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मनुस्मृति के अध्यायों का विषय

मनुस्मृति के अध्यायों का विषय

डॉ राकेश कुमार आर्य

मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय में संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय पर विचार किया गया है। महर्षि मनु के द्वारा स्पष्ट किया गया है कि संस्कारों को करने के लाभ क्या हैं ? इसके अतिरिक्त 'संस्कारों' से बुरे संस्कारों का निवारण
, वेदाध्ययन, यज्ञ, व्रत आदि से ब्रह्म की प्राप्ति 16 संस्कार क्या हैं ?- इसे भी स्पष्ट किया गया है। इसी अध्याय में कुछ अन्य बिंदुओं को भी स्पष्ट किया गया है। जैसे श्रुति-स्मृति का अपमान करने वाला नास्तिक, धर्म के चार आधार रूप लक्षण, धर्म-जिज्ञासा में श्रुति परमप्रमाण और
धर्मज्ञान के पात्र, वेदोक्त सब विधान धर्म हैं,ब्रह्मावर्त देश की सीमा, मध्यदेश की सीमा, आर्यावर्त देश की सीमा , आर्यावर्त्त यज्ञिय देश है, उससे परे म्लेच्छ देश,सृष्टि एवं धर्मोत्पत्ति विषय की समाप्ति, वर्णानुसार यज्ञोपवीत वर्णानुसार दण्डविधान,भिक्षा-विधान आदि।
महर्षि मनु ने गुरु को भिक्षा-समर्पण,भोजन से पूर्व आचमन-विधान,आचमन-विधि, केशान्त संस्कार कर्म, ब्रह्मचारियों के कर्त्तव्य, उपनयन के पश्चात् ब्रह्मचारी को शिक्षा, गुरु को अभिवादन करने की विधि, वेदाध्ययन के आद्यन्त में प्रणवोच्चारण का विधान,'ओ३म्' एवं गायत्री के जप का फल ,ग्यारह इन्द्रियों की गणना,विषयों के सेवन से इच्छाओं की वृद्धि,विषय त्याग ही श्रेष्ठ है, जितेन्द्रिय की परिभाषा,सन्ध्योपासना-समय, सन्ध्योपासना का फल,वेद, अग्निहोत्र आदि में अनध्याय नहीं होता,विद्या-दान किसे न दें
कुपात्र को विद्या-दान का निषेध,विद्यादान सम्बन्धी आख्यान एवं निर्देश,बड़ों को अभिवादन से मानसिक प्रसन्नता, दीक्षित के नामोच्चारण का निषेध, परस्त्री के नामोच्चारण का निषेध
किस-किस के लिए पहले मार्ग दें, राजा और स्नातक में स्नातक अधिक मान्य,आचार्य का लक्षण, गुरु शिष्य संबंध,
पिता से वेदज्ञाता आचार्य बड़ा होता है,आचार्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मजन्म स्थिर होता है,विद्वान् बालक वयोवृद्ध से बड़ा होता है, दूसरों से द्रोह आदि का निषेध ,ब्राह्मण के लिए अपमान-सहन का निर्देश, द्विज के लिए वेदाभ्यास की अनिवार्यता,जूआ, निन्दा, स्त्रीदर्शन आदि का निषेध, पापकर्म करने वालों से भिक्षा न लें,गुरु के गुरु से गुरुतुल्य आचरण,युवती गुरुपत्नी के चरणस्पर्श का निषेध और उसमें कारण,गुरु-सेवा का फल,सन्ध्योपासन का विधान एवं विधि
जैसे विषयों को भी लिया है।

तृतीय अध्याय का विषय: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान


मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में समावर्तन ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययनकाल पर चर्चा करते हुए स्पष्ट किया गया है कि
समावर्तन संस्कार कब करें ? गुरु की आज्ञा से ही विवाह होना चाहिए। इसके अतिरिक्त विवाह में त्याज्य कुल,विवाह में त्याज्य कन्याएँ,विवाह योग्य कन्या आठ प्रकार के प्रचलित विवाह और उनकी विधि , ब्राह्म अर्थात् स्वयंवर विवाह का लक्षण, श्रेष्ठ विवाह से श्रेष्ठ सन्तान, बुरों से बुरी, ऋतुकाल-गमन सम्बन्धी विधान, आजीवन ब्रह्मचर्य पालन का फल, पुत्र और पुत्री प्राप्त्यर्थ रात्रि की पृथक्ता,पुत्र और पुत्री होने में कारण, संयमी गृहस्थ भी ब्रह्मचारी स्त्रियों का आदर करने से दिव्य लाभों की प्राप्ति, पति-पत्नी में पारस्परिक अप्रसन्नता से सन्तान न होना पञ्चमहायज्ञ, -विषय,गृहस्थाश्रम की महत्ता एवं ज्येष्ठता, सज्जनों के घर में सत्कारार्थ सदा उपलब्ध वस्तुएँ आदि को भी स्पष्ट किया गया है।

