
वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय - १६
....और राष्ट्रगीत बन गया ' वंदे मातरम'
डॉ राकेश कुमार आर्य
' वंदे मातरम ' के बारे में हमको जानबूझकर भ्रमित करने का प्रयास किया गया है कि इस पर विदेशी विद्वानों के विचारों का प्रभाव पड़ा है। हमको बताया गया है कि यूरोपियन राष्ट्रवाद ने हमारे राष्ट्रगीत ' वंदे मातरम' को बहुत अधिक प्रभावित किया है। बताया गया है कि इटली में हम देखते हैं कि वहां पर मदर इटली की कल्पना की गई है। इस प्रकार के विचारों का प्रभाव हमारे राष्ट्रवाद पर पड़ा। जिससे ' वंदे मातरम' की रचना हुई।
जिन लोगों ने इस प्रकार का भ्रम फैलाने का कार्य किया है हम उनसे रंच मात्र भी सहमत नहीं हैं। हम पूर्व में ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत प्राचीन काल से मातृभूमि की वंदना करने वाला राष्ट्र रहा है। जब इटली या यूरोप के अन्य देश सभ्यता और संस्कृति का क, ख , ग नहीं जानते थे, अथवा कहिए कि जब उनका अस्तित्व भी नहीं था तब हम विभिन्न क्षेत्रों में विश्व का मार्गदर्शन कर रहे थे। वस्तुत: इस प्रकार का भ्रम केवल इसलिए फैलाया गया है कि भारत अपने गौरवपूर्ण अतीत से अपने आप को जोड़ न पाए और उसे यह आभास न होने पाए कि उसके पास राष्ट्रीय चिंतन का कितना ऊंचा स्तर है ? कांग्रेस ने विदेशी विद्वानों के इस प्रकार के दुष्प्रचार का पूर्णतया समर्थन किया। इसका कारण यह था कि इसके नेता महात्मा गांधी जी और नेहरू जी स्वयं भारत की मेधा शक्ति के नहीं अपितु यूरोप की बौद्धिक शक्ति के उपासक थे। उन्हें लगता था कि हमें यूरोप का और विशेष रूप से अंग्रेजों का इस बात के लिए ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने हमें सभ्यता सिखाई,लोकतंत्र के संस्कार दिए और मौलिक अधिकारों से भी हमारा परिचय कराया।
मोहम्मद अली जिन्ना की घोषणा
१५ अक्टूबर १९३७ को मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ में भाषण देते हुए यह स्पष्ट किया था कि उनकी पार्टी मुस्लिम लीग ' वंदे मातरम' के साथ कोई समझौता नहीं करेगी और न ही उसे कभी किसी कार्यक्रम में गाएगी। मोहम्मद अली जिन्ना ( जो कि मूल रूप में हिंदू था ) देश के विभाजन के लिए काम कर रहा था। उसकी सोच में विखंडन था। भारत को बाहर से आने वाले मुसलमानों से कहीं अधिक उन मुसलमानों ने अधिक कष्ट दिया है जो कभी मूल रूप में हिंदू थे और कालांतर में वे मुस्लिम हो गए थे। मोहम्मद अली जिन्ना भी इसका अपवाद नहीं था। जिन्ना की इस विखंडनवादी सोच का कारण था उसे ब्रिटिश सरकार का पूर्ण समर्थन प्राप्त होना। ब्रिटिश सरकार पहले से ही इस बात का प्रयास कर रही थी कि जैसे भी हो हिंदुओं को स्वाधीनता आंदोलन में अकेला खड़ा किया जाए। इसके लिए उन्होंने बड़ी सावधानी से मुसलमानों और मुस्लिम लीग को अपनी गोद में ले लिया था। जब देश के राष्ट्रवादी क्रांतिकारी ' वंदे मातरम' गाने से बाज नहीं आ रहे थे, तब ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों को इस बात के लिए उकसाना आरंभ किया कि तुम कहो कि ' वंदे मातरम' उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है । इसलिए वे उसे नहीं गाएंगे। अंग्रेजों का तीर सही निशाने पर लगा था। सोची समझी नीति के अंतर्गत मुस्लिम लीग के नेताओं ने इस बात का दुष्प्रचार करना आरंभ किया कि ' वंदे मातरम' उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है। इसलिए वे या कोई भी मुस्लिम इसको नहीं गाएगा । वास्तव में मुस्लिम लीग के नेता यह बात भली प्रकार जानते थे कि मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को उकसा कर वे अपना उल्लू सहजता से सीधा कर सकते हैं। यही कारण था कि उन्होंने ' वंदे मातरम' को धार्मिक भावनाओं के साथ जोड़ दिया। इससे उनकी और अंग्रेजों की चाल को सिरे चढ़ाने में उन्हें सफलता प्राप्त हो गई।
