Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

स्वामी श्रद्धानंद,' वंदे मातरम' और राष्ट्रीय आंदोलन

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय १४

स्वामी श्रद्धानंद,' वंदे मातरम' और राष्ट्रीय आंदोलन

डॉ राकेश कुमार आर्य


सैयद अली इमाम की अध्यक्षता में १९०८ में मुस्लिम लीग ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की। १९०९ के ' मिंटो - मार्ले रिफॉर्म्स एक्ट' के अंतर्गत मुसलमानों को पृथक निर्वाचक मंडल प्राप्त हो गए थे। इस बात से आप अनुमान लगा सकते हैं कि यदि कांग्रेस अपने अधिवेशन में किसी प्रकार की मांग करती थी तो उस पर अंग्रेज सरकार वर्षों तक ' किंतु- परंतु ' करने के उपरांत भी उसे कांग्रेस को देती नहीं थी, परंतु मुस्लिम लीग ने १९०८ में पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की और अगले ही वर्ष उसे उसकी मांग पूरी कर ' मनोवांछित पुरस्कार' दे दिया गया।
ब्रिटिश सरकार से मनोवांछित पुरस्कार प्राप्त करने के उपरांत अब मुस्लिम लीग का अगला निशाना ' वंदे मातरम' था। इस पर भी उसका ब्रिटिश सरकार के साथ ' मैच फिक्सिंग ' का खेल पहले ही निश्चित हो चुका था। १९१० में जब मुस्लिम लीग का अमृतसर अधिवेशन हुआ तो इसकी अध्यक्षता सर आगा खान ने की थी। इस बैठक में अंग्रेजों को लाभ पहुंचाने के लिए मुस्लिम लीग की ओर से ' वंदे मातरम' को सांप्रदायिकता का प्रतीक माना गया था, इसलिए लीग ने इसे सांप्रदायिक घोषित कर दिया। ऐसा करके मुस्लिम लीग ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह स्वयं सांप्रदायिक है और सांप्रदायिकता की राजनीति करना ही उसका उद्देश्य है। हिंदूहितों की रक्षा को उसने सांप्रदायिक कहा, जबकि मुसलमानों के हित उसके लिए सर्वोपरि थे।


मुस्लिम लीग का दिल्लीअधिवेशन


१९०९ में ब्रिटिश सरकार द्वारा जिस प्रकार मुस्लिम लीग को अपनी ओर से दी जाने वाली सुविधाओं की पहली खेप भेंट की थी, उसने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह भविष्य में भी मुसलमानों का साथ देने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करेगी। १९१० में जब मुस्लिम लीग का अधिवेशन दिल्ली में आरंभ हुआ तो उसकी अध्यक्षता मौलाना सुल्तान मोहम्मद शाह द्वारा की गई। इसमें स्वराज्य संबंधी चर्चा को भी एजेंडा में सम्मिलित किया गया। ब्रिटिश सरकार से मिल रहे सहयोग के कारण मुस्लिम लीग के उत्साह में दिन प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही थी।
उन दिनों ब्रिटिश सरकार इस बात को लेकर भी चिंतित थी कि कांग्रेस के मंचों पर आर्य समाज के राष्ट्रवादी नेताओं का आना-जाना लगा रहता था। इसके अतिरिक्त कई आर्य समाजी नेता कांग्रेस के मंचों का लगभग अपहरण कर चुके थे। इस स्थिति को ब्रिटिश सरकार अपने अनुकूल नहीं समझती थी। स्वामी श्रद्धानंद जी का नाम इस विषय में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जिनके कारण अनेक आर्य समाजी नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस के साथ मिलकर काम कर रहे थे।
आर्य समाज के नेता नहीं चाहते थे कि कांग्रेस से अलग कोई नया राजनीतिक दल बनाया जाए और उसके आधार पर हिंदू समाज की एकता को कमजोर किया जाए। उनकी सोच थी कि कांग्रेस का ही राष्ट्रीयकरण कर लिया जाए। इस प्रकार कांग्रेस की एक बाजू को पकड़कर ब्रिटिश सरकार खींच रही थी, तो दूसरी बाजू को पकड़कर आर्य समाज खींच रहा था। ब्रिटिश सरकार उसे ' राजभक्त' बनाए रखना चाहती थी और आर्य समाज उसे ' राष्ट्रभक्त' बनाना चाहता था। ऐसी स्थिति में कांग्रेस ने दोगला मार्ग अपनाया।
जब ब्रिटिश सरकार ने देखा कि कांग्रेस के मंचों पर अधिकांश आर्य नेता उपस्थित हो जाते हैं तो उसकी चिंता और भी अधिक बढ़ गई। उसे इस बात का डर सताने लगा कि कांग्रेस का यदि राष्ट्रीयकरण हो गया तो वह आर्य समाज के रंग में रंग रंगकर उसके समक्ष एक बड़ी चुनौती उपस्थित कर सकती है। इसलिए उसने मुस्लिम लीग को तेजी से आगे बढ़ाना आरंभ किया।


