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‘वंदेमातरम्’ की १५० वीं जयंती

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय १७

‘वंदेमातरम्’ की १५० वीं जयंती

डॉ राकेश कुमार आर्य

अब से सही १५० वर्ष पहले ‘वंदेमातरम्’ गीत की रचना हुई थी। इस गीत की रचना के इस विशेष वर्ष को राष्ट्रवादी राष्ट्रवासियों ने इस अवसर पर अपने राष्ट्रवादी क्रांतिकारी आंदोलन के उन अनेक क्रांतिकारियों को सादर स्मरण किया जो ' वंदे मातरम' कहते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गए थे। इसके अतिरिक्त इस गीत के रचनाकार बंकिम चंद्र चटर्जी को भी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। साथ ही हमारे इस पवित्र क्रांतिकारी गीत के साथ हुए छल प्रपंचों के इतिहास को भी स्मरण किया गया। जिन नेताओं का ' वंदे मातरम ' को लेकर दोगला व्यवहार रहा, उनके बारे में भी लोगों को कई प्रकार के सत्य और तथ्य सुनने को मिले। हमारे देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने २६ अक्टूबर को अपने " मन की बात " कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को ‘वंदेमातरम्’ गीत का स्मरण कराया था।

प्रधानमंत्री श्री मोदी की घोषणा

केंद्र सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि अगले १ वर्ष तक देश में ‘वंदेमातरम् ’ को लेकर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। जिससे कि भारत के क्रांतिकारी इतिहास के गौरवपूर्ण पक्ष को आज की युवा पीढ़ी के समक्ष सही प्रकार से प्रस्तुत किया जा सके। इसका एक उद्देश्य यह भी है कि हमारी युवा पीढ़ी को यह भी ज्ञात होना चाहिए कि ‘वंदेमातरम्’ के लिए कितने क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया है ? वास्तव में ‘वंदेमातरम्’हमारे क्रांतिकारी स्वाधीनता आंदोलन का एक ऐसा महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसने स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे युवा क्रांतिकारियों को देश पर मर मिटने की प्रेरणा दी थी। यदि एक वर्ष तक विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से ‘वंदेमातरम्’ के बारे में देश की युवा पीढ़ी को जानने और समझने को कुछ मिलेगा तो निश्चित रूप से हमारे इतिहास की नई परंतु वास्तविक तस्वीर उनके हृदय में अंकित होगी। जो कि किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र की युवा पीढ़ी के लिए आवश्यक होता है। भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद क्या है और उसने किस प्रकार पिछली शताब्दियों में हमारी युवा पीढ़ी को झकझोरने और स्वराष्ट्र पर मर मिटने की प्रेरणा दी है ? - इसे भी ‘वंदेमातरम्’ के लिए होने वाले एक वर्ष के कार्यक्रमों में समझा जा सकेगा। भारत को समझने के लिए वंदे मातरम को समझना पड़ेगा और वंदे मातरम को गहराई से अंगीकृत करने के लिए भारत को समझना पड़ेगा। इस प्रकार भारत और वंदे मातरम का अन्योनाश्रित संबंध है।

भारत की संसद में हुई बहस

जिस काम को कांग्रेस के द्वारा कभी संविधान सभा में करा लेना चाहिए था, अर्थात वंदे मातरम पर गंभीर चिंतन मंथन और बहस संविधान सभा में होनी चाहिए थी, वह उस समय तो नहीं हुई, परंतु अब जाकर उस पर देश की संसद ने गरमागरम बहस की। जिससे कई ऐसे तथ्य निकलकर सामने आए जो देश के लोगों को पहली बार सुनने के लिए मिले।
८ दिसंबर २०२५ को भारत की संसद में वंदे मातरम पर १० घंटे की एक विशेष चर्चा का आयोजन किया गया। इस चर्चा के माध्यम से पूरे राष्ट्र का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया जाना था कि ' वंदे मातरम' के विषय में कांग्रेस का चिंतन क्या रहा है और किस प्रकार कांग्रेस के बड़े नेताओं ने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उपहास करने में कभी किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी ? आज की कांग्रेस और उसके नेता जिस प्रकार भारतीय राष्ट्रवाद को कपोल कल्पित मानते हैं और उसका उपहास करने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ते हैं ,उसको भी इस १० घंटे की चर्चा के माध्यम से जनसामान्य के समक्ष लाया जाना आवश्यक था।
८ दिसंबर को इस वंदे मातरम पर लोकसभा में चर्चा हुई जबकि ९ दिसंबर को राज्यसभा में इस पर चर्चा कराई गई।
इस अवसर पर चर्चा में भाग लेते हुए भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद डॉ राधा मोहन दास अग्रवाल ने कांग्रेस को घेरते हुए कहा कि संविधान सभा में कांग्रेस ने राष्ट्रगीत से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर कभी चर्चा में भाग नहीं लिया था। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने संविधान सभा में तत्संबंधी पारित होने वाले प्रस्ताव को भी गंभीरता से नहीं लिया था। भाजपा सांसद के इस प्रकार के आरोप को आज के युवाओं को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्हें तथ्यों की समीक्षा करनी चाहिए और अतीत को समझना चाहिए।