चतुर्थ अध्याय का विषय : गृहस्थान्तर्गत आजीविका एवं व्रत विषय


मनुस्मृति के चतुर्थ अध्याय में आजीविका, आयु के द्वितीय भाग में गृहस्थी बनें,गृहस्थी की परपीड़ारहित जीविका हो,
धनसंग्रह जीवनयात्रा चलाने मात्र के लिए हो, सन्तोष सुख का मूल है, असन्तोष दुःख का मूल है, स्नातक गृहस्थियों के व्रत अधर्म से धनसंग्रह न करें, इन्द्रियासक्ति-निषेध ,स्वाध्याय से कृतकृत्यता, रजस्वलागमन निषेध एवं उससे हानि, सवारी किन पशुओं से न करें या करें,दुष्टों का संग न करें, ब्राह्ममुहूर्त में जागरण, स्त्रीगमन में पर्व दिनों का त्याग करें,परस्त्री-सेवन से हानियाँ, आत्महीनता की भावना मन में न लायें, सत्य तथा प्रिय भाषण करें आदि पर प्रकाश डाला गया है।


पञ्चम अध्याय : (गृहस्थान्तर्गत-भक्ष्याभक्ष्य-देहशुद्धि-द्रव्यशुद्धि-स्त्रीधर्म विषय )


मनुस्मृति के पंचम अध्याय में महर्षि मनु ने भक्ष्याभक्ष्य,
द्विजातियों के लिए अभक्ष्य पदार्थ,निन्दित भोजन मांस हिंसामूलक होने से पाप है, गृहस्थान्तर्गत देहशुद्धि विषय,
सर्वोत्तम शुद्धि अर्थशुचिता,धर्माचरण से विविध चरित्र
दोषों की शुद्धि, शरीर, मन, आत्मा, बुद्धि की शुद्धि,पात्रों की शुद्धि का प्रकार, यज्ञ पात्रों की शुद्धि का प्रकार,गृहस्थान्तर्गत पत्नीधर्म विषय, पत्नी में कौन से गुण होने चाहिएं, स्त्री पति की सेवा करे, स्त्री पर विवाह के बाद पति का स्वामित्व,पति के अनुकूल आचरण से पत्नी अधिक सम्मान्य होती है, स्त्री की मृत्यु पर यज्ञपूर्वक अग्नि-संस्कार जैसे विषयों को लेकर हम सब का बहुत उत्तमता से मार्गदर्शन किया है।


षष्ठम अध्याय : (वानप्रस्थ-संन्यासधर्म विषय )


षष्ठम अध्याय में महर्षि मनु ने वानप्रस्थ विषय प्रकाश डालते हुए वानप्रस्थ धारण का समय,वानप्रस्थ धारण की विधि ,वानप्रस्थ के लिए पञ्चयज्ञों का विधान, अतिथियज्ञ एवं पितृयज्ञ का विधान, ब्रह्मयज्ञ का विधान,अग्निहोत्र का विधान,पवित्र भोजन करे, अभक्ष्य पदार्थ,वानप्रस्थ ग्रामोत्पन्न पदार्थ न खाए, सांसारिक सुखों में आसक्ति न रखते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करें, तपस्वियों के घरों से भिक्षा का ग्रहण
आत्मशुद्धि के लिए वेदमन्त्रों का मनन-चिन्तन, संन्यास धर्म विषय, वैराग्य होने पर गृहस्थ या ब्रह्मचर्य से सीधा संन्यास ग्रहण, जीवन-मरण के प्रति समदृष्टि,पवित्र एवं सत्य आचरण करे, अपमान को सहन करे, क्रोध आदि न करे
आध्यात्मिक आचरण में स्थित रहे, इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखकर मोक्ष के लिए सामर्थ्य बढ़ाये जैसे विषयों को स्पष्ट किया है।


