प्रदर्स कला लेखन: क्षणभंगुरता को शब्द देने की साधना
सत्येन्द्र कुमार पाठक
दृश्य से शब्द तक का सफर का कला जगत में कुछ कृतियाँ पत्थर पर उकेरी जाती हैं, तो कुछ कैनवस पर रंगों से सजती हैं। लेकिन एक ऐसी कला भी है जो केवल 'क्षण' में जीवित रहती है—जैसे नर्तक की थिरकन, गायक की तान या रंगमंच के अभिनेता का संवाद। इसे 'प्रदर्शन कला' (Performance Art) कहा जाता है। इस कला का स्वरूप 'क्षणभंगुर' (Ephemeral) है; मंच की लाइटें बुझते ही यह कला विलीन हो जाती है। ऐसे में 'प्रदर्शन कला लेखन' वह विधा है जो इस अदृश्य होती कला को शब्दों के माध्यम से अमरत्व प्रदान करती है। यह केवल समीक्षा नहीं, बल्कि उस कलात्मक अनुभव का दस्तावेजीकरण, विश्लेषण और सामाजिक-सांस्कृतिक मीमांसा है। परंपरा से आधुनिकता तक प्रदर्शन कला लेखन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि स्वयं कला। हालांकि, इसे एक स्वतंत्र लेखन विधा के रूप में पहचान मिलने में सदियों का समय लगा है। भारत के प्राचीन और मध्यकालीन संदर्भ में देखें तो भरत मुनि का 'नाट्यशास्त्र' प्रदर्शन कला लेखन का आदि-स्रोत है। यह न केवल प्रदर्शन की तकनीक बताता है, बल्कि दर्शक (सृदय) और कलाकार के बीच के रसात्मक संबंध की व्याख्या भी करता है। मध्यकाल में दरबारी इतिहासकारों ने नृत्य और संगीत के आयोजनों का वर्णन किया, लेकिन वह लेखन अक्सर प्रशंसात्मक अधिक और विश्लेषणात्मक कम था।
आधुनिक युग और कथेतर गद्य का उदय 19वीं सदी के उत्तरार्ध और 20वीं सदी के आरंभ में, जब प्रेस और पत्रिकाओं का विस्तार हुआ, 'कला समीक्षा' (Art Criticism) ने जन्म लिया। भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान पारंपरिक कलाओं को पुनर्जीवित करने के प्रयासों के साथ-साथ उनके बारे में लिखने की पद्धति भी बदली। कैलेंडर कला से लेकर पारसी थिएटर तक, लेखकों ने इन कला रूपों के 'इतिहास और विकास-यात्रा' पर निबंध लिखना शुरू किया। यह वह दौर था जब कला-लेखन 'कथेतर गद्य' (Non-fiction Prose) की एक विशिष्ट शाखा के रूप में उभरा।
'अदृश्यता की कला' का दस्तावेजीकरण प्रदर्शन कला लेखन की सबसे बड़ी चुनौती इसकी प्रकृति है। चित्रकला को आप संग्रहालय में जाकर बार-बार देख सकते हैं, लेकिन एक 'लाइव एक्शन' दोबारा वैसा ही नहीं हो सकता।
क्षणभंगुरता और अमरत्व, प्रदर्शन कला "अदृश्यता की कला" है। यह उन घटनाओं की प्रतिक्रिया है जिन्हें संस्थाएँ अक्सर अनदेखा कर देती हैं। लेखक का कार्य यहाँ एक 'साक्षी' (Witness) का होता है। वह अपनी स्मृतियों और सूक्ष्म टिप्पणियों के आधार पर उस घटना को कागज पर उतारता है। मुख्य बिंदु में एक प्रभावी प्रदर्शन कला आलेख में निम्नलिखित तत्वों का समावेश होता है: दृश्य और श्रव्य चित्रण: कलाकार के शरीर की गति, मंच की सज्जा, प्रकाश का कोण और ध्वनि का उतार-चढ़ाव। तकनीकी व्याख्या: कलाकार की 'मुद्रा', 'ताल' या 'अभिनय' की बारीकियों का अकादमिक विश्लेषण। कलाकार का भाव-संसार: कलाकार की मानसिक अवस्था और उसके शारीरिक श्रम का चित्रण है।
प्रदर्स कला लेखन केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं है; यह एक गहरा सामाजिक कार्य है। यह विधा समाज के हाशिए पर पड़े मुद्दों को केंद्र में लाती है। सामाजिक क्रिया के रूप में कला प्रदर्शन कलाएँ अक्सर 'सहभागी' (Participatory) प्रकृति की होती हैं। जब एक लेखक किसी नुक्कड़ नाटक या सामाजिक विरोध प्रदर्शन (Protest Art) पर लिखता है, तो वह केवल एक घटना का वर्णन नहीं कर रहा होता, बल्कि वह उस 'सामूहिक कार्रवाई' का हिस्सा बन जाता है। यह लेखन संवाद पैदा करता है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है।
