धड़कने बढ़ रही है
संजय जैनदेखकर दूर से तुम
क्यों मुस्कराते हो।
राज-ए मोहब्बत का
क्यों छुपाते हो।
खोलकर दिलके द्वार को
बाहर निकल आओं।
हाल-ए अपने दिलका
कुछ तो तुम बताओं।।
भावनाए दिलकी मैं भी
आज लेकर आया हूँ।
इसलिए तुम्हें देखकर मैं
यहाँ पर रुक गया हूँ।
दिल की बातें कहना
मैं भी चाहता हूँ।
प्रेम का प्यारा संदेश
तुम्हें देना चाहता हूँ।
तेरे दिलमें आने का
मैं साधन ढूढ़ रहा हूँ।
दिल की घबड़ाहट को
कम करना चाहता हूँ।
काश कोई मिल जाएंं
जो ये संदेश ले जाए।
जिससे तेरे दिलके द्वार
मेरे लिए खोल जाएं।।
तेरी आँखे भी किसी
अजनबी को तलाश रही है।
जो तेरे दिलकी पीड़ा को
उदास आँखे दिखा रही है।
जो मुझसे यार अब
देखी नही जा रही है।
इसलिए दिल की धड़कने
तेरे लिए बढ़ रही है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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