सप्तम अध्याय: राजधर्म विषय


मनुस्मृति के सप्तम अध्याय में महर्षि मनु ने राजा बनने का अधिकारी कौन , राजा के आठ विशिष्ट गुण, दंड की सृष्टि और उपयोग विधि, दंड का महत्व, दंड देने का अधिकारी राजा कौन, न्याय विरुद्ध आचरण से यशनाथ, राजा वेद देवताओं से अनुशासन की शिक्षा ले, राजा विद्वानों से विद्याएं ग्रहण करे, जितेंद्रिय राजा ही प्रजा को वश में रख सकता है, मंत्रियों के साथ राजा का व्यवहार कैसा हो, दूतों की नियुक्ति और उनके लक्षण, दूत के कार्य, युद्ध के नियम, मंत्रणा की गोपनीयता का महत्व, राजा और सभा के संबंध, राज्यमंडल की विचारणीय आठ और मूल प्रकृतियां, संधि विग्रह आदि गुणों का वर्णन, राजनीति का निष्कर्ष, आक्रमण के लिए जाना और व्यूह रचना आदि की व्यवस्था, सच्चा मित्र सबसे बड़ी शक्ति, उदासीन राजा के लक्षण, राजा सुपरीक्षित भोजन करे, संध्या - उपासना तथा गुप्तचरों और प्रतिनिधियों के संदेशों को सुनना, भोजन के लिए अंतःपुर में जाना आदि विषयों पर अपना मंतव्य स्पष्ट किया है।


अष्टम अध्याय : राजधर्म के अंतर्गत व्यवहार निर्णय


मुकदमों के निर्णय के लिए राजा का न्यायसभा में प्रवेश, न्याय सभा में वादों को देखे, राजा के अभाव में मुकद्दमों के निर्णय के लिए मुख्य न्यायाधीश विद्वान की नियुक्ति, मुख्य न्यायाधीश तीन विद्वानों के साथ मिलकर न्याय करे, न्याय सभा में सत्य ही बोले और न्याय ही करे, मरा हुआ धर्म मारने वाले को ही नष्ट कर देता है, धर्म ही परजन्मों में साथ देता है, अन्याय से सब सभासदों की निंदा, राजा यथायोग्य व्यवहार से पापी नहीं कहलाता, ऋण लेने देने के विवाद का न्याय, धरोहर संबंधी व्यवस्थाएं, धरोहर रखने के विवाद का निर्णय, सामूहिक व्यापार का निर्णय, दिए पदार्थ को न लौटाने का निर्णय, वेतन आदान का निर्णय , प्रतिज्ञा विरुद्धता का निर्णय, क्रय विक्रय का निर्णय , पालक स्वामी का निर्णय, सीमा संबंधी विवाद और उसका निर्णय, कटु वाक्य बोलने संबंधी विवाद और उसका निर्णय, दंड से घायल करने या हत्या संबंधी विवाद और उसका निर्णय, चोरी का विवाद और उसका निर्णय, साहस , डाका, हत्या आदि अपराधों का निर्णय, स्त्री संग्रहण संबंधी विवाद और उसका निर्णय जैसे अनेक विषयों को महर्षि मनु ने आठवें अध्याय में स्पष्ट किया है।


नवम अध्याय: राजधर्म के अंतर्गत व्यवहार निर्णय


नवम अध्याय के अंतर्गत भी महर्षि मनु ने अनेक विषयों को लिया है। इसमें उन्होंने स्त्री पुरुष संबंधी विवाद और उसका निर्णय , स्त्री पर ही परिवार की प्रतिष्ठा निर्भर है, जैसा पति वैसी संतान , स्त्रियों के दूषण में ६ कारण, संतान उत्पत्ति संबंधी धर्म, स्त्रियां घर की लक्ष्मी हैं , संतान के अभाव में नियोग से संतान प्राप्ति, सगाई के बाद पति की मृत्यु होने पर दूसरे विवाह का विधान , उत्तम वर मिलने पर कन्या का विवाह शीघ्र कर दें, स्त्री पुरुष की अर्धांगिनी, दायभाग विवाद वर्णन , अलग होते समय दायभाग का बराबर विभाजन, सम्मिलित रहने पर विभाजन का दूसरा विकल्प, बड़े भाई का छोटों के प्रति कर्तव्य ,छोटों का बड़े भाई के प्रति कर्तव्य, माता का धन पुत्री का ही होता है, पुत्र के लक्षण, मातृधन का विभाग, जुआ संबंधी विवाद का निर्णय, जुआ एक तस्करी है, मुकदमों के अंत में उपसंहार, रिश्वत लेकर अन्याय करने वालों को दंड, राजा द्वारा लोक कंटकों निवारण , दो प्रकार के तस्कर, राजा प्रमाण मिलने पर ही दंड दे, राजा का आचरण , वैश्य और शूद्रों के कर्तव्य, शूद्र को उत्कृष्ट वर्ण की प्राप्ति जैसे विषयों को अध्याय ९ में स्पष्ट किया गया है।


दशम अध्याय : चारों वर्णों के अंतर्गत वैश्य शूद्र के धर्म


दशम अध्याय के अंतर्गत चारों वर्णों से भिन्न व्यक्तियों की संज्ञा, दस्यु अर्थात अनार्य की पहचान, उसके आचरण को देखकर करें, अनार्यों - दस्युओं के लक्षण, कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था , वर्ण परिवर्तन जैसे विषयों को स्थान दिया गया है।