स्वामी श्रद्धानंद बन गए एक चुनौती


भारत के राजनीतिक गगनमंडल पर जो भी कुछ घटित हो रहा था, उस पर स्वामी श्रद्धानंद जी की पैनी दृष्टि थी। उनका राष्ट्रवाद सभी मुसलमानों के लिए अखरने वाला बन गया था। अंग्रेज भी उन्हें नहीं चाहते थे। स्वामी जी के राष्ट्रवाद के सामने कांग्रेस का राष्ट्रवाद पानी भरता था। महात्मा गांधी सहित किसी भी नेता का यह साहस नहीं होता था कि वह स्वामी जी की बात को काट दें। स्वामी श्रद्धानंद जी बहुत ही स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी थे। वे गांधीजी का सम्मान तो करते थे परंतु उनके अंधभक्त नहीं थे। यदि गांधी जी कहीं भी किसी भी प्रकार का तुष्टिकरण करते हुए दिखाई देते थे या दोगली बात करते हुए दिखाई देते थे तो स्वामी जी उनको निसंकोच डांट दिया करते थे।
स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज गांधी जी की खिलाफत नीति के विरुद्ध थे। गांधी जी जिस प्रकार ' वंदे मातरम' के सामने आत्मसमर्पण करते जा रहे थे , उसे भी स्वामी जी उचित नहीं मानते थे। स्वामी श्रद्धानंद जी हिंदूहित में ही राष्ट्रहित देखते थे। इसलिए उन्होंने १९२४ में ' हिंदू संगठन' नामक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया था कि हिंदू को आज भी संगठित रहने का प्रयास करना होगा अन्यथा पिछले १२०० वर्षों में जिस प्रकार हिंदू का विनाश किया गया है, उसके लिए आज के हिंदू समाज को भी तैयार रहना होगा। स्वामी जी ने हिंदू समाज को सचेत किया कि तुम्हें मिटाने का पिछले १२०० वर्षों में जिस प्रकार प्रयास किया गया है ,वह आज भी जारी है। इस प्रकार ' वंदे मातरम' की विरोधी मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार की कुटिल नीतियों को स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने गांधी जी और उनके शिष्य नेहरू जी से पहले समझ लिया।
स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने उपस्थित चुनौतियों का सामना करने के लिए चुनौती देने वाले मुस्लिमों और ब्रिटिश सरकार के लिए अपने आप को ही एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने चुनौती के सामने अपनी छाती खोल दी और पूरा हिंदू समाज अपने पीछे ले लिया। इस प्रकार पूरे हिंदू समाज के एक सुरक्षा कवच के रूप में स्वामी श्रद्धानंद जी प्रकट हुए। उन्होंने हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ाने और मुस्लिम सांप्रदायिकता का देश से अंत करने के लिए ' शुद्धि अभियान ' पर विशेष बल दिया।


स्वामी जी ने हिंदुओं को समझाया...