कांग्रेस के बड़े धोखे को किया उजागर

श्री अग्रवाल का ' वंदे मातरम' पर दिया गया भाषण बहुत सराहा गया है। उन्होंने जिस ओजस्विता के साथ अपनी बात को रखा उसमें तथ्य और प्रमाणों की कमी नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विषय पर देश के साथ “बड़ा धोखा” हुआ है। उनके अनुसार, पहले यह निर्णय लिया गया था कि वंदे मातरम् के मुद्दे को संविधान सभा में चर्चा के लिए लाया जाएगा, परन्तु बाद में कांग्रेस ने औपचारिक प्रस्ताव लाने के स्थान पर इस संबंध में केवल एक वक्तव्य जारी करना ही पर्याप्त मान लिया।
डॉ राधा मोहन अग्रवाल जी की इस बात पर यदि विश्वास किया जाए तो क्या इसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार भारत के संविधान में कांग्रेस के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने धारा ३५ ( ए ) को अपने आप ही संविधान में स्थापित कर दिया था , क्या उसी प्रकार वंदे मातरम को राष्ट्रगीत बनाने का निर्णय नेहरू जी ने स्वयं ले लिया था ? डॉ अग्रवाल के उपरोक्त शब्द कुछ गहरे राज की ओर संकेत करते हैं।

नेहरू जी की सोच और वंदेमातरम

जब संविधान सभा की बैठकें चल रही थीं तो उस समय देश का नाम ' भारत ' रखा जाए अथवा ' इंडिया' रखा जाए इस पर गहन चिंतन मंथन किया गया था। इसके अतिरिक्त और भी कई ऐसे बिंदु थे, जिन पर देर तक विचार - विमर्श करने के उपरांत कोई निर्णय लिया गया था। परंतु अत्यंत दुख के साथ कहना पड़ता है कि जहां लगभग ३ वर्ष से अधिक समय तक ‘भारत’ और ‘इंडिया’ सहित कई विषयों पर गहन विमर्श हुआ, वहीं वंदे मातरम् पर “एक सेकंड का विमर्श भी नहीं किया गया। ' इसका अभिप्राय है कि संविधान सभा के समक्ष ' वंदे मातरम' के महत्वपूर्ण बिंदु को जानबूझकर प्रस्तुत नहीं किया गया था। देश के पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू की मानसिकता थी कि जैसे भी हो ' वंदे मातरम' को केवल ' राष्ट्रगीत' तक ही सीमित रखा जाए और जन गण मन को राष्ट्रगान बना दिया जाए। इसके लिए यदि संविधान सभा को भी उपेक्षित किया जाए तो कर लिया जाए।
संविधान सभा के अध्यक्ष और बाद में देश के पहले राष्ट्रपति बने डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का दर्जा दिया जाएगा। परन्तु वर्तमान में कांग्रेस सहित देश के सारे विपक्ष ने राजेंद्र प्रसाद की उस महत्वपूर्ण पंक्ति को 'बड़ी चतुराई से छिपाया' जिसमें यह कहा गया था कि 'परिस्थिति अनुसार आने वाली सरकारें जन गण मन में परिवर्तन कर सकेंगी।'

देश का संविधान और वंदे मातरम

यदि देश की संसद संविधान में अनेक संशोधन कर सकती है तो राष्ट्रगान की किसी पंक्ति में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता ? हमारे देश के संविधान के बारे में कहा जाता है कि यह अत्यंत लचीला संविधान है। जो देश- काल और परिस्थिति के अनुसार संशोधित किया जा सकता है। किन परिस्थितियों में देश के लिए कौन सी आवश्यकता आ पड़ी है? इसको समझना देश की सरकारों के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। कहीं संविधान का कोई कठोर प्राविधान देश की तात्कालिक आवश्यकता अथवा प्रगतिशीलता के समक्ष आकर एक बाधा के रूप में न खड़ा हो जाए, इसलिए प्रत्येक प्रगतिशील संविधान को लचीला होना ही चाहिए। इसी दृष्टिकोण से हमारे देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा का अध्यक्ष होते हुए जन गण मन के संबंध में अपना उपरोक्त मंतव्य स्पष्ट किया था। जिसे कांग्रेस की सरकारों ने अपने लिए कभी आदर्श माना ही नहीं, यद्यपि उसने संविधान में संविधान की भावना की विपरीत जाकर भी संशोधन किये हैं।

धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल और वंदे मातरम

यह भी एक तथ्य है कि देश के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों के भीतर ' वंदे मातरम' को लेकर उतना श्रद्धा भाव नहीं है जितना कि होना चाहिए। उन्होंने इसे हिंदूवादी संगठनों की सांप्रदायिक मानसिकता के साथ जोड़कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस प्रकार देश के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों ने मुस्लिम समाज की उसी सोच और मानसिकता को पोषित किया है, जिसे एक षड़यंत्र के अंतर्गत अंग्रेजों ने कभी मुस्लिम लीग के मस्तिष्क में डालने का प्रयास किया था। मुस्लिम लीग ने उसे अपने स्वार्थों की प्राप्ति के लिए स्वीकार कर लिया था।
इसी लीक पर न केवल मुस्लिम समाज आज तक चल रहा है अपितु भारत के राजनीतिक दल भी इसी बात का पक्ष पोषण कर आजादी से पूर्व की उस घृणित राजनीति का परिचय दे रहे हैं जो देश के लिए विभाजनकारी सिद्ध हुई थी। देश के लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर अर्थात संसद में भी भारत के राजनीतिक दल ' वंदे मातरम ' के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं दिखाते। इसीलिए विगत ८ दिसंबर २०२५ को वंदे मातरम की १५० वीं जयंती के अवसर पर वर्तमान सरकार को इस गीत पर विशेष बहस कराने की आवश्यकता अनुभव हुई।
माना कि लोकतंत्र में अपनी बात को कहने का सभी राजनीतिक दलों को अधिकार होता है और यह भी सच है कि लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं की लड़ाई जारी रहती है, परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि आप देश के सर्वमान्य प्रतीकों और उन आदर्शों को भी ताक पर रख देंगे जो हमारी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक रहे हैं और जिनसे हमने अपने स्वाधीनता आंदोलन में विशेष प्रेरणा लेकर अपने बलिदान दिए थे ? यदि आप उन आदर्शों और प्रतीकों का भी अपमान करते हैं अथवा उनका उपहास करते हैं तो इससे आपकी देशभक्ति संदिग्ध मानी जानी ही चाहिए। ८ दिसंबर को जब इस गीत पर संसद में बहस चल रही थी तो भाजपा के सांसद श्री अग्रवाल के ये शब्द बहुत महत्वपूर्ण थे कि मोहम्मद रमजान ( एक विपक्षी सांसद ) ने साफ कहा कि वे वंदे मातरम् नहीं गाएंगे, जिससे बहस का औचित्य सिद्ध होता है। उन्होंने श्रीराम और हजरत मोहम्मद साहब के कथनों का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों ने अपनी जन्मभूमि को माता समान माना और उससे प्रेम का संदेश दिया था।'

मुस्लिम देशों में मदरलैंड की होती है पूजा

हमें श्री अग्रवाल के भाषण का गंभीरता से चिंतन मंथन करना चाहिए। जिसमें उन्होंने कहा कि उज्बेकिस्तान, ईरान, तुर्की, अज़रबैजान जैसे कई मुस्लिम देशों में मदरलैंड शब्द और मातृभूमि से जुड़े प्रतीकों का सम्मान किया जाता है।
यदि मुस्लिम देशों के भीतर भी मदरलैंड अथवा मातृभूमि जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान भाव प्रकट किया जा सकता है तो ऐसा भारत में क्यों नहीं हो सकता ?
यदि इन देशों में ऐसी स्थिति है तो माना जाएगा कि इस्लाम में भी कहीं न कहीं मातृभूमि के प्रति श्रद्धा भक्ति और कृतज्ञता ज्ञापित करने की परंपरा है। जिसे जानबूझकर भारत में लागू नहीं किया जा रहा। क्योंकि भारत में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा न दिखाकर उसका विरोध करने में ही मुस्लिम समाज अपनी भलाई देखता है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इंडोनेशिया में ‘इबू पार्वती’ को धरती माता कहा जाता है। इंडोनेशिया आज तक भी अपने मौलिक धर्म अर्थात वैदिक धर्म के प्रति श्रद्धा भाव रखता है।
उसकी स्पष्ट मान्यता है कि उसने केवल मजहब बदला है पूर्वज नहीं बदले। इसका अर्थ हुआ कि इंडोनेशिया आज भी अपने मूल से जुड़ा हुआ है। उसकी स्पष्ट मान्यता है कि मजहब बदलने से पूर्वज नहीं बदले जा सकते। मजहब तो केवल एक बाहरी आवरण है, जबकि पूर्वजों का और हमारे अपने वास्तविक वैदिक धर्म का संबंध हमारे आंतरिक जगत से है। बाहरी आवरण के आधार पर सांप्रदायिक क्रियाकलापों को करते रहकर भी अपनी आंतरिक चेतना से जुड़े रहना और मनुष्य मात्र व प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव बनाए रखना वास्तविक धार्मिकता है। इसी प्रकार की धार्मिकता को अपना कर चलना और राष्ट्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने में अपना सहयोग प्रदान करना वास्तविक पंथनिरपेक्षता है।

मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति

भारत के संबंध में यह बात पूर्णतया सत्य है कि कुछ राजनीतिक दल यहां मुस्लिम तुष्टिकरण को अपनाकर वोटों की राजनीति करते हैं। इसी तुष्टिकरण की नीति को अपनाए रखकर हमारे अनेक धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल मुसलमानों का पक्ष पोषण करते हैं। जिसके चलते मुस्लिम समाज की ओर से " वंदे मातरम " का विरोध निरंतर जारी रहता है। कोई भी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल ' वोटों की राजनीति ' के व्यामोह से बाहर नहीं निकल पाता। जिसके चलते राजनीतिक दलों की ओर से मुस्लिम समाज को वास्तविकता को समझाने का कभी गंभीर प्रयास नहीं होता।
भाजपा के उपरोक्त सांसद ने अपने भाषण के दौरान कहा कि कांग्रेस नेता रेवंत रेड्डी का यह कथन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि “ कांग्रेस का मतलब मुसलमान और मुसलमान का मतलब कांग्रेस ”। इस प्रकार के वक्तव्य स्पष्ट करते हैं कि कांग्रेस आज भी हिंदू विरोध की अपनी राजनीति को निरंतर जारी रखने में ही अपने राजनीतिक हित साधने का प्रयास कर रही है, जिसे राष्ट्रहित में उचित नहीं कहा जा सकता।

' यूनियन ऑफिस स्टेटस ' कहने की राजनीति

जिन लोगों ने कभी ' वंदे मातरम ' का विरोध किया था या आज भी कर रहे हैं और जो राजनीतिक दल उनका साथ दे रहे हैं, उन सबकी सोच एक जैसी ही है। यही लोग भारत को ' यूनियन ऑफिस स्टेटस' कहकर भारत के प्राचीन गौरवशाली इतिहास को भुलाने का प्रयास करते हैं। उनकी दृष्टि में ' यूनियन ऑफ स्टेटस' का अभिप्राय अनेक राज्यों के ऐसे समूह से है जो कभी भी सोवियत संघ की भांति भविष्य में जाकर अपना अलग अस्तित्व स्थापित कर सकते हैं। यद्यपि हमारा संविधान मजबूत केंद्र की बात करता है, इसके उपरांत भी कई राजनीतिक दल ' यूनियन ऑफ स्टेटस' का प्रयोग जानबूझकर करते हैं। यह कितने आश्चर्य की बात है कि जिन लोगों को ' वंदे मातरम' सांप्रदायिक नारा दिखाई देता है और इसके बोलने से सामाजिक सद्भाव के भंग होने और देश के टूटने की संभावना प्रबल होती हुई दिखाई देती है, उन्हीं लोगों के मुंह में तब दही जम जाती है जब एक व्यक्ति पश्चिम बंगाल में एक नई बाबरी मस्जिद बनाने का दावा करता है और मुसलमान उसके लिए तुरंत धन एकत्र करने में लग जाते हैं। इस प्रकार ' की घटनाओं से तो सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ेगा और वंदे मातरम ' बोलने से सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ेगा ? अजब लोगों की अजब परिभाषाएं हैं देश में।
संसद में भाषण देते हुए भाजपा के सांसद श्री अग्रवाल ने १९२३ के काकीनाडा अधिवेशन का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली जौहर ने पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर को वंदे मातरम् गाने से रोका था, परन्तु पलुस्कर ने पूरा गीत गाकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि काकीनाडा नगर निगम ने उस घटना के वर्षों पश्चात मोहम्मद अली जौहर मार्ग का नाम बदलकर ' वंदे मातरम् मार्ग' कर दिया।
हमारा मानना है कि मोहम्मद अली जौहर मार्ग का नाम बदलकर ' वंदे मातरम' मार्ग कर देना पूर्णतया न्याय संगत माना जाना चाहिए। जिस व्यक्ति ने हिंदू मुस्लिम एकता या राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए कभी काम किया ही नहीं, उसके नाम पर किसी मार्ग का नाम रखना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं था। १९२३ के काकानाडा अधिवेशन के बारे में एक महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए श्री अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि में कांग्रेस ने उस अधिवेशन में विनायक दामोदर सावरकर को जेल से रिहा करने की मांग का प्रस्ताव भी पारित किया था। आज उन्हीं विनायक दामोदर सावरकर को कांग्रेस के लोग ' माफीवीर' कहकर उनका अपमान करने का प्रयास करते हैं।
( यह लेख हमने भाजपा सांसद श्री राधा मोहन दास अग्रवाल के भारतीय संसद में दिए गए भाषण के आधार पर तैयार किया है। )

( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag

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