एकादश अध्याय : प्रायश्चित विषय


एकादश अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि प्रायश्चित कब किया जाता है, प्रायश्चित का अर्थ क्या है, प्रायश्चित क्यों करना चाहिए, निंदित कर्म करने वालों का प्रायश्चित क्या है, वेदोक्त कर्मों के त्याग का प्रायश्चित क्या है ? इसके अतिरिक्त प्राजापत्य की विधि, चांद्रायण व्रत की विधि आदि व्रतों की विधि के साथ-साथ व्रत पालन के समय यज्ञ करें, व्रत पालन के समय गायत्री आदि का जाप करें, मानस पापों के प्रायश्चित की विधि, पांच कर्मों से प्रायश्चित में पाप भावना से मुक्ति, सबके सामने अपना अपराध कहने से पाप से मुक्ति, अनुताप करने से पाप भावना से मुक्ति, कर्मफलों पर चिंतन करने से पाप भावना से मुक्ति, तप तब तक करें जब तक मन में प्रसन्नता ना आ जाए, वेद ज्ञान रूपी तालाब में पाप भावना का डूबना, वेदवित् का लक्षण, प्रायश्चित विषय का उपसंहार पर भी प्रकाश डाला गया है।


द्वादश अध्याय: कर्म फल विधान और नि:श्रेयस कर्मों का वर्णन


अंतिम द्वादश अध्याय में महर्षि मनु ने कर्मफल विधान पर प्रकाश डाला है। इसमें उन्होंने त्रिविध कर्मों और त्रिविध गतियों का कथन किया है । इसके अतिरिक्त मन त्रिविध कर्मों का प्रवर्तक, त्रिविध मानसिक बुरे कर्म चतुर्विध वाचक बुरे कर्म, त्रिविध शारीरिक बुरे कर्म , जैसा कर्म उसी प्रकार उसका भोग, प्रकृति के आत्मा को प्रभावित करने वाले तीन गुण, जिस गुण की प्रधानता वैसी ही आत्मा, आत्मा में सत्व गुण की प्रधानता की पहचान, तीन गुणों के आधार पर तीन गतियां, तीन गतियों के कर्म, विद्या के आधार पर तीन गुण, तीन गतियों के तीन-तीन भेद और तदनुसार जन्म अवस्थाओं के फल तामस गतियों के तीन भेद, राजसिक गतियों के तीन भेद, सात्विक गतियों के तीन भेद, आत्मज्ञान का वर्णन, इंद्रिय संयम का वर्णन, वेदाभ्यास का वर्णन , वेद विरुद्ध शास्त्र प्रमाणिक पंचभूत आदि सूक्ष्म शक्तियों का ज्ञान वेदों से, वेद सुखों का साधन है, तप और विद्या का वर्णन, तप से पाप भावना का नाश और विद्या से अमृत प्राप्ति, धर्म ज्ञान के लिए त्रिविध प्रमाणों का ज्ञान, वेदानुकूल तर्क से धर्म ज्ञान, शिष्ट विद्वानों की परिभाषा, धर्म परिषद के दस सदस्य, धर्म परिषद के तीन सदस्य, वेद का एक विद्वान भी असंख्य मूर्खों से अधिक धर्म निर्णय में प्रमाण है, धर्म परिषद का सदस्य कौन नहीं हो सकता,परमेश्वर ही सब का निर्माता, फलदाता और उपास्य है , परमात्मा के अनेक नाम हैं , सर्वांतर्यामी परमात्मा ही संसार को चक्रवत चलाता है, समाधि से ईश्वर एवं मोक्ष प्राप्ति जैसे विषयों को भी लिया गया है।
इतने व्यापक चिंतन को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि महर्षि मनु कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। वह असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने मानव निर्माण से समाज निर्माण और समाज निर्माण से विश्व निर्माण तक का पूरा खाका मनुस्मृति के अंदर खींचने में सफलता प्राप्त की। यदि उनका यह आदि संविधान संसार के प्रत्येक देश की धर्म पुस्तक बनकर राजनीति और समाज का मार्गदर्शन करना आरंभकर दे तो सारे संसार की काया पलट हो सकती है। आज संसार जिस अशांति का शिकार है, उससे भी उसे मुक्ति मिल सकती है। आज की मजहबी पुस्तकें जहां हमें परस्पर लड़ाने का काम कर रही हैं, वहीं मनुस्मृति हम सबके भीतर सद्भाव विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।



(लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है ?)

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