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अपना अपना भाग्य

अपना अपना भाग्य

जय प्रकाश कुवंर
रवि किशन सुबह के सैर सपाटे के लिए निकले हुए थे। गाँव में जिंदगी बिताने वाले रवि किशन की यह दिनचर्या थी। आज गाँव के बाहर स्थित पोखर के किनारे वाले श्मशान में अनेक वर्षों के बाद किसी की लाश जलते हुए देखकर उनके पैर ठिठक गये। कारण यह था कि उनके जानते आज कल गरीब अमीर सभी लोगों की लाश उनके परिवार वालों द्वारा गंगा किनारे ले जाकर उसका अंतिम संस्कार किया जा रहा है, लेकिन यह किसका लाश है जिसे गाँव के श्मशान में जलाया जा रहा है। नजदीक जाकर पुछने पर वहाँ इकट्ठा चंद लोगों से यह पता चला कि यह गाँव के ही मंगल मिस्त्री की लाश है, जिसे उनके पुत्रों द्वारा नहीं पुछने पर उनकी वृद्ध असहाय पत्नी के अनुरोध पर वेलोग यहाँ जला रहे हैं।
मंगल मिस्त्री गाँव में ही रहकर ईंट का पक्का मकान बनाने का काम मजदूरी पर करते थे। वह एक कुशल कारीगर थे, जिन्होंने अपने जीवन काल में सैकड़ों लोगों के मिट्टी के जगह ईंट के पक्के मकान अपने गाँव तथा इर्दगिर्द के गाँवो में मजदूरी पर बनाये थे। अपने दोनों लड़कों को वे बहुत पढ़ा लिखा तो नहीं सके थे लेकिन उन्हें भी राज मिस्त्री का काम सिखाया था, जो बाद में शहर जाकर यह काम करने लगे और अंततोगत्वा दोनों ही बहुत बड़े कंस्ट्रक्शन का ठीकेदार बन गये। एक बार बड़ा आदमी बनने के बाद उन्होंने गाँव आना जाना और अपने बुढ़े माँ बाप का खोज खबर लेना भूला दिया। अब उनके लिए उनकी पत्नी, बाल बच्चे एवं सास ससुर का परिवार ही सब कुछ था।
मंगल मिस्त्री के दोनों ही बेटों ने अपने सास ससुर के मरने के बाद उनकी सद्गति के लिए उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार गंगा किनारे ले जाकर किया। इतना ही नहीं उनका क्रियाकर्म भी खूब धूमधाम से उनके द्वारा किया गया।
गाँव वालों ने रवि किशन को बताया कि वही मंगल मिस्त्री महीनों बिमारी से लड़ने के बाद अपनी बृद्ध और असहाय पत्नी को अकेला छोड़कर परसों रात को गुजर गये। इसकी खबर उनकी पत्नी द्वारा अपने दोनों ही बेटों को दी गई। लेकिन आज सुबह तक दोनों में से न तो कोई आया और न कोई संबाद दिया। अब जब लाश सड़ने लगा था और दुरगंध आने लगी थी तब मंगल मिस्त्री की पत्नी के अनुरोध पर गाँव वालों में से हम कुछ लोग उन्हें गंगा किनारे तो नहीं ले जा सके हैं, परंतु यहाँ गाँव के श्मशान में लकड़ी वगैरह इकट्ठा करके उनकी लाश को जला रहे हैं।
पूरी बात जानने के बाद रवि किशन सुबह सुबह का सैर सपाटा भुलाकर यह सोचने को विवश हो गये कि आज कल यह कैसा युग आ गया है, जहाँ एक गरीब अनपढ़ पिता मिहनत मजदूरी करके अपनें औलादों को लायक बनाता है। लेकिन वही औलाद काबिल और अमीर बन जाने के बाद अपने सास ससुर को तो पुछते हैं और उनके लिए सब कुछ करते हैं, परंतु अपने माँ बाप को न केवल भूल जाते हैं, बल्कि उनके शरीर की सद्गति के लिए उसका अंतिम संस्कार भी नहीं करते हैं।
आज सुबह के सैर को यही विराम देकर रवि किशन इन्हीं ख्यालों में अपने घर को लौट आये की वाह रे यह संसार और वाह रे अपना अपना भाग्य।

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