मानव श्रेष्ठ प्राणी
वीणा सम वाणी हो ,प्राणी हेतु पाणि हो ,
श्वान् सम घ्राणि हो ,
प्राण से प्रिय प्राणी हो ।
दीनों हेतु दानी हो ,
हीन को न हानी हो ,
चाहे राजा रानी हो
मन न मनमानी हो ।
बुढ़ापे में जवानी हो ,
तन मन में पानी हो ,
मन हो स्थिर गंभीर ,
मन नहीं तूफानी हो ।
परतंत्र न परित्राणी हो ,
श्वान सा तू घ्राणी हो ,
जीवन नहीं द्राणी हो ,
मानव श्रेष्ठ प्राणी हो ।
मानव का मान रख ,
मान का अरमान रख ,
मानवता ध्यान रख ,
मानव हो भान रख ।
शब्दार्थ : द्राणी = सोया हुआ , पाणि = हाथ , घ्राणि = सूॅंघनेवाला
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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