नेहरू जी ने किया आत्मसमर्पण
अंग्रेजों के साथ अपनी इसी प्रकार की मिली भगत पर काम करते हुए जब मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ की एक सभा में भाषण देते हुए यह स्पष्ट किया कि वे ' वंदे मातरम' को नहीं गाएंगे तो दिल्ली में बैठे नेहरू जी की बेचैनी बढ़ गई। उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की इस प्रकार की विखंडनकारी सोच का सही प्रति उत्तर न देते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस से बातचीत की और उनसे कहा कि कांग्रेस कि आगामी बैठक के समय 'वंदे मातरम' की समीक्षा की जाए। नेहरू जी ने इसी आशय का एक वक्तव्य भी जारी कर दिया। इस बात से स्पष्ट हो गया कि नेहरू जी ने मोहम्मद अली जिन्ना की एक धमकी के सामने ही आत्मसमर्पण कर दिया।
अभी 'वंदे मातरम' की १५० वीं जयंती के अवसर पर जब भारत की संसद में इस गीत को लेकर विशेष चर्चा की गई तो प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि '१९३७ में ‘वंदे मातरम’ को तोड़ दिया गया था। उसके टुकडे किए गए थे। वंदे मातरम के इस विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बो दिए थे। राष्ट्र-निर्माण के इस महामंत्र के साथ यह अन्याय क्यों हुआ ? यह आज की पीढ़ी को जानना जरूरी है। क्योंकि वही विभाजनकारी सोच आज भी देश के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। '
बीजेपी नेता अमित मालवीय ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि यह आवश्यक हो गया है कि हमारी नई पीढ़ी जाने कि किस तरह कांग्रेस पार्टी ने पंडित नेहरू की अध्यक्षता में अपने मजहबी एजेंडे को बढ़ावा देते हुए १९३७ के फ़ैज़पुर अधिवेशन में केवल कटे-छंटे ‘वंदे मातरम्’ को ही अपनी कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रगीत बनाया था ? "
नेहरू जी का पूर्वाग्रह
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने १९३७ के अक्टूबर के अंत में हुई अपनी बैठक में धार्मिक तनाव बढ़ने का बहाना बनाकर 'वंदे मातरम' के पहले दो पदों को स्वीकार किया। शेष पदों को काट दिया गया। नेहरू जी ने ' वंदे मातरम' को लेकर स्वयं यह कहा था कि वह इस गीत को समझने के लिए स्वयं शब्दकोश का सहारा लेते हैं। इस प्रकार नेहरू जी ' वंदे मातरम' के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त थे। वैसे भी उन्हें अपने राजनीतिक गुरु महात्मा गांधी जी की तर्ज पर काम करते हुए मुस्लिम तुष्टिकरण में विशेष रूचि थी। यही कारण रहा कि उन्होंने वंदे मातरम को काटना स्वीकार कर लिया। जिसकी अंतिम परिणति देश के विभाजन के रूप में देखने को मिली। यदि नेहरू जी, गांधी जी और उनकी कांग्रेस १९३७ में जिन्ना को ' वंदे मातरम ' न गाए जाने की धमकी देने के प्रश्न पर कठोर भाषा में अपना प्रति उत्तर प्रेषित करते तो मोहम्मद अली जिन्ना जिस दिशा में खतरनाक ढंग से बढ़ता जा रहा था, उसे रोका जा सकता था। नेहरू जी यदि भारतीयता के उपासक होते तो निश्चित रूप से वह जिन्ना को उसकी गलती का आभास कराते और उसे बताते कि ' वंदे मातरम' हमारी भारतीयता का संवाहक है।
१९३७ के बाद से परिस्थितियां तेजी से कांग्रेस के हाथों से निकलने लगी थीं । इसका कारण केवल यही था कि गांधी जी, नेहरु जी और कांग्रेस के द्वारा मुस्लिम सांप्रदायिकता के समक्ष हथियार डाल दिए गए थे। अंग्रेजों ने धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियां बना दी थीं कि क्रांतिकारी आंदोलन को उसने एक ओर कर दिया। सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार के रूप में अंग्रेजों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को तैयार किया। स्पष्ट था कि कांग्रेस को विभाजन के पश्चात भारत का नेतृत्व मिलना