मानव उत्पत्ति एवं वर्ण जाति व्यवस्था
जय प्रकाश कुवंर
विश्व स्तर पर सात धर्मों की सबसे ज्यादा मान्यता है। इसमें भी मुख्यतः तीन धर्म सबसे ज्यादा प्रचलित हैं और इन धर्मों के सबसे ज्यादा लोग विश्व में रहते हैं। ये तीन धर्म हैं, ईसाई धर्म, इस्लाम और हिन्दू धर्म।
इन मुख्य तीन धर्मों में पृथ्वी पर मानव उत्पत्ति को लेकर अलग अलग मान्यताएँ हैं।
ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर ने मिट्टी से प्रथम पुरुष आदम को बनाया और उसमें अपनी सांस फूंककर जीवन दिया। फिर आदम की पसली से प्रथम महिला हव्वा की रचना हुई। इन दोनों से ही पृथ्वी पर मानव जाति का विकास हुआ।
इस्लाम धर्म में भी यह माना जाता है कि ईश्वर यानि अल्लाह ने मिट्टी से आदम को बनाया और उन्हें अपना खलीफा या प्रतिनिधि नियुक्त किया। फिर उनकी पत्नी हव्वा से ही पूरी मानव जाति का विस्तार हुआ।
हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने पुरुष मनु और स्त्री शतरूपा की रचना की, जिन्हें पृथ्वी के प्रथम मानव के रूप में जाना जाता है। इन दोनों पुरुष स्त्री से ही मानव जाति का विकास हुआ।
मानव जीवन की उत्पत्ति के बारे में इन सारे धार्मिक मान्यताओं के अलावा एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है, जिसके अनुसार पृथ्वी पर सबसे पहले मानव का विकास अफ्रीका महाद्वीप में वानरों के रूप में हुआ। फिर वे दो पैरों पर खड़े होकर चलने वाले मानव के रूप में परिवर्तित हुए। इस समूह में होमो हैबिलिस को वैज्ञानिक पहला मानव मानते हैं, क्योंकि वह दो पैरों पर चलने वाला पहला मानव था।
इन सभी मान्यताओं एवं सिद्धांतों के अनुसार एक बार पृथ्वी पर मानव उत्पत्ति के बाद इनकी आबादी बढ़ी और सामाजिक संरचना की जरूरत हुई। इस संरचना में मानव का विभाजन उनके कर्म और गुण के अनुसार उनके द्वारा किया गया। इस प्रकार वर्ण व्यवस्था की नींव पड़ी, जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। फिर मनुस्मृति जैसे प्राचीन स्मृति ग्रंथों ने इन सामाजिक वर्गों को धार्मिक वैधता दी।
वैसे देखा जाए तो वर्ण व्यवस्था के बाद जाति व्यवस्था किसी एक आदमी ने एक दिन में नहीं किया। यह सदियों में विकसित हुई एक जातीय सामाजिक संरचना है। ब्रिटिश प्रशासन के दर्मियान भारत में प्रशासनिक सुविधा के लिए जाति आधारित वर्गीकरण को और भी अधिक बढ़ावा मिला।
आज भारतवर्ष में स्थिति यह है कि जो जाति व्यवस्था मानव द्वारा कार्यों के बटवारे के लिए और सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए शुरू में किया गया, वही अब जन्म आधारित पहचान बन गया है।
इतना ही नहीं, आज भारतवर्ष में सारी राजनीति जाति के इर्दगिर्द घुम रही है। यह जातीय राजनीति सत्ता हासिल करने का साधन बन गया है। जातीय राजनीति आज कल सामाजिक तनाव और राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। यह सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा दे रही है और देश के विकास के मुख्य मुद्दों को पीछे छोड़ते जा रही है।
मोटे तौर पर देखा जाए तो भारतीय जातियों को अनेक टुकड़ों में बांटा गया है, यथा अगड़ी जातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति। इसके अलावा भारतीय ईसाई और मुसलमान भी भारत में जातियों के रूप में कार्यरत हैं। इस विभाजन से प्रत्येक जाति समूह के हित परस्पर विरोधी होते जा रहे हैं। आये दिन इस विरोध का नजारा देश को देखना पड़ रहा है।
विगत वर्षों में जाति आधारित भारतीय समाज बनाने के लिए प्रयास हुए लेकिन सफलता नहीं मिली। इस छवि को अभी भी सुधारा जा सकता है लेकिन भारतीय राजनीतिक गलियारा इसे किसी न किसी रूप में बनाया रखना चाहता है और अपने राजनीतिक फायदा के लिए बढ़ावा दिये जा रहा है। इससे सही ढंग से निबटा नहीं गया तो यह भविष्य में देश के विखंडन का कारण बन सकता है।
मेरा मानना है कि इस जातिगत राजनीति को देश में बढ़ावा देना उचित नहीं है। आज देश को आजाद हुए लगभग उन्नासी साल हो चुके हैं। इस अवधि में जातिगत राजनीति और जातीय आरक्षण का लाभ लेने वालों ने अपने स्तर को निश्चित रूप से उपर उठाया है। बाकिर अमीर और गरीब लोग तो हर जाति विरादरी में अभी भी हैं। अब जातिगत राजनीति से उपर उठकर राजनीतिज्ञों के लिए जरूरी है देश के विकास की राजनीति करना तथा देश को विखंडन से बचाने की कोशिश करना।
हम सब ने मानव जन्म पाया है और भारतीय नागरिक होने का हमें गर्व है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि इस जातीय प्रपंच से उपर उठकर हम सब भारत के विकास की प्रक्रिया में सहभागी बने। वर्ण और जाति का चोला पहनकर खुलेआम समाज में राजनीति करना किसी के लिए और किसी भी हद में मुनासिब नहीं है।
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