिट्टी के पुतले नहीं हैं, बल्कि उस ब्रह्मांडीय चेतना का हिस्सा हैं जिसे हम 'शिव' कहते हैं। आइए, इस रात को केवल जागते हुए नहीं, बल्कि 'जागृत' होकर बिताएं।
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