था और मुस्लिम लीग को पाकिस्तान का नेतृत्व मिलना था। सब कुछ एक प्रायोजित कार्यक्रम के अंतर्गत घटित होता जा रहा था। मोहरे तलाश कर लिए गए थे । चेहरे तैयार कर लिए गए थे। इन मोहरों और चेहरों की ओट में अंग्रेजों ने अपने आप को सुरक्षित भी कर लिया था। अब कांग्रेस के नेताओं का ध्यान देश की स्वाधीनता की ओर कम और मिलने वाली स्वाधीनता के पश्चात सत्ता की मलाई चखने की ओर अधिक हो गया था। विशेष रूप से नेहरू जी का तो पूरा ध्यान ही सत्ता पर केंद्रित हो गया था। उनकी केवल एक इच्छा थी कि जितना शीघ्र हो सके उतनी शीघ्रता से देश स्वतंत्र हो जाए। इसके बदले यदि देश का विभाजन स्वीकार करते हुए मुसलमानों को पाकिस्तान देना पड़े तो भी उन्हें स्वीकार था। देश की स्वतंत्रता से उनका केवल एक स्वार्थ रह गया था कि जैसे ही देश स्वाधीन हो तुरंत उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाए। स्वाधीन भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने की उन्हें ललक थी। इसके लिए चाहे उन्हें ' वंदे मातरम' को विदा कहना पड़े, तोड़ना पड़े, छोड़ना पड़े या कोई और इसी प्रकार का आचरण करना पड़े- वह सब कुछ करने के लिए तत्पर थे।
कांग्रेस वंदे मातरम से हो गई थी दूर
१५ अगस्त १९४७ को देश स्वाधीन हुआ। उससे पहले से ही कांग्रेस ' वंदे मातरम' से पल्ला झाड़ चुकी थी। सांप्रदायिक आधार पर देश का विभाजन हुआ तो कांग्रेस के समक्ष ' वंदे मातरम' को अपनाने का एक बार फिर एक अवसर आकर उपस्थित हुआ। इस समय भी कांग्रेस के नेता यदि अपने किए हुए पर पश्चाताप कर लेते और देश के समक्ष इतना कहने का साहस कर लेते कि अतीत में जो गलतियां हमसे हुईं , उनके लिए हम हृदय से पश्चाताप करते हैं। यह हमारी भूल रही कि हमने मुस्लिम नेताओं से हृदय परिवर्तन की अपेक्षा की। हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारा इस प्रकार का आचरण चील के घोंसले में मांस ढूंढने जैसा ही सिद्ध हुआ। अब जबकि मुसलमानों को अपना मनचाहा देश मिल गया है अर्थात अंग्रेजों से की गई अपनी गुप्त संधि के अनुसार अपना ' सर्वोत्तम पुरस्कार ' मुस्लिम लीग और मुस्लिम नेताओं को प्राप्त हो गया है तो अब हम अपने राष्ट्र को ' हिंदू राष्ट्र' बनाने के लिए संकल्पित होते हैं और देश के लोगों को विश्वास दिलाते हैं कि भविष्य में इस प्रकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की राष्ट्रघाती नीति को कभी भूलकर भी नहीं अपनाएंगे।
इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाना चाहिए कि कांग्रेस ने इसके उपरांत भी की गई अपनी गलतियों से कोई शिक्षा नहीं ली। जब देश स्वाधीन हुआ और देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित किया तो उन्होंने अपने पहले भाषण में ही यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस अतीत में की गई अपनी गलतियों से कोई शिक्षा लेने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने देशवासियों को इस प्रकार का भी आभास कराया कि हम हर परिस्थिति में ठीक थे और देश का विभाजन करने में हमारी किसी नीति का कोई योगदान नहीं है। जो कुछ हुआ है- वह हिंदू सांप्रदायिकता के कारण हुआ है।
' वंदे मातरम' को कर दिया उपेक्षित
स्वाधीन भारत में जब राष्ट्रगान के चयन करने के निर्णायक क्षण आए तो कांग्रेस ने बंकिम चंद्र चटर्जी के राष्ट्रवादी चिंतन से ओतप्रोत ' वंदे मातरम ' गीत को एक बार फिर उपेक्षित कर दिया। कांग्रेस के नेताओं ने मुस्लिम तुष्टिकरण की अपनी परंपरागत नीति को त्यागा नहीं। नेहरू जी ने देश का प्रधानमंत्री पद हथियाने में सफलता प्राप्त की। जिसमें उन्हें अंग्रेजों का भी पूरा समर्थन प्राप्त हुआ। लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी धर्मपत्नी एडविना माउंटबेटन ने नेहरू जी से एक प्रकार से यह वचन ले लिया कि वह अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से पीछे नहीं हटेंगे। इसके लिए उन्हें चाहे जो कुछ करना पड़े, वह करेंगे। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने भारत से अपना बोरिया बिस्तर समेटने से पहले यह सुनिश्चित कर लिया कि वह अपनी ' फूट डालो और राज करो ' की नीति को स्वतंत्र भारत में भी यथावत जारी रखने का पूरा प्रबंध कर चुकी है। नेहरू के रूप में उन्हें अपने हितों को साधने के लिए एक ' अच्छा प्रधानमंत्री' मिल गया था।