स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने देश के हिंदू समाज को यह बताने का सफल प्रयास किया कि यदि अपना और अपने देश का सुखद भविष्य चाहते हो तो जितने हिंदू मुस्लिम धर्म में दीक्षित हुए हैं, उन सब की घर वापसी सुनिश्चित करो। उन्होंने सोए हुए हिंदू समाज का स्पष्ट शब्दों में आह्वान किया कि " यदि अभी नहीं तो कभी नहीं " की नीति पर काम करना होगा अर्थात यदि अब नहीं जागे तो फिर कभी नहीं जाग पाओगे। स्वामी जी महाराज के इस प्रकार के आह्वान से मुस्लिम जगत में खलबली मच गई। इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार के भी कान खड़े हो गए। क्योंकि जिस प्रकार ब्रिटिश सरकार मुस्लिम लीग के साथ मिलकर हिंदू समाज का अहित करने पर तुली हुई थी और गांधी जी व उनकी कांग्रेस जिस प्रकार मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार के गठबंधन को अपना मौन समर्थन देकर आंखें बंद किए बैठे थे, स्वामी जी महाराज के इस प्रकार के क्रांतिकारी आह्वान से उस सब की पोल खुल जानी थी।
गांधी जी को मुस्लिम नेता और विशेष रूप से शौकत अली और रहमत अली नाम के अली बंधु कान में फूंक मार रहे थे कि देश में इस समय सांप्रदायिक दंगों का जिस प्रकार प्रचलन बढ़ा है, उसके पीछे आर्य समाज और स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन विशेष रूप से उत्तरदाई है।
गांधी जी उन दिनों जेल से रिहा होकर आए थे। अली बंधुओं ने उनसे जो कुछ कहा उस पर उन्होंने यथावत विश्वास कर लिया। इतना ही नहीं, अपनी ओर से एक ऐसा दुर्भावना पूर्ण वक्तव्य भी जारी कर दिया जिसमें देश की तत्कालीन विस्फोटक परिस्थितियों के लिए आर्य समाज और स्वामी श्रद्धानंद जी को दोषी बता दिया गया। गांधी जी के इस प्रकार के वक्तव्य से प्रेरित होकर एक मुस्लिम युवक ने स्वामी श्रद्धानंद जी को मारने की योजना पर काम करना आरंभ कर दिया।
' वंदे मातरम' विरोधी गैंग गांधी जी के संरक्षण में काम करने लगा। उसे तुष्टिकरण की घुट्टी गांधी जी से निरंतर मिलती रही। यही कारण था कि वह गैंग हर उस कार्य में टांग अड़ाने लगा जो राष्ट्रवादी था या जिससे हमारा राष्ट्रवाद प्रबल हो सकता था। उसकी यह सोच हो गई कि जैसे भी हो भारत के राष्ट्रवाद को लंगड़ा किया जाए। क्योंकि वह गैंग जानता था कि अपनी मनचाही वस्तु उसे तभी मिल सकती है, जब राष्ट्रवाद को लूला ,लंगड़ा ,अपंग बना दिया जाए।
' वंदे मातरम' के विरोधी हर उस व्यक्ति को हमें इसी गैंग का एक सदस्य मानना चाहिए जिसने भारत के राष्ट्रवाद को लूला, लंगड़ा और अपंग बनाने का या तो अतीत में काम किया है या वर्तमान में कर रहा है। यह एक सोचा समझा गैंग है। इसके पीछे एक भारत विरोधी लॉबी काम करती रही है। इसके सूत्र विदेश में भी फैले हुए हैं। इस गैंग को आप केवल अतीत कहकर भुला नहीं सकते। यह अतीत की कब्र नहीं है अपितु अतीत की वर्तमान में दीखने वाली एक काली छाया है।

हिंदू समाज के शुभचिंतक श्रद्धानंदजी


ब्रिटिश सरकार की गोद में खेलने वाले ' वंदे मातरम' विरोधी लोगों को स्वामी श्रद्धानंद जी ने मुस्लिम आक्रांताओं के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित कर लोगों के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने लोगों को बताया कि पिछले बारह सौ वर्षों में जिन लोगों ने भारत के हिंदुओं का बलात धर्म परिवर्तन किया है वही आज किसी दूसरे रूप में तैयार दिखाई दे रहे हैं।
स्वामी जी ने बताया कि तत्कालीन कई हिंदू शासक मुस्लिम समाज की उन गतिविधियों की ओर से आंखें मूंद कर बैठे रहे, जिनसे वे भारत के हिंदू समाज की संख्या को कम करने का प्रयास कर रहे थे। उन हिंदू राजाओं की मूर्खता आज के हिंदू समाज को भुगतनी पड़ रही है। यदि आज भी हम मुस्लिम समाज की ' वंदे मातरम' का विरोध करने जैसी चल रही गतिविधियों की ओर से आंखें मूंद कर बैठ गए तो आने वाली पीढ़ियों को हमारे इस देश विरोधी आचरण का परिणाम भुगतना पड़ेगा। अतीत के अपने इस प्रकार के आचरण से हमें शिक्षा लेनी चाहिए और वर्तमान का सामना करना चाहिए।


