यू जी सी-क्या हम आजाद हैं ?
अरुण दिव्यांश
राजनीत शब्द भी अजीब शब्द है । राजनीत में आजीवन ही गद्दी पर आसीन रहना चाहते हैं और यदि हम पदासीन हैं तो मन गद्दी छोड़ना ही नहीं चाहता है । इसके लिए चाहे हमें कुछ भी करना पड़ जाए , नौ को छ: कहना पड़ जाए या छ: को नौ कहना पड़ जाए , पराए को अपनाना पड़ जाए या अपनों को पराया बनाना पड़ जाए , हम करने से चुकते नहीं हैं । आखिर गुणी बनने में भी अहंकार आ ही जाता है और अहंकार आने का तात्पर्य ही है कि लोभ बढ़ना है और लोभ बढ़ेगा तो ईर्ष्या भी होना स्वाभाविक ही है । यह लोभ किसी भी शासक को छोड़ा नहीं है ।
जी यह बात है यू जी सी की । यह तो अच्छा हुआ कि आपने अपनी पहचान दे दिया , वरना हम तो आपको भगवान समझ बैठे । कल तक तो हम प्रिय बने बैठे थे , आज वह प्रिय बन रहा है , अर्थात कल तक हम तुम्हारे हथियार बने थे , आज वह हथियार बन रहा है , जबकि दोनों ही गलत है । यहाॅं तो सभी तुम्हारे हैं , किंतु ऐसा करने से शायद अधिक समय तक गद्दी पर कायम न रह सकें ।
हम हैं तो भारतीय , किंतु नीति तो अंग्रेजों से ही सीखा है तो अंग्रेजी नीति पसंद आएगी ही । कल तक जो प्रशंसा के पात्र बने थे , आज वही बुराई के पात्र बन गए । क्या सच में हम स्वतंत्र हैं , क्या हम सच में स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं , क्या वास्तव में भारत देश आजाद है ? यदि है भी तो यह आजादी ऊपर तक ही सीमित रह गई है । शेष को तो पाॅंच वर्षों में एक दिन के लिए आजाद किया जाता है , चुनाव करने के लिए । उसके बाद तो फिर गगन तले कारागार में कैद होकर रह जाते हैं ।
आजाद तो जो सुपर होता है , वह होता है । कहा जाता है कि जंगल का रानी शेरनी होती है । जब मर्जी होगी बच्चे देगी , या जब मर्जी होगी अंडे देगी । आखिर होगा तो शेर या शेरनी ही ।
यू जी सी का नियम कल भी अनैतिक था , आज भी अनैतिक है । आरंभ से ही हमें बाॅंटते बाॅंटते हमें खंडित कर दिया गया और आज भी हमें खंडित ही किया जा रहा है , जबकि यह भी सत्य है कि हमें बाॅंटते बाॅंटते बाॅंटनेवाले भी बॅंट जाते हैं और शक्तिहीन होकर स्वत: छॅंट जाते हैं ।
हमें बाॅंटनेवाले अपना देखो ,
फुट सत्ता की न सपना देखो ।
हुए आतुर स्वार्थ सिद्धि हेतु ,
भविष्य में न बिलखना देखो ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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