खूँटी पर टंगी भैंस और स्टील की डोलियाँ
सत्येन्द्र कुमार पाठक
गाँव की सुबह अब पहले जैसी नहीं रही। 10 साल की अंशिका जब सुबह उठती, तो उसे याद आता कि कैसे कुछ साल पहले तक आँगन में 'कजरी' भैंस की पूँछ हिलाने की आवाज़ आती थी। अब वहाँ सन्नाटा रहता है।
एक दिन दादाजी बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। तभी 8 साल का दिव्यांशु और 7 साल का शशांक अपनी साइकिल लेकर तैयार हो गए। उनके हाथों में स्टील की डोलियाँ चमक रही थीं। नन्हे बुच्ची और प्रियांशु भी अपनी छोटी प्लास्टिक की बोतलों के साथ उनके पीछे हो लिए।
"अरे! कहाँ की तैयारी है?" दादाजी ने चश्मा नाक पर टिकाते हुए पूछा।
"दादाजी, मम्मी ने कहा है कि डेरी वाले भैया का दूध पतला है, इसलिए दूर वाले फार्म हाउस से शुद्ध दूध लाने जा रहे हैं," दिव्यांशु ने गर्व से कहा।
दादाजी ने एक गहरी लंबी सांस ली और बोले, "बेटा, आज जिसे तुम गर्व से 'शुद्ध दूध' कह रहे हो, वह असल में हमारी मजबूरी की निशानी है। एक जमाना था जब बिहार के हर घर में 'दूध-दही की नदियाँ' बहती थीं। नारा था— हरा भरा बिहार, गाय चरायब दूध दही घी का खायब। पर आज तो सच में 'भैंस खूँटी पर टंग गई है'!"
"भैंस खूँटी पर कैसे टंग सकती है दादाजी?" 3 साल के बुच्ची ने मासूमियत से पूछा।
पापा, जो ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे थे, पास आकर बोले, "बुच्ची, इसका मतलब है कि अब भैंसें खूंटे पर नहीं, बल्कि दूध की ये स्टील की डोलियाँ खूँटी पर टंगी रहती हैं। लोग अब पशु पालने की मेहनत से बचते हैं। पहले कहते थे 'दूध बेचना, पूत बेचना' है, यानी दूध को बेचना पाप समझा जाता था, उसे मेहमानों और बच्चों को पिलाया जाता था। पर आज यह सिर्फ एक मुनाफे का व्यापार बन गया है।"
अंशिका ने पूछा, "लेकिन पापा, दूध की कीमत इतनी ज्यादा क्यों है?"
पापा ने समझाया, "बेटा, आज एक अच्छी भैंस की कीमत लाखों में है। चारे और देख-रेख का खर्च भी बढ़ गया है। ऊपर से हमने अपनी भारतीय नस्ल की गायों को छोड़ दिया। अब लोग सिर्फ ज्यादा दूध देने वाली विदेशी गायों के पीछे भाग रहे हैं। शुद्ध घी और दूध तो अब औषधि की तरह ढूंढना पड़ता है।"
तभी मम्मी रसोई से बाहर आईं और बोलीं, "यही तो चिंता है। थैलियों वाला टोंड या फुल क्रीम दूध पीकर ये बच्चे कैसे पहलवान बनेंगे? न वह खुशबू है, न वह ताकत। इसीलिए तो ये बच्चे इतनी दूर स्टील की डोलियाँ लेकर जाते हैं ताकि कम से कम आँखों के सामने निकला दूध मिल सके।"
शशांक ने अपनी डोली को देखते हुए कहा, "दादाजी, क्या हमारे घर में फिर से गाय-भैंस नहीं आ सकतीं? हम सब मिलकर उनकी सेवा करेंगे।"
दादाजी मुस्कुराए और बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "अगर तुम बच्चे यह संकल्प लो, तो वह दिन दूर नहीं जब 'गाय बचाओ, देश बचाओ' और 'भैंस बचाओ, जीवन बचाओ' के नारे सच होंगे। वरना आने वाली पीढ़ी तो सिर्फ किताबों में ही पढ़ेगी कि भैंस काली होती थी और दूध सफेद!"
पापा ने बच्चों को स्कूटी पर बैठाया और सब 'स्टील की डोलियों' का काफिला लेकर निकल पड़े। अंशिका मन ही मन सोच रही थी कि वह बड़ी होकर एक ऐसा फार्म बनाएगी जहाँ भारतीय नस्ल की गाएँ खुशी-खुशी घूमेंगी और किसी को हाथ में डोली लेकर मीलों दूर नहीं जाना पड़ेगा।
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