ईसाई पादरी और भारतीय समाज


स्वामी जी महाराज ने सूफियों की वास्तविकता को भी लोगों के सामने लाकर रख दिया और उन्हें बताया कि उनके तथाकथित चमत्कार कुछ भी नहीं हैं। जिस प्रकार सूफियों ने हिंदू समाज का विनाश करने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी है, उसी प्रकार ईसाई पादरियों के द्वारा भी हिंदू समाज का विनाश करने में किसी प्रकार से कमी नहीं छोड़ी गई है। वह निरंतर अपने इसी कार्य में आज भी लगे हुए हैं।
हिंदू संगठन की आवश्यकता पर बल देते हुए स्वामी जी महाराज ने लोगों को बताने का प्रयास किया कि छुआछूत जैसी बीमारी को समय रहते हमें समाप्त करना चाहिए। जिस प्रकार समाज में जातियों के आधार पर ऊंचनीच का वातावरण बनाया गया है , वह राष्ट्रहित में कदापि उचित नहीं है। स्वामी जी ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान सरकार सांप्रदायिक दंगों के समय पक्षपाती दृष्टिकोण अपनाती है। जिससे हिंदू समाज का अहित होता है। ऐसी स्थिति में हिंदू समाज के सामने नेतृत्व का संकट आता है। वर्तमान समय में हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और अपने बिछुड़े हुए भाइयों को गले लगाने की उदारता भी दिखानी चाहिए । इसके साथ ही अपना राष्ट्रीय संगठन भी स्थापित करना चाहिए।
स्वामी जी ने जिस ' हिंदू संगठन ' की आवश्यकता से लगभग १०० वर्ष पूर्व व्यक्त की थी, वह आज भी उतनी ही आवश्यक अनुभव हो रही है। हिंदू समाज आज भी नेतृत्वविहीन की स्थिति में है। ' वंदे मातरम' विरोधी गैंग जितना अब से १०० वर्ष पूर्व सक्रिय था, उतना ही आज भी सक्रिय है। वह उस समय भी हिंदू समाज की आंखों में धूल झोंक रहा था और आज भी धूल झोंकने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ रहा है। हिंदुओं के बीच से ही निकल कर यदि कुछ लोग उस समय ' वंदे मातरम' विरोधी गैंग का साथ दे रहे थे तो आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ' वंदे मातरम' विरोधी गैंग का हिंदू होने के उपरांत भी साथ दे रहे हैं।


' वंदे मातरम' की व्याख्या से अनभिज्ञ था मुस्लिम समाज


यद्यपि यह बात सही है कि मुस्लिम समाज प्रारंभ से ही गैर मुस्लिम लोगों के प्रति असहिष्णु रहा है, परंतु उसे कई बार उसके मुल्ला मौलवियों ने भारत की धार्मिक परंपराओं, रीति-रिवाजों के बारे में वास्तविक जानकारी भी नहीं दी।
यदि ' वंदे मातरम' की बात करें तो इसके बारे में भी आम मुसलमान को कभी सही जानकारी नहीं दी गई। उसे ऊपरी तौर पर यह बताया गया कि इस गीत के अमुक - अमुक स्थल अथवा शब्द इस्लाम विरोधी हैं और इसलिए ' वंदे मातरम' को इस्लाम में आस्था रखने वाले लोगों को नहीं गाना चाहिए।
सैयद अली इमाम ने मुस्लिम लीग के अधिवेशन में इसीलिए ' वंदे मातरम' को सांप्रदायिक कहकर इसके विरुद्ध मुसलमानों को भड़काने का काम किया था। इसके पीछे वास्तविक कारण पर यदि हम विचार करें तो बात वही थी कि पीछे से मुस्लिम लीग और मुस्लिम नेताओं का ब्रिटिश सरकार से एक गठबंधन था कि जैसे भी हो भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन की हवा निकालनी है। इसलिए सैयद अली इमाम जैसे लोग ब्रिटिश सरकार को लाभ पहुंचाने के लिए और भारतीय राष्ट्र को खंड-खंड करने के लिए इस प्रकार की बातें कर रहे थे। इन लोगों ने मुसलमानों को यह कहकर भड़काने का काम किया कि मुसलमान अल्लाह के अतिरिक्त अन्य किसी के सामने शीश नहीं झुकाते। भारत माता चाहे जो हो, वह अल्लाह की बराबरी कभी नहीं कर सकती।
इस प्रकार की विकृत मानसिकता ने भारतीय राष्ट्रवाद को आहत किया और जाने अनजाने देश को विभाजन की ओर बढ़ने के लिए विवश कर दिया।
डॉ नित्यानंद जी " मुस्लिम तुष्टिकरण " नामक अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या ६१ पर हमें बताते हैं कि १९२१ के विजयवाड़ा अधिवेशन के अवसर पर तिरंगे ध्वज ( लाल ,हरा, सफेद ) का जन्म हुआ और सभी कांग्रेस अधिवेशनों के अवसर पर यह फहराया जाता रहा। १९३१ के कराची अधिवेशन के अवसर पर ध्वज के निर्धारण के लिए सात व्यक्तियों ( पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, मास्टर तारा सिंह, डीपी कालेलकर, डॉ एनएस हर्डीकर और डॉक्टर पट्टाभिसीतारमैया ) की समिति नियुक्त की गई । जिसने सुझाव दिया कि केसरिया ध्वज ही भारत का प्राचीन ऐतिहासिक ध्वज होने के कारण राष्ट्रीय ध्वज होने की पात्रता रखता है। इस समिति ने केसरिया ध्वज के धुर बाएं किनारे पर कत्थई रंग का चरखा अंकित करने का सुझाव भी दिया था। परंतु गांधी जी ने मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए हरी व सफेद पट्टियां जोड़ दीं।"


(.लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