आधुनिक कला लेखन में शरीर (Body) को एक 'टेक्स्ट' की तरह पढ़ा जाता है। नारीवादी विमर्श या दलित चेतना से जुड़े प्रदर्शनों का विश्लेषण करते समय लेखक यह देखता है कि कलाकार का शरीर सामाजिक बंधनों को कैसे तोड़ रहा है। यह कला और समाज के बीच के 'पावर डायनेमिक्स' को उजागर करता है।
सांस्कृतिक महत्व में : परंपरा का संरक्षण और नवाचार सांस्कृतिक रूप से यह लेखन परंपरा और आधुनिकता के बीच एक पुल का काम करता है।
लोक कला और आधुनिकता लेखन के माध्यम से हम मौड लुईस जैसे कलाकारों की कहानियों को जानते हैं, जिन्होंने शारीरिक अक्षमता के बावजूद लोक कला को नई ऊंचाइयां दीं। इसी तरह, भारत की 'कैलेंडर कला' या 'बाजारू कला' को भी आज लेखन के माध्यम से कला दीर्घाओं में स्थान मिला है। यह लेखन बताता है कि कैसे एक साधारण कला रूप सामाजिक हित और पहचान से गहराई से जुड़ा होता है। अकादमिक और शोधपरक दृष्टिकोण में आजकल कला विभागों में 'वरिष्ठ थीसिस प्रदर्शनी' (STE) और चिंतनशील निबंधों का चलन बढ़ा है। छात्र अपनी कलाकृतियों के साथ एक लघु निबंध लिखते हैं जो उनके शोध और सृजन की परिणति होता है। यह प्रवृत्ति कला लेखन को अधिक 'शोधपरक' और 'तार्किक' बनाती है।. कला लेखन की प्रक्रिया: एक मार्गदर्शिका एक सफल कला लेखक बनने के लिए केवल भाषा का ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि 'दृश्य साक्षरता' (Visual Literacy) अनिवार्य है। गहन अवलोकन: जैसा कि शोधपत्र लिखने के निर्देशों में कहा जाता है, कलाकार की प्रस्तुति को देखते समय हर छोटी टिप्पणी को तुरंत दर्ज करना चाहिए। ऐतिहासिक क्रम का बोध: कला का वर्तमान समझने के लिए उसके अतीत को जानना जरूरी है। उस कला शैली की विकास-यात्रा का ज्ञान आलेख को वजन देता है। रचनात्मकता और कल्पना: कला लेखन स्वयं में एक रचनात्मक प्रक्रिया है। कभी-कभी यह एक कविता, डायरी या पत्र के रूप में भी हो सकता है, जैसा कि 'आर्ट यूके' जैसे मंच प्रोत्साहित करते हैं।
आज के दौर में डिजिटल मीडिया ने कला लेखन को 'लोकप्रिय' (Popular) बनाया है, लेकिन साथ ही चुनौतियां भी पेश की हैं। सोशल मीडिया पर 280 शब्दों में किसी बड़े ओपेरा या शास्त्रीय नृत्य की समीक्षा करना मुश्किल है।
'नो-मैड' दुनिया और कला आज की दुनिया 'नो-मैड' (Nomadic) है, जहाँ सूचनाएं तेजी से बदलती हैं। ऐसे में प्रदर्शन कला लेखन ही वह माध्यम है जो हमारी सांस्कृतिक जड़ों को थामे रखता है। यह हमें याद दिलाता है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। प्रदर्शन कला लेखन एक ऐसी खिड़की है जिससे हम उस कला को देख सकते हैं जो अब अस्तित्व में नहीं है। यह 'समय' और 'स्थान' (Time and Space) को शब्दों में बांधने का एक साहसी प्रयास है। यह कलाकार की तपस्या, दर्शक की अनुभूति और समाज की वास्तविकता को एक सूत्र में पिरोता है। चाहे वह किसी प्राचीन मंदिर में होने वाला नृत्य हो या किसी आधुनिक गैलरी में होने वाला 'लाइव एक्शन', लेखक की कलम उसे अमर बना देती है। कला का यह स्वरूप जितना सहभागी है, उसका लेखन उतना ही उत्तरदायी। अंततः, प्रदर्शन कला लेखन ही वह सेतु है जो किसी भी कलात्मक अनुभव को व्यक्तिगत स्मृति से निकालकर 'साझा इतिहास' का हिस्सा बनाता है।
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