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नशा चढ़ता है

नशा चढ़ता है

संजय जैन

रोज दूर से देखकर तुम्हें।
दिल रोज ही धड़कता है।
आँखो को भी रोज नशा।
तुझे देखकर चढ़ता है।।


बहुत हुआ नजरों का खेल।
अब मिलकर इजहार करो।
बंद जुवा से कहने का अब।
कुछ तो यार साहस करो।।


माना की दिल की बातें।
कहने को होंठ खुल नही रहे।
पर दिलमें आग भड़क रही है।
जो धड़कनो को बढ़ा रही है।।


मुस्कराते हुए देखकर तुम्हें।
आँखो से प्यार वर्षा रहा है।
कहने सुनने को बहुत है।
पर न जाने क्यों डर रहा है।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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