नेहरू जी ने अपने लिए सबसे बड़ा पुरस्कार प्रधानमंत्री का पद प्राप्त कर लिया था । जिससे वह बहुत अधिक प्रफुल्लित थे। इसलिए उन्होंने ' वंदे मातरम' के स्थान पर जन-गण-मन को राष्ट्रगान बनाने पर बल दिया और इस में उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई। वह अपने आका अंग्रेजों को यह स्पष्ट कर देना चाहते थे कि उनके हृदय में ब्रिटिश सरकार के प्रति आज भी श्रद्धा का भाव है। क्योंकि वह उसी गीत को देश का राष्ट्रगान बनाने जा रहे हैं जो कभी जॉर्ज पंचम की अगवानी के समय कांग्रेस ने ब्रिटिश सम्राट के सम्मान में बहुत ही श्रद्धा भाव के साथ गाया था। यद्यपि दिखाने के लिए इस समय भी यह कहा गया कि कुछ मुस्लिम नेता ' वंदे मातरम ' का विरोध कर रहे हैं और उनके विरोध के दृष्टिगत ' वंदे मातरम' के स्थान पर जन- गण- मन को देश का राष्ट्रगान बनाया जाना उचित होगा। यदि इस बात को भी सच मान लिया जाए तो इसमें भी कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण का पुराना खेल ही दिखाई देता है।
नेहरूजी ने करवा दी कांट छांट
१९३७ में कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में ' वंदे मातरम' विवाद पर गहन चिंतन मंथन करने के उपरांत जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी। स्पष्ट है कि यह कमेटी वंदे मातरम के विरोध में ही अपनी संस्तुति देने वाली थी। क्योंकि नेहरू जी प्रारंभ से ही वंदे मातरम के विरोधी थे। उन्होंने बैठक से पूर्व ही यह स्पष्ट कर दिया था कि हम ' वंदे मातरम' में कुछ काट छांट करना चाहते हैं। यह वही नेहरू जी थे जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने के पश्चात सबसे पहले ' भारत रत्न' अपने आप ले लिया था। अपने आप ही वे ' भारत रत्न' की परंपरा आरंभ करने वाले व्यक्ति थे और अपने आप ही पहले ' भारत रत्न' बन गए थे। अपनी इसी कार्य शैली का परिचय उन्होंने ' वंदे मातरम' में की जाने वाली काटछांट को लेकर दिया था। पहले ' वंदे मातरम' का विरोध किया और फिर ' वंदे मातरम' में कुछ परिवर्तन हो या न हो इसके लिए गठित कमेटी के अपने आप ही अध्यक्ष बन गए। जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि ' वंदे मातरम' नेहरू जी के द्वारा बलि का बकरा बनने जा रहा है। इस कमेटी में उन्होंने अपने प्रिय मित्र मौलाना अबुल कलाम आजाद को भी रख लिया था। जिससे कि कार्य और भी अधिक सरल हो जाए। मौलाना अबुल कलाम आजाद को भी इस कमेटी में रखकर नेहरू जी ने यह भी सुनिश्चित कर लिया था कि यदि किसी भी प्रकार का कोई विरोध हो तो भी उनका पक्ष मजबूत रहना चाहिए। कुल मिलाकर ' वंदे मातरम' में परिवर्तन करना नेहरू का पूर्वाग्रह बन गया था और इसमें वह अंत में पूर्णतया सफल हो गए।
अब जो नेहरू जी १९३७ में देश के राष्ट्रवादी गीत ' वंदे मातरम' में मनचाहा संशोधन कर सकते थे, वे प्रधानमंत्री बनने के पश्चात उसके बारे में क्या विचार रख सकते हैं ? इसे सहज ही समझा जा सकता है।
जिस प्रकार नेहरू जी ने तत्कालीन भारत के प्रान्तों के कुल १५ मतों में से दो मत प्राप्त करके भी १२ मत प्राप्त करने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से पीछे धकेलकर देश का प्रधानमंत्री पद हथियाने में सफलता प्राप्त की थी, उसी प्रकार लोगों का मत जाने बिना उन्होंने अपनी इच्छा से वंदे मातरम को पीछे धकेल कर ' जन - गण - मन' को राष्ट्रगान बना दिया। यदि लोगों की इच्छा का सम्मान किया जाता तो निश्चित रूप से ' वंदे मातरम' ही उस समय हमारा राष्ट्रगान बनना था। नेहरू जी ने अपने प्रधानमंत्री बनने में तानाशाही दिखाई और ' वोट चोरी' करके अपने आप को देश का प्रधानमंत्री बनवाया। इसी प्रकार उन्होंने ' वोट चोरी' करके ही अर्थात देश की सामान्य इच्छा को उपेक्षित करते हुए वंदे मातरम को देश का राष्ट्रगान नहीं बनने दिया। उनके पास तर्क वही था कि यदि ' वंदे मातरम' को राष्ट्रगान बनाया जाएगा तो कुछ मुसलमानों का ' दिल टूट जाएगा।' मुसलमानों का दिल उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। हिंदुस्तान का दिल चाहे हजार बार टूट जाए परंतु किसी मुस्लिम का दिल नहीं टूटना चाहिए था। नेहरू जी की इसी सोच के कारण ' वंदे मातरम' राष्ट्रगान बनने से पीछे रह गया।
उन दिनों देश की संविधान सभा अपना कार्य कर रही थी अर्थात स्वतंत्र भारत का संविधान अपने निर्माण काल में था। २६ जनवरी १९५० से हमारे संविधान को लागू किया गया था। हम सभी जानते हैं कि देश का संविधान २६ नवंबर १९४९ को बनकर तैयार हो गया था। २६ जनवरी १९५० से सही दो दिन पहले अर्थात २४ जनवरी १९५० को ' वंदे मातरम ' को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य को डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में पढ़ा था। जिसके माध्यम से वंदे मातरम को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगीत बनाया गया था।
इस संबंध में यह बात आज तक स्पष्ट नहीं है कि जब हमारा संविधान २६ नवंबर १९४९ को बनकर तैयार हो गया था तो २४ जनवरी १९५० को इसमें नेहरू जी ने बिना संवैधानिक संशोधन लाए कैसे एक नया प्रावधान लागू कर दिया कि हमारे देश का राष्ट्रगीत ' वंदे मातरम' होगा ? जो संविधान पहले ही तैयार हो गया था , उस संविधान में नया प्रावधान लाना क्या संविधान सभा की उस मूल भावना के विरुद्ध किया गया खिलवाड़ नहीं था, जिसे वह लगभग दो माह पहले ही बनाकर तैयार करके राष्ट्र को दे चुकी थी ? यदि इसे देश का राष्ट्रगीत बनाना ही था तो जिस समय संविधान की धाराओं का वाचन चल रहा था, नेहरू जी उस समय संविधान सभा के समक्ष ' वंदे मातरम' के संबंध में अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने से पीछे क्यों हटे ? क्या नेहरू जी को यह डर सता रहा था कि यदि संविधान सभा के समक्ष वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाने या न बनाने का प्रस्ताव रख दिया गया तो संविधान सभा निश्चित रूप से इस गीत को ही देश का राष्ट्रगान बना देगी ?
इसके साथ ही एक बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि जिस मोहम्मद इकबाल ने ' सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता हमारा' गीत गाया था, उसने बाद में भारत को छोड़कर पाकिस्तान जाने का निर्णय लिया था और पाकिस्तान के समर्थन में भी वह काम करता रहा था। इतना ही नहीं, उसने अपने इस गीत के उस पंक्ति को भी बदल दिया था, जिसमें उसने कहा था कि " हिंदी हैं हम वतन हैं हिंदोस्ता हमारा ' इसके स्थान पर उसने लिख दिया था कि ' मुस्लिम हैं हमवतन हैं हिंदोस्ता हमारा '। उसके इस विघटनकारी गीत को स्वतंत्र भारत में ' वंदे मातरम' जैसा ही सम्मान देते हुए राष्ट्रगीत बना दिया गया। इस पर कभी कोई चर्चा नहीं हुई कि इसके लिए गांधी जी नेहरु जी को किसने अधिकृत किया था ? क्या मोहम्मद इकबाल के इस गीत को ' वंदे मातरम' के समकक्ष रखना उचित है अथवा यह हमारे राष्ट्रगीत वंदे मातरम का अपमान